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एक आम आदमी का राजनीतिज्ञों के नाम संदेश

Posted On: 11 Oct, 2012 Others में

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vijay

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उत्तरी गोलार्द्ध में स्थिति एवम भोगोलिक द्रष्टि से असीमित विस्तार के कारण भारत में अनेको ऋतुयो व् मौसमो का आगमन होता है जैसे शरद,ग्रीष्म ,शीत ,वर्षा आदि पर इन मौसमों के अतिरिक्त एक मौसम और है जो किसी भी पर्यावरण विषय  कि पुस्तक में नहीं पढ़ाया जाता है, वो है चुनाव का मौसम इस मौसम में चारो ओर मेरा ही गुणगान होता है जिसे देखो मेरे लिए कुछ करने ,जीने मरने कि कसमे खाता रहता है बड़े बड़े वादे ,झूठी योजनायो कि कोल कल्पित रचनाये ,चुनाव तक यही उठापठ्क यही स्वाग एक ही पठकथा जिसका विभिन्न पार्टियों द्वारा अलग अलग तरीके से मंचन किया जाता है सबके केंद्र में मैं ही रहता हू चुनाव खत्म होते ही वही हालत हो जाती है जो अक्सर रामलीला मैदान कि रामलीला मंचन के पश्चात् हो जाती है सारे किरदार अपने अपने हिस्से का मंचन करके चले जाते है मैं वही रहता हू उसी हालत में ,फिर कुछ साल बाद यही सब दोहराया जाता है परिस्थिति बदलती है किरदार बदलते है पर श्रोता,दर्शक के रूप मैं वही स्थिर रहता हू अपनी बदहाली के साथ जी हँ आज मै भारत का आम आदमी अपनी खास कहानी के साथ आपके सामने हू इस कहानी का आरम्भ भारत के स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही हो गया था मेरे लिए ही सविधान जैसे पावन ग्रन्थ की रचना की गयी फिर योजना आयोग ,अनेको तरीके के मंत्रालय ,सचिवालयों का सूत्रपात हुआ मुझे शुरू से ही गरीबी नामक बीमारी लगी हुई थी बस फिर क्या था सभी कर्मठ राजनीतिज्ञों ने मुझे बीमारी से निजात दिलाने की ठान ली नए नए अर्थशास्त्री मुझ पर शोध करने मैं जुट गए उनमे से कई को पुरस्कार भी प्राप्त हुए ,मुझे ही आधार बनाकर कई राजनेताओं को आजीवन राज सत्ता का भोग भी प्राप्त हुआ पर कम्भ्खत मेरा ये असाध्य रोग न ठीक हुआ समय के साथ मेरे मर्ज़ बढता गया और आज ये पूरे भारत में महामारी के रूप में फ़ैल गया है कहते है अगर नेक नियत से कोई कर्म किया जाये तो वो नियति बदल सकता है पर इन सब लोगो की नियत में ही खोट था तो मेरी बीमारी कैसे ठीक होती आज ये बीमारी अपने अंतिम चरण में आ गयी है भारतवर्ष के नियति निर्माणकर्ता भी अब मुझे मेरे हाल पड़ छोड़ चुके है अब तो दौर विल्कुल ही बदल गया है सुना था कि भारत एक लोककल्याणकारी संघ है जो  कल्याणकारी निति निर्देशक तत्व के रूप में सविधान में ऊलेखित है इसलिए उसे सविधान कि आत्मा कहा जाता है पर जैसे जैसे भारत युवा होता गया उसमे से कल्याणकारी तत्व समाप्त होता गया | भारत के विकास कि नयी परिभाषा गढ़ी गयी जिसमे विदेशी निवेश ,सेंसेक्स जैसे कारको को विकास का आधार बनाया गया मैं भारत का आम आदमी अपने नेतृत्वकर्तायो से पूछना चाहता हू कि अपनी धरती पर पर विदेशी पूजीं पतियों को व्यापार के लिए आमंत्रित करना कोन सा विकास है ऐसे में तो भारत कि पूजी मुनाफे के रूप विदेशो में पलायन करने लगेगी ऐसे में हम कैसे आर्थिक रूप से विकसित होगे और यदि हम पूरे विश्व में छाई मंदी का अध्यन करे तो हम पायेगे इसी प्रकार कि आर्थिक नीतियों पर चलकर आधा विश्व मंदी कि चपेट में आ चुका है तो हमारा नेतृत्व हमे उसी रास्ते पर क्यों ले जा रहा है जिसकी मंजिल मंदी के रूप में परिणती हो रही है हमारी अर्थव्यवस्था जिन कारणों से मंदी से अप्रभावित थी उन्ही कारणों का निर्मूलन क्यों किया जा रहा है रही संसेक्स कि बात तो भारत कि जनसँख्या लगभग १२२ करोड़ है जबकि सेंसक्स प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत के अधिकतम 4 या 5 करोड़ लोगो को प्रभावित करता है तो फिर कैसे ये पूरे भारत के आर्थिक विकास प्रकट कर सकता है तब क्या सरकार इन्ही 4 या 5 करोड़ के लिए काम कर रही है आज के वर्तमान आर्थिक हालात में मेरे पूरे दिन का श्रम भी मेरे परिवार के लिए दो जून रोटी जुटाने में अक्षम साबित हो रहा है ,हमारा श्रम इतना कमजोर क्यों हो रहा है क्या कभी आप लोग नहीं सोचते, आपने ये कैसा अर्थव्यु रच दिया जिसमे पहले कभी विकास,कभी राजमार्ग,कभी अस्पतालों के नाम पर हमसे हमारी जमीं छीन कर हमें बेरोजगार कर विकलाग सा बना दिया जाता है फिर मनरेगा ,जवरेगा,आदि जैसी योजनाये से बैसाखी बाटी जाती है, कहते है कि अर्थशास्त्र में सब कुछ तार्किकएवेम योजनावध तरीके से चलता है तो क्या आप लोग ने जानभुझकर इस आर्थिक परिद्रश्य का निर्माण किया है जिससे आप आपने दूरस्थ आकाओ को खुश कर सके आज मेरे चूल्हा जलाने के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता आपको कष्ट दे रही है फिर कैसे आपने 2g,3g,देवास ,कोल ,कोर आयरन आदि शेत्रो को मुफ्त में बाट दिया जबकि इन सोत्रो का सही ढंग से प्रोयोग होता तो राजकोषीय घाटा लगभग आधा हो सकता था, फिर सारा आर्थिक विकास का बोझ मेरे कमजोर कंधो पर क्यों ?तेल कम्पनीयों के बैलेंस शीट में कुछ जीरो जोड़ने के लिए मुझे महगाई की आग में क्यों झोंक दिया गया ? अगर इन कम्पनीयों का मुनाफा की इबारत हमारे खून की स्याही से लिखी जा रही है तो इन कम्पनीयों  व्  अंग्रजो की  इष्ट इंडिया कंपनी में क्या अंतर रह गया वो भी मुनाफा कमाने आई थी | कल की चिंता में ,मैं रातो को सो नहीं पाता हू आप कुछ कीजिए आप हमारे लिए वहा पर है इन कम्पनीयों के लिए नहीं ,मेरी उपयोगिता आपके लिए केवल चुनाव के दिन एक वोट तक सीमित मत करिए मैं भी आप ही तरह हाड़ मांस का इन्सान हू मेरा भी आप ही तरह परिवार है कभी रात को तकिये पर सर रखकर मेरे बारे में सोचिये मेरे दर्द ,मेरी विवशता  महसूस कीजिए मेरे मन में आपके प्रति अविश्वास का बीज पनप रहा है इतिहास गवाह है जब जब आम  आदमी के मन में अविश्वास जन्मा है तख्ते पलट गए ,व्यवस्थाएं परिवर्तित हो गयी है जार का अंत,फ़्रांसीसी क्रांति,अमरीकी क्रांति,इसके अनेको उदाहरण है मेरे अन्दर गाँधी भी है ,भगतसिंह भी ,चंद्रशेखर आजाद,चेगुएरा भी अब ये आप के ऊपर निर्भर है की आप कोन सी अभिव्यक्ति की अपेक्षा मुझसे चाहते है |

परिवर्तन की इंतजार में आम आदमी !
(v.k azad)

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