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कबड्डी का खिलाड़ी 1

Posted On: 5 Feb, 2017 Others में

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vijay

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—कबड्डी का खिलाड़ी —

अनुशासन प्रिय तथा समय पाबन्द होने के कारण साहब गाड़ी के समय से पहले ही रेलवे स्टेशन आ गए थे। आॅफिस के दो चपरासी भी समान सर पर उठाए वेटिंग रूम के बाहर साहब के आदेशो के लिए प्रतीक्षारत थे। फूड इस्पैक्टरों की टोली भी हाथों में गुलदस्ते लिए साहब के बाहर आने का इंतजार कर रही थी। साहब का इतना रोब था कि रेलवे का वेटिंग रूम भी कुछ देर के लिए साहब का आॅफिस प्रतीत हो रहा था। दोनों चपरासी भी भारी-भारी बैग सर पर उठाए थक गए थे पर उनको जमीन पर रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। हर किसी के चेहरे पर एक झिझक, एक द्वन्द का भाव था। सभी स्तब्धता से एक दूसरे की तरफ देख रहे थे पर अंदर जाकर साहब से मिलने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था। भारी बैगों के वजन से दोनों चपरासियों की गर्दन टेढ़ी हुई जा रही थी। एक का सब्र का बांध टूट गया। जैसे ही उसने समान को नीचे उतारने की भंगिमा बनाई दूसरे ने गर्दन हिलाते हुए बैग को नीचे न रखने का इशारा कर दिया। ईशारा करने वाला पुराना आदमी था। साहब की तुनकमिजाजी को भली-भांति समझता था। गर्दन हिलाते समय उसकी आॅखों में साहब का भय स्पष्ट झलक रहा था। दूसरे ने भी ये देखकर अपना विचार त्याग दिया। कृष्ण कान्त जो 2012 बैच के पी0सी0एस0 अधिकारी थे, कुछ ही महीनों में महकमें में एक ऐसा रोब गांठ दिया था कि हर कोई उनसे डरने लगा था। कई तो उनकी गहरी धॅसी हुई आॅखों से ही घबरा जाते थे, पर वेटिंग रूम के बाहर इतने कष्टकारी इंतजार के बावजूद भी आज सबके चेहरों पर एक सकून था। निराशा भरे इंतजार में भी एक आशावादी तसल्ली की चटक लाख छुपाने के बाद भी सभी चेहरों पर उमड़-उमड़ कर आ रही थी। साहब दस दिनों के लिए हनीमून पर जा रहे थे ’’कम से कम दस दिन तो आराम से कटेंगे’’ यही सोच-सोच के हर उपस्थित मन बांछे उछल रहे थे।
तभी एक नाटे कद का शख्स बडी-बडी आॅखे, सर का तीन चैथाई हिस्सा बालों से साफ हो चुका था, फिर भी बचे-कुचे बालों से सर को ढकने का नाकाम प्रयास व्यक्तित्व को और हास्यास्पद बना रहा था, एक पैर भी हल्का सा छोटा था जिससे चलने में हल्का लगड़ापन झलक रहा था। एक हाथ में इंग्लिश का अखबार दूसरे में इग्लिंश मैगजीन लिए वेटिंग रूम से बाहर आता है उसे देखकर जैसे ठहरे हुए वातावरण में हलचल उत्पन्न हो गयी जो यह बताने के लिए काफी थी कि यही व्यक्ति साहब हैं। सभी फूड इंस्पेक्टर हाथों में बुके लिए साहब की ओर दौड़ पड़े, एक-एक कर लाइन से बुके व यात्रा की शुभकामनांए देकर सब अपने-अपने नम्बर पक्के में जुट जाते हैं। कुछ मैडम से मिलने की कामना लेकर आए थे पर साहब के तेवर देखकर इरादे बदल गए, साहब को बाहर देखकर दोनों चपरासियों के चेहरे भी खिल गए कि अब तो इस वजन से मुक्ति मिलेगी पर अधिकारी महोदय को इंसानों को कष्ट में देखकर सकून महसूस होता था। सभी कर्मचारियों को गैर जरूरी हिदायत देकर, चपरासियों को अनदेखा करते हुए साहब अंदर चले गए। दोनों चपरासियों ने साहब को दिखाने के लिए चेहरे पर वजन से चूर-चूर होने के कई भाव दिखाये पर साहब का पत्थर दिल न पिघला।
दोनों चपरासी मन ही मन साहब को कोसते हुए एक दूसरे की तरफ देखने लगे, इंसान इतना भी क्रूर निर्देयी हो सकता है शायद उनका मौन एक दूसरे से यही प्रश्न पूछ रहा था। साहब ने तो नहीं सुनी पर ऊपर वाले ले जरूर सुन ली। जल्द ही ट्रेन के आने एनाउन्समेंट हो गया। बिना समय गंवाए साहब मेंम साहब के साथ प्लेटफार्म की ओर चल दिए। दोनों की जोड़ी दो विरोधी तत्व का मिश्रण दिखाई दे रही थी। जहां साहब अपने नाटे कद कुरूप ,अन आकर्षक व्यक्तित्व के साथ जोड़ी की बेमेलता को गहरा रहे थे , वहीं और मेमसाहब सौम्यता सुन्दरता की देवी प्रतीत हो रही थी। उनका पांच फुट नो इंच का लम्बा कद, गौर वर्ण, शरीर को भेद आत्मा तक पहुॅच रखने वाली मृग सदृा आंखे, यौवन लावण्य से भरपूर काया चलते हुए कल-कल बहती किसी वेगवान सरिता की तरह दिख रही थी। स्टेशन पर हर दृष्टि मेमसाहब के साथ कुदरत की इस नाइंसाफी के लिए जैसे संवेदना प्रकट कर रही थी। दोनों युगल गाड़ी आने वाले प्लेटफार्म पर पहुॅच जाते हैं, साहब एक सजग, संवेदनाील प्राणी थी। अपने चारों ओर के वातावरण के प्रति सचेत रहते थे। प्लेटफार्म पर ऊपर पड़ने वाली हर निगाह जैसे साहब को खुद से प्रश्न सी पूछती महसूस हो रही थी, मेमसाहब तो प्लेटफार्म की सीट पर जा बैठी पर आसपास की कानाफूसी चहल-पहल ने साहब को बैठने न दिया। इर्द-गिर्द खड़े लोगों की कोहनियों व हंसी- ठठे उन्हें परेशान कर रहे थे वो मन ही मन कभी रेलवे को कोसते तो कभी अपनी बड़ी बहन को, जिसने उन्हें हनीमून पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया था। इसी बीच एक चपरासी से साहब का बैग गिर गया। यू बास्टर्ड, रास्कल एक हल्का सा बैग नहीं उठता तेरे से’’ साहब जोर-जोर से चिल्लाने लगे। ऐसे लगा जैसे चपरासी पर नहीं आसपास खड़े चक्षुओं से अस्वादन करते लोगों पर चिल्ला रहे हो। रेलवे से लेकर असहज तत्वों का गुस्सा बेचारे चपरासी पर उतर गया। गुस्सा भी जैसे कमजोर का दरवाजा ढूढता है। मेमसाहब की इस सब नकारात्मक प्रतिक्रिया देखते हुए साहब ने जैसे डेमेज कंट्रोल करते हुए मेमसाहब से इग्लिंश में कहा ’’हाउ दे रन बुलेट ट्रेन’’ इनसे यहीं ट्रेन समय पर नहीं चल रही। ’’ व्हाट ए मिस मैनेसमेंन्ट कहते -कहते साहब भी मेमसाहब के पास बैठ गए। ’’इतने देर हो गई एनाउसमेंन्ट किए, अभी तक ट्रेन आयी ही नहीं। मेमसाहब ने भी साहब के निन्दा राग में दो बंदिशे और जोड़ दी ’’ अरे ये भारतीय रेल है इसका कुछ नहीं हो सकता’’साहब ने निरााशा भरे स्वर में कहा और दोनों दूसरे प्लेटफार्मों पर ट्रेनों का आवागमन देखने लगे। साहब चारों ओर के माहौल से मेमसाहब की असहजता महसूस कर रहे थे। उनका ध्यान बॅटाने और अपना ज्ञान बखारने के लिए कुछ और नहीं तो वो स्टेशन का वर्णन ही करने लगे। वो देख रही प्रिय (साहब मेमसाहब को इसी नाम से पुकराते थे) दूर प्लेटफार्म पर प्रवेश करती ट्रेन की ओर इाारा करते हुए। ट्रेन रूकने से पहले ही हाॅकर (चाय-पूड़ी वाले) को चलती ट्रेन में एक हाथ पर लटककर चढ़ना पड़ता है जबकि दूसरे हाथ में सामान का इतना वजन रहता है। मैडम को भी ये बड़ाआश्चर्यजनक लगा ’’वट व्हाय दे बोर्ड इन रंिनंग ट्रेन’’ ? मैडम ने उत्सुकता भरे स्वर में पूछा- गरीबी, घर की जिम्मेदारी ज्यादा से ज्यादा बैचने का दबाव, पापी पेट की बिसात पर जिंदगी हर रोज मौत का जुआ खेलती है यहां। बहुत हाॅकर कट जाते हैं रेले में प्रतिदिन पर जिंदगी की जंग चलती रहती है कहते-कहते साहब के चेहरे पर एक गंभीर भाव ठहर गया मैडम मुग्ध होकर साहब की ओर देखने लगी। एक पैर के घुटने पर दूसरा घुटना चढ़ाती हुए कमर पीछे टेकती हुई ’’ पर सरकार इनके लिए कुछ करती क्यों नहीं’’ मैडम ने खामोशी तोड़ी। अब सरकारों के पास कमजोर , दबे-कुचले, लोगों को देने के लिए कुछ नहीं है डियर, साहब ने सिगरेट जलाते हुए कहा मैडम साहब के इस ज्ञान से बेहद प्रभावित हुई। साहब भी यदा-कदा ऐसे ज्ञान प्रदर्शन से अपने व्यक्तित्व की कमियों की क्षति-पूर्ति मेमसाहब के सामने करते रहते थे। जल्द ही खट-पट करती ट्रेन भी आ गयी। ’’ac 2- 63& 64 साहब ने डांटते हुए स्वर में चपरासियों की ओर एक डरावना दृटिपात किया। तीन घंटे से बैग सर पर उठाए दोनों में गर्दन हिलाने के भी प्राण शेष न थे। केवल पलके झपकाकर ही दोनों ने हामी भर दी। प्रिय हमारी एक सीट नीचे की है और एक ऊपर की, तुम ऊपर सो जाना मैं नीचे साहब ने अनुनय स्वर में मैडम से कहा। दरसल साहब अपने कमजोरियों को अपनी बौद्धिक चतुरता से छुपाने में माहिर थे। अपने पैर की असक्षमता वो मैम साहब के सामने जाहिर नहीं करते थे। मैमसाहब भी उनकी इस शैली से परिचित हो गयी थी। उन्होंने बिना कुछ बोले ही गर्दन हिला कर हामी भर दी। सीटो पर समान बैग आदि रखवाकर साहब के अर्दलियों ने विदा ली। दोनों साहब को बैठाकर ऐसे भागे जैसे जेल तोड़कर कैदी भागे हो। भागते- भागते दोनों ने अपने मोबाइल भी बंद कर लिए के कहीं साहब फोन कर दुबारा न बुला ले। डर का आलम ये था कि दोनों को भागते-भागते भी ऐसा लगा रहा। जैसे साहब पीछे छोड़कर उन्हें पुकार रहे हो जल्द ही दोनों दंम्पति अपनी सीटों पर सैटल हो गए अब। अब 36 घंटे के लिए यही हमारा घर है। साहब ने मुस्कराते हुए मेडम से कहा- सामने नीचे वाली सीट पर एक बूढ़े अंकल को सोता देख साहब के अंतस की बगिया में सावन की ठंडी फुआरे पड़ने लगी थी पर उनकी इस खुशी की उम्र ज्यादा लंबी नहीं थी। अगले ही स्टापेज पर एक छह फुट तीन इंच लम्बा हट्टा कटटा, नौजवान जिसकी उम्र लगभग 25 वर्ष रही होगी, शरीर जैसे वज्र, चेहरे पर सूरज का तेज, छोटे-छोटे बाल कोई खिलाड़ी मालूम दे रहा था। हाफ पेन्ट और टी -शर्ट में उसका शारीरिक सौष्ठव नदी के तल पड़ी सूरज की किरणों की तरह झिलमिला रहा था। बूढे आदमी को हिलाते हुए रे ! चाचा अभी तो ढेड़ शाम हो रई है अभी से चित्त हो लिया। चल उठ जा इब, ठाले अपना सामान भी यो मारी भी सीट है, बूढ़े अंकल को उठाकर वो महाकाया भी साहब व मेमसाहब के ठीक सामने वाली सीट पर बैठ गयी। लो इस महाबली की कमी और थी साहब ने मन ही मन फुसफुसाया। अपने सामने सिफोन की कसी साड़ी में ऊँचा जूड़ा बनाये रूपसी को देखकर महाबली की आॅखों में एक चमक सी झलकी जो कि साहब के सूक्ष्म निरीक्षण से न बच सकी। इस महाबली की मर्दाना काया व कठोर जिस्म में एक अलग ही आर्काण था। मेमसाहब ने भी ठहरी निगाहों से महाबली पर एक दृटि डाल ली थी। साहब मामले की नजाकत समझकर फौरन चुपके से टी.टी.ई. से अपना परिचय देकर सीट बदलने की गुहार करने निकल गए पर टी.टी.ई. ने हाथ खड़े कर दिए। निराा लौटते हुए वो मन ही मन फिर बहन को कोसने लगे ’’कहां फंसा दिया’’ बुदबुदाते अपनी सीट पर लौट आए।
हनीमून का सुखद उल्लास, उमंग अब काफूर हो चुका था, यात्रा एक जंग में बदल चुकी थी, ट्रेन का डिब्बा रणभूमि में तब्दील हुआ मालूम हो रहा था। साहब का चुपचाप निराा देख मैडम से रहा न गया ’’ कहा चले गए थे ? ’’ मैडम ने पूछा ’’ कुछ नहीं ऐसे ही बाहर की हवा लेने गया था। साहब ने महाबली की तरफ देखते हुए जबाव दिया जो अब भी मेमसाहब को घूरे जा रहा था। एक बार तो साहब के मन में आया कि जाकर महाबली के मुॅह पर तमाचा रसीद दे, पर उसका शरीर गौर से देख साहब को विचार बदलना पड़ा, साहब खिड़की की तरह मुॅह करे मन में कल्पनाएं करने लगे ’’ किस्मत ही खराब है इस जाहिल की सीट भी यही पड़नी थी काश ! के किसी दिन कमबख्त कोई काम से आफिस आ जाए फिर बताऊगा बच्चू को, कि दूसरे की बीवी को कैसे देखते हैं या इसकी नौकरी लग जाए मेरे आफिस में इतना टोरचर करूॅगा सारी चर्बी उतार दूॅगा ससुरे की। तभी जरा मैं फ्रेश होकर आती हूँ ? मैमसाहब की पतली आवाज साहब के कानों में झनझनायी साहब ने खुद से गुफ्तगू के सिलसिले को तोड़ते हुए मैडम की गर्दन घुमाकर ’’ठीक है’’ कहां। मैमसाहब को बाथरूम में पर्स साथ ले जाते देख साहब थोड़े से हैरत में पड़ गए पर संकोच के कारण कुछ पूछ न पाए। थोड़ी देर में मेमसाहब लौट आयी थी पर रूप की सज्जा बदल चुकी थी, जुड़े की जगह एक उठी हुई चोटी ने ली थी, बालों की एक लट भी माथे पर तैरने लगी थी। थोडी लिपिस्टिक भी गाढ़ी हो गयी थी, साहब की बाज सी पैनी द्रष्टि से इन परिवर्तनों का बचना नामुमकिन था ये देखकर उनका मन बैठने लगा हीनता और ग्लानि के समुद्र में गोते खाने लगा । हे प्रभू ! तो क्या प्रियतमा भी ? साहब ने जैसे ईश्वर से नहीं बल्कि खुद से प्रश्न किया।
अब महाबली और मेमसाहब आमने- सामने थे, महाबली की बडी-बडी आॅखेें मैमसाहब पर थी, अब मेमसाहब भी मैगजीन पढ़ते-पढ़ते अपनी लट को उठाते हुए कनखइयों से चुपचाप महाबली को देख लेती थी। ’’शादी के 6 महिने में मैंने प्रियतमा की ये लट आज तक नहीं देखी और अगर ये बार-बार गिर ही रही है तो इस पर पिन क्यों नहीं लगा लेती साहब ने खीझ से लगभग पैर पटकते हुए खुद से कहा। वो दोनों के बीच चल रहे नैनों के संवाद की भाषा खूब समझ रहे थे। साहब अन्दर ही अन्दर घुटे जा रहे थे उनके भीतर जैसे कुछ टूट सा रहा था। कभी सोचते उनके गुरू ठीक ही कहते थे कि स्त्रियां शरीर पर मरती है नहीं तो मेरी प्रियतमा इस जाहिल को कभी न पसंद करती, कहां मेरा पद, मेरा ज्ञान, मेरा रूतवा, कहां ये अल्हण जंगली टारजन।
हनीमून, केन्डिल लाइट डिनर, वाटर वोटिंग जैसे यात्रा की कोमल पूर्व कल्पनाएं साहब के मन से मिट चुकी थी, अब तो साहब को युद्ध के बिगुल सुनाई दे रहे थे एक ओर महाबली जैसा प्रतिद्वन्दी और एक तरफ उनकी अर्धागिनी थी। मन में जैसे विचारों के झंझावत चल रहे थे। कभी चेतना निराश थका हारा स्वयं के बल से अनभिज्ञ हनुमान बन जाती, तो कभी उत्साह भर संघर्ष को प्रेरित करता जामवन्त, एक साथ हजारों चीजें बन-बिगड़ रही थीं साहब के मस्तिष्क में। अचानक केन्द्रीय शक्ति ने सब को नियंत्रित किया। ’’ यू आर एन आफिसर’’ यू हैब ब्रेन’’ सिकन्दर ने दुनिया को बल से नहीं बुद्धि से जीता था’’ जैसे कोई अन्तंहवाणी हुई साहब के अन्दर झुपे जामवन्त ने जैसे उनके निराश हनुमान को जगा दिया। साहब ने युद्ध का मन बना लिया और अवसर की तलाश करने लगे, तभी साहब को सामने बैठे बुढ़े यात्री के हाथ में इतिहास की किताब दिख गयी उन्होंने बूढ़े आदमी से संवाद बढ़ाया तो पता चला वो भी रिटायर IRS अधिकारी था दोनों का संवाद धीरे-धीरे तर्क-वितर्क में बदल गया वो भी अंग्रेजी में। साहब को इतिहास की किताब क्या दिखी! ऐसा लगा जैसे सिन्धबाद को शमशीरे सुलेमानी दिख गयी, कभी धर्म पर, कभी राजनीति पर, कभी अर्थशास्त्र पर साहब हर विष य पर अपनी शमशीर चला रहे थे। ऐसा लग रहा था मानों दुनिया का सबसे अच्छा वक्ता बोल रहा हो। मेमसाहब और महाबली भी विभोर होकर साहब के चेहरे को देख रहे थे। उनके मुॅह से ज्ञान के चश्मे फूट रहे थे लग रहा था जैसे कोई पैगम्बर अपनी आखिरी तकरीर दे रहा हो। आसपास कोच में टहलते लोग भी वाद-विवाद की गर्मी देख, रूककर रुचि से दोनों को सुनने लगे। वृद्ध अधिकारी भी पका आम था उसने अपने तर्कों से काफी मुकाबला किया पर साहब के युवा जोश अकाट्य तीखे तर्कों से अन्तोगत्वा उसने पराजय स्वीकार कर ली। साहब के चेहरे पर विजयी मुस्कान तैरने लगी उन्हें लगा जैसे उन्होंने अपनी बौद्धिक शक्ति से अपने प्रतिद्वंदी महाबली को अप्रत्यक्ष रूप से पराजित कर दिया। मेम साहब भी प्रगल्भता भाव से अपने पति की ओर देखने लगी जैसे उनकी विजय पर उन्हें बधाई दे रही हो।
इस अद्रश्य युद्ध की भूमि-ट्रेन इसी दौरान कुलाचे मारती, स्टेशनों को पछाड़ती, नदियों नाले लांघती हुई गन्तव्य की ओर बढ़ रही थी। रात के आठ बज चुके थे। साहब वृद्ध महाशय पर अपनी विजय पताका लहराकर बहुत खुश थे पर संकट अभी टला नहीं था, महाबली अपनी ऊपर की सीट पर जा चुका था अपना लेपटाप खोले आड़ में चुपचाप बियर पी रहा था पर उसकी निगाहे मेमसाहब पर ही थी, साहब भी किसी मजे योद्धा की तरह अपने शत्रु के हर कदम पर पूरी निगाह रखे हुए थे। अब साहब के सामने विकराल समस्या थी वो मेमसाहब को ऊपर की सीट पर नहीं सुलाना चाह रहे थे उनके विवेक को, मेमसाहब का नीचे सोना ज्यादा सुरक्षित लग रहा था पर पैर की समस्या की वजह से उनका ऊपर चढ़ना लगभग नामुमकिन था पर अपना साहब आज नामुमकिन को मुमकिन करने के मूड में थे, आज वो पहाड़ भी तोड सकते थे।
बूढे पर आंशिक विजय ने उनके होसले और बढ़ा दिए थे। ’’जब सब सो जायेंगे तब ऊपर चढ़ा जाऐगा’’ जिससे उनकी मजाक न उड़े ऐसी रणनीति उन्होंने मन में तैयार कर ली थी। मैडम ने लाख कहा कि ’’आप नीचे सो जाओ मैं ऊपर चली जाऊँगी, आप को चढ़ने में परेशानी होगी’’ पर साहब आज सिर पर कफन बांध चुके थे घड़ी की सुईंयां 10 बजे पर टिक-टिक कर रही थी कोच में सन्नाटा था सब अपनी सीटों पर सो रहे थे। साहब ने ऊपर चढ़ने की कोशिश की, एक पैर कमजोर था हाथो के सहारे खुद को खींचना बढ़ी टेढी खीर था, साहब पढ़ने-लिखने वाले आदमी थी खेल-कूद, व्यायाम में कभी रूचि लेते तो शायद आज काम दे जाती। चढ़ने की जद्दोज़हद की आवाज से मैडम की आॅख खुल गई। ये देख साहब चुपचाप कोच में घूमने लगे जैसे खाने के बाद टहल रहे हो। रात 12 बजे तक कोच में यूँ ही घूमने के बाद चढ़ने की दुबारा कोशीश की साहब हाथों से खुद को ऊपर खीचने की नाकाम कोशिश कर रहे थे तभी एक पैसेंजर जो कोच की गैलरी से गुजर रहा था साहब को लटकता देख, पीछे से हाथ लगाकर साहब को ऊपर पहुचा देता है। साहब बिना कुछ बोले ही हाथ उठाकर यात्री को निशब्द धन्यवाद अर्पित कर देते हैं, साहब ऊपर पहुॅचकर बहुत खुश थे। सुबह जग हंसाई से बचने के लिए तड़के तीन बजे ही नीचे उतरने की योजना बन चुकी थी, साहब चढ़ने के संघर्ष से अपनी क्षमता का माप कर चुके थे। सारी रात साहब को नींद नहीं आयी वो किसी अनिष्ट की आशंका से कभी मेमसाहब तो कभी महाबली को देखते रहे।
तीन बजते ही साहब ने अपनी योजना अमल में लायी। नीचे उतरते-उतरते गिर भी गए। वो तो गनीमत रही कि किसी ने देखा नहीं। साहब को चोट से ज्यादा इसकी फ्रिक थी वो अपने शत्रु के आगे कमजोर नहीं पड़ना चाहते थे। सुबह उठते ही मेमसाहब फ्रेश होकर व खुद को और आकर्षक बना के लौट आयीं। महाबली भी अपना मोर्चा संभाल चुका था। अब साहब भी महाबली से फाइनल मुकाबले का मन बना चुके थे। इसी बीच एक बूढ़ी औरत जो शायद बगल वाले चैम्बर की सीट पर थी कांपते हुए पैरो से चलकर महाबली की सीट के पास बैठते हुए बोली ऐ बाबू ! हम गौरखपुर से आ रहल बानी, हमार बंगलौर पहुॅचे बा हमार बच्चुआ ई मोबाइल पर फोन करे के बा, पर ए कर बैटरी बैठ गइल बा, हमरे साथ केछू नहीं खे हमार मोबाइल तनी चार्ज कर दा बाबू। महाबली ने फोन देखा बेरूखी से कहा ’’ रे ! ताई मारे पास इसका चार्जर है को न, पाछे देख ले कदि हो किसी के पास । मैमसाहब ने बुढ़िया से फोन लेते हुए कहा अम्मा जी मेरे पास इसका चार्जर है मैं इसे चार्ज कर देती हूँ मेमसाहब ने अपना चार्जर मोबाइल मे लगा दिया बुढ़िया भी कमर टेककर महाबली के पास ही बैठ गयी और मेमसाहब को ऊपर से नीचे तक देखने लगी।
साहब खिड़की की तरफ मुॅह करके नाखून चबाते हुए किसी सेनापति की तरह युद्ध की अगली रणनीति बनाने में व्यस्त थे तभी बुड़िया ने महाबली की तरफ देखते हुए कहा- ’’बाबू तोहार मेहरारू बहुत गुणवान, रूपवान ब। राम-सीता की जोड़ी लागतत भगवान तोहार जोड़ी बनावल रखे। बुढ़िया महाबली को मेमसाब का पति समझ बैठी ये सुनकर मेमसाब की शर्म भरी हंसी छूट गयी। महाबली भी हंसते हुए बोला ताई यो मारी घरबाड़ी ना है, उसका खसम तो उसके धोरे बैठा है। बुढिया की बातें सुनकर साहब का पारा चढ़ चुका था, उन्होंने बुढ़िया को मोबाइल पकडाकर झिड़कते हुए सीट से भगा दिया। साहब का मुॅह गुस्से से तमतमा रहा था। मेमसाहब, महाबली सर नीचे करके अब भी मुस्कुरा रहे थे। महाबली की हंसी देखकर साहब के आत्म नियन्त्रण का बांध ध्वस्त हो गया उन्होंने महाबली को सीधे ललकारने का मन बना लिया अब अनपढ़, काहिल को बता ही दूॅ कि मैं कौन हूँ साहब मन ही मन खबदबदाए।

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