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सिर्फ प्रवेश ना करने देने से ही शिवजी ने बालक का वध नहीं किया होगा

Posted On: 24 Jul, 2017 Others में

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gagansharma

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शिवजी मेरे इष्ट हैं, उनमें मेरी गहरी और अटूट आस्था है। उनकी कृपा मेरे पर सदा रही है, एकाधिक घटनाएं इसका प्रमाण भी हैं।  दुनिया जानती और मानती है कि वे देवों के देव हैं, महादेव हैं। भूत-वर्तमान-भविष्य सब उनकी मर्जी से घटित होता है। वे त्रिकालदर्शी हैं। भोले-भंडारी हैं। योगी हैं। दया

के सागर हैं। वैद्यनाथ हैं, आशुतोष हैं। असुरों, मनुष्यों यहां तक कि बड़े-बड़े पापियों को भी उन्होंने क्षमा-दान दिया है। बिना किसी भेद-भाव के सदा सुपात्र को वरदान प्रदान किया है। उनके हर कार्य में, इच्छा में, परमार्थ ही रहता है। इसीलिए लगता नहीं है कि सिर्फ प्रवेश ना करने देने की हठधर्मिता के कारण उन्होंने एक बालक का वध कर दिया होगा। जरूर कोई ठोस वजह इस घटना का कारण रही होगी। उन्होँने जो भी किया होगा, वह सब सोच-समझ कर जगत की भलाई के लिए ही किया होगा।


घटना श्री गणेशजी के जन्म से संबंधित है, तथा कमोबेश अधिकाँश लोगों  को मालुम भी है कि

कैसे अपने स्नान के वक्त माता पार्वती ने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बना उसमें जीवन का संचार कर अपने द्वार की रक्षा करने हेतु कहा था और शिवजी ने गृह-प्रवेश ना करने देने के कारण उसका मस्तक काट दिया था। यहां ध्यान देने लायक तथ्य यह है कि प्रभू ने उसका वध नहीं किया, बल्कि सिर्फ उसका मस्तक उसके धड़ से अलग किया था। क्योंकि उन्हें उस छोटे से बालक के “यंत्रवत व्यवहार” में इतना गुस्सा, दुराग्रह और हठधर्मिता देखी थी, जिसकी वजह से उन्हें उसके भविष्य के स्वरूप को ले चिंता हो गयी थी। उन्हें लग रहा था कि ऐसा बालक बड़ा हो कर देवलोक और पृथ्वी लोक के लिए मुश्किलें ना खड़ी कर दे ! इसलिए उन्होंने उस बालक के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल देने का निर्णय लिया था।


भगवान शिव तो वैद्यनाथ हैं। उन्होंने बालक के मस्तक यानि दिमाग में ही आमूल-चूल परिवर्तन कर ड़ाला। एक उग्र, यंत्रवत, विवेकहीन मस्तिष्क की जगह  एक धैर्यवान,  विवेकशील, शांत,

विचारशील, तीव्रबुद्धी, न्यायप्रिय, प्रत्युत्पन्न, ज्ञानवान, बुद्धिमान, संयमित मेधा का प्रत्यारोपण कर उस बालक को एक अलग पहचान दे दी। पर अपनी रचना का ऐसा हश्र देख अत्यंत क्रोधित माता गौरी इतने से ही संतुष्ट नहीं हुईं, उन्होंने उस बालक को देव लोक में उचित सम्मान दिलवाने की मांग रख दी। शिवजी पेशोपेश में पड़ गये पर पार्वतीजी का अनुरोध भी वे टाल नहीं पा रहे थे, सो उन्होंने और उनके साथ-साथ अन्य देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियां उस बालक को प्रदान कीं। जिससे हर विधा विवेक, संयम आदि गुणों ने उसे इतना सक्षम बना दिया कि महऋषि वेद व्यास को भी अपने महान, वृहद तथा अत्यंत जटिल महाकाव्य महाभारत की रचना के वक्त उसी बालक की सहायता लेनी पड़ी।


सरल ह्रदय, तुरंत प्रसन्न हो जाने, सदा अपने भक्तों के साथ रह उनके विघ्नों का नाश करने के गुणों के कारण ही आज श्री गणेश अबाल-वृद्ध, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब के दिलों में समान रूप से विराजते हैं। वे गणों के  ईश हैं, ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं, इतने रहम दिल हैं कि मूषक जैसे तुच्छ प्राणी को भी जग में प्रतिष्ठा  दिलवाई है। आज देश के पहले पांच लोकप्रिय देवों में उनका स्थान है।  इतनी लोकप्रियता किसी और देवता को शायद ही  प्राप्त हुई हो। इतनी उपलब्धि क्या उस बालक को मिल पाती ?
#हिन्दी_ब्लागिंग

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