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टेलीविजन पर एडल्ट फिल्मों का प्रदर्शन – समय की मांग या संस्कृति पर वार ?

Posted On: 2 Jul, 2012 Others में

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हाल ही में सेंसर बोर्ड की रिवाइज्ड समिति ने यह फैसला लिया है कि जिन फिल्मों को रिलीज से पहले ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया जाता है उन्हें थोड़ी कांट-छांट करने के बाद रात ग्यारह बजे के पश्चात छोटे पर्दे अर्थात टेलीविजन पर प्रसारित किया जा सकता है। इस निर्णय के पीछे सेंसर बोर्ड समिति का कहना है कि रात ग्यारह बजे तक 12 वर्ष से कम आयु वाले बच्चे सो चुके होते हैं या फिर उनकी निगरानी रखने के लिए माता-पिता घर पर मौजूद रहते हैं।


यह बात हम सभी जानते हैं कि छोटा पर्दा कहा जाने वाला टेलीविजन अब भारतीय समाज के हर हिस्से में अपनी पहुंच बना चुका है। घर के सदस्य साथ बैठकर टेलीविजन का आनंद उठाते हैं। हालांकि अब छोटे पर्दे पर भी उदारवाद जैसे हालात देखे जा सकते हैं लेकिन रात ग्यारह बजे के बाद वयस्क फिल्मों को प्रदर्शित किया जाने जैसा निर्णय विवादों में घिर गया है।


इस मसले पर बहुत से लोगों का यह स्पष्ट कहना है कि ‘ए’ सर्टिफिकेट वाली फिल्मों का टेलीविजन पर प्रसारण बेहद शर्मनाक और हैरान कर देने वाला निर्णय है। भले ही टेलीविजन को छोटा पर्दा कहा जाता है लेकिन अब यह कहीं अधिक लोकप्रिय हो चुका है इसीलिए टी.वी. पर ऐसी फिल्मों के प्रसारण का तो कोई सवाल ही नहीं बनता। इसके विपरीत सेंसर बोर्ड को ऐसी फिल्मों के रिलीज पर ही रोक लगा देनी चाहिए जो हमारे पारंपरिक समाज में अश्लीलता को बढ़ावा देती हैं। इस निर्णय के विरुद्ध आवाज उठाने वाले लोगों का कहना है कि हम कैसे यह गारंटी दे सकते हैं कि रात ग्यारह बजे के पश्चात कम उम्र के बच्चे अकेले टेलीविजन नहीं देखेंगे? सरकार द्वारा ऐसी फिल्मों को स्वीकार्यता देने का अर्थ यह भी हो सकता है कि अब भारतीय समाज और संस्कृति में फूहड़ता और अश्लीलता को स्वीकार्यता मिलने का मार्ग भी प्रशस्त हो चुका है।


वहीं दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इस निर्णय को पूरे दिल से स्वीकार करने की पैरवी कर रहे हैं। इनका मानना है कि अब समय और हालात पहले जैसे नहीं रहे इसीलिए हमें अपने रुढ़िवादी स्वरूप में थोड़ा विस्तार और बदलाव लाना ही होगा। उदारवाद की अवधारणा को अपनाए बिना हम प्रगति के मार्ग पर निरंतर आगे नहीं बढ़ सकते और ना ही दूसरे देशों का मुकाबला कर सकते हैं। इसीलिए यह नितांत आवश्यक है कि हम अपनी परंपरागत मानसिकता में थोड़ा बदलाव लाएं। अगर ऐसी फिल्में रात ग्यारह बजे के बाद प्रसारित की जाएंगी तो निश्चित ही यह बच्चों की पहुंच से दूर ही रहेंगी।


एडल्ट फिल्मों का टेलीविजन पर प्रसारण करने जैसे मुद्दे के पक्ष और विपक्ष को समझने के पश्चात निम्नलिखित सवाल हमारे सामने आते हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना सामाजिक हित में जरूरी है, जैसे:


1. बदलते सामाजिक परिदृश्य में वयस्क फिल्मों का सार्वजनिक प्रसारण कितना नुकसानदेह हो सकता है?

2. क्या समय के साथ चलने और विदेशी राष्ट्रों का मुकाबला करने के लिए अपनी संस्कृति के साथ यह खिलवाड़ जायज ठहराया जा सकता है?

3. जब सेंसर बोर्ड द्वारा वयस्क फिल्मों को प्रदर्शित करने की अनुमति दे दी जाती है तो ऐसे में टेलीविजन पर उन पर रोक लगाए रखने के पीछे क्या औचित्य है?

4. अगर हमें समाज और युवाओं के मस्तिष्क को स्वस्थ रखना है तो क्यों ना ऐसी फिल्मों के निर्माण या किसी भी तरह के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


टेलीविजन पर एडल्ट फिल्मों का प्रदर्शन – समय की मांग या संस्कृति पर वार ?


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “अश्लीलता को बढ़ावा” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व अश्लीलता को बढ़ावा – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।


2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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