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----जब रूद्र हुए क्रुद्ध ----

Posted On: 19 Sep, 2013 Others में

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vijay

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आज ऍम .ए फ़ाइनल का परिणाम आ चुका था चाय की चुस्की लेते लेते अख़बार पड़ रहे पिता जी ने सुबह से ही घर में हल्ला कर दिया था हालाकी मुझे परिणाम आने का अंदाज़ा तो था लेकिन फिर भी इसके इतनी जल्दी आने की सम्भावना नहीं थी परिणाम की सुनते ही मेरे मन में कई महीनो से सुप्त भय भी अचानक जाग्रत हो गया था ऐसा लगा मनो युद्ध लड़ते सिपाही से उसकी अंतिम ढाल भी छुट गयी थी, माँ पिताजी तो हर मध्यम वर्गीय परिवार की तरह बी.ए पास करते ही मेरी शादी का मन बना चुके थे पर मेरे ऍम.ए करने की जिद पर बड़ी मुश्किल से दो साल का समय और मिल गया था उस समय मुझे ऐसा लग रहा था मानो मरते इंसान दो साल की जिंदगी और दे दी गयी हो भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार में किसी शादीलायक कन्या की
स्थिति किसी अनजान अँधेरी गुफा में भटके पथिक की तरह रहती है जिसकी आगे बडना मज़बूरी बन जाती है \
ऍम.ए पास होते ही लडको की युद्ध स्तर पर खोज शुरू हो जाती है मामी-मामा ,चाची-चाचा ,बुआ सब इस तरह जुटे थे जैसे पानी की तलाश करते कई दिनों के प्यासे, दादी ने सोमबार के वर्त भी करवाने शुरू कर दिए शिव जी में मेरी अटूट आस्था थी चारो तरफ के माहोल में मुझे वो ही सहारा नज़र आते और एक दिन मेरा ब्याह रच ही गया माता पिता को जिम्मेदारियों से मुक्त हुए उनकी प्रसन्नता देख मैं भी शादी होने का ग़म भी जैसे भूल गयी थी ,मेरे पति भी बहुत अच्छे थे जैसे मैं शिव से प्राथना में मांगती उससे भी अच्छे जल्द ही हमारे बेटा भी हुआ (राकेश) मेरे पति की जिद पर उसका नाम सार्थक रखा गया दिन गुज़रते गए सार्थक भी दो साल का हो गया था वो बड़ा ही तेज्जस्वी बालक था गोरा रंग बड़ी बड़ी आँखे ,लटके हुए गाल घुंगराले बाल जो भी उससे देखता उसके गाल छुए बिना नहीं रह पता था उसके खेल भी बड़ो बड़ो को आश्चर्य में डाल देते ,कभी परदे के पीछे से झा-झा कर चुप जाता तो कभी झुक झुक कर चल दादी की नक़ल करता कभी मोबाइल कान पर लगा अपने पापा की नक़ल करता, रोज मेरे साथ शिव की आरती भी गाता उसे देख उसके दादी -बाबा की लाइलाज बीमारी भी ठीक होने लगी थी कभी कभी मुझे ये सब देखकर भय भी होने लगता की है प्रभु हमारी खुशियों को किसी की नज़र न लगे ,जीवन की मूल प्रकर्ति ही अपूणता है धरती पर उपस्थित हर मानव सम्पूर्णता महसूस करते ही एक डर पैदा हो जाता है वही कही न कही मेरे मन को विचलित कर रहा था \
एक दिन अचानक राकेश ने घुमने की योजना बनायीं वो माँ बाउजी को घर पर ही छोड़ना चाहते थे पर मैं उन्हें ले जाना चाहती थी आख़िरकार माँ बाऊजी की इच्छा के चलते केदारनाथ जाने का निर्णय हुआ मैं भी रूद्र के भक्त होने के नाते उनके दर्शन करना चाहती थी 15 जून 2013 को हमसब अपनी गाड़ी से तीर्थ के लिए रवाना हो लिए सार्थक भी आज बहुत खुश था घर में कपडे ,बैग अटेची देख उसमे अजीब से उर्जा पैदा हो जाती थी \
मेरठ से चार घंटे में ही हम सब ऋषिकेश पहुच चुके थे ऋषिकेश में रात्रि विश्राम करके हुम लोगो ने सुबह केदारनाथ जानने कि योजना बनायी, अपनी गाडी थी जहा चाहते वहा खा पीकर फिर चल पडते उत्तराखंड की घुमावदार चढाई देख अम्मा बाउजी को घबराहट होने लगती थी आखिर दस घंटे की यात्रा के बाद हम गोरी कुड पहुच चुके थे शाम ढल चुकी थी राकेश भी थक कर चूर था वो गोरीकुंड में ही रुकना चाहता था पर माँ बाउजी सुबह केदारबाबा के दर्शन की हठ पर अड़ गए थे, बालहठ और वृद्धहठ में बस यही अन्तर होता है की आप बच्चो को डाटकर डराकर उनकी हठ तोड़ सकते है पर वृद्ध लोगो की हठ अपरिहार्य होती है रात में चढाई शुरू की गयी सुबह केदार पहुच मेंरठ की धरमशाला में नहाने धोने जलपान के लिए रुके दर्शन कर धर्मशाला लोटते लोटते हमें शाम हो चुकी थी दिन ढल चूका था यहाँ रात से बारिश हो रही थी पुछने पर पता चला पहाड़ पर ये आम बात होती है दर्शन कर हम बहुत खुश थे वहा बड़ा ही मनोहारी द्रश्य था चारो तरफ पहाड़ बीच में बाबा केदार मन में रूद्र के प्रति अपार श्रधा उमड़ रही थी मै राकेश के मना करने के बाद भी सार्थक के साथ मै धर्मशाला की छत पर आ गयी थी तभी अचानक बहुत तेज़ आवाज़ आने लगती है लगा जैसे कोई भूकंप आया हो सार्थक मेरी गोद से छुट जाता है चारो तरफ धुल का गुबार था इससे पहले मै कुछ समझपाती ऐसा लगा पानी का सैलाब आ गया हो पूरी धरमशाला हिल गयी थी मैंने दौड़ कर रोते हुए सार्थक को गोद में उठा लिया मेरा कलेजा धड़क रहा था मैं दौड़ कर नीचे गयी तब तक मलबा पानी सब कुछ बहा कर लेजा चूका था मैं अम्मा, बाउजी, राकेश-राकेश चिल्ला रही थी सार्थक लगातार रो रहा था धरमशाला की दीवारे चटक चुकी थी जहा कुछ समय पहले दर्शन की तैयारिया चल रही थी वहा अब कुछ लाशे थी मैं दौड़कर नीचे आती हु चारो तरफ धूल ,मलवा पत्थर थे मेरी आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे चारो तरफ इंसानी लाशो का मजमा लगा हुआ था मेरा मन बेठा जा रहा था मैं सार्थक को गोद में लिए राकेश राकेश चिल्ला रही थी मुझे नहीं पता मैंने कैसे लाशो पर पैर रखकर उन पर चल कर उन्हें उठा उठा के देख रही थी ,विपत्ति व् बदहवासता इंसान को कितना बदल सकती है ये मैं आज पहली बार महसूस कर रही थी वो लड़की जो मरे हुए चूहे को भी देखकर घबरा जाती थी आज इंसानी लाशो में अपने पति को डूढ रही थी अचानक मुझे करहाने की आवाज़ सुनाई देती है ये राकेश की आवाज़ थी मैं दौड़कर आवाज़ की तरफ पहुचती हु राकेश एक पत्थर पर लगभग बेहोश पड़ा था उसके जिस्म से खून बह रहा था मैं उसे जिन्दा देखकर फूटफूट कर रोने लगी शायद राकेश को देख मैं जिंदगी में इतनी खुश कभी नहीं हुई थी वो बुरी तरह घायल था उसके आसू नहीं रुक रहे थे वो भी हमें देख बुरी तरह रो रहा था अम्मा बाऊजी को ढूढने के लिए हमने फिर हिम्मत जुटाई लाशो के बीच में केवल हमारी तरह खुशनसीब थे वो भी अपने परिजनों ,साथियों को ढूढ रहे थे सार्थक रो रो कर अब चुप हो चूका था सब ख़त्म हो चूका था इंसानी बस्ती कब्रिस्तान बन चुकी थी चारो तरफ तबाही बर्बादी का राज था रात दस बजे तक हम अम्मा बाऊजी को मरा मान चुके थे वो काली रात थी लगातार बारिश हो रही थी चारो तरफ लाशे ही लाशे ऐसा लग रहा था जैसे यमदूतो की दावत का कोई द्रश्य हो राकेश और मैंने पूरी रात बिना बोले एक पत्थर की ओट में गुज़ार दी थी सुबह होते होते रौशनी पहुचते स्थिति और भयकर हो चली थी चारो तरफ चीख -पुकारे बदहवास जिस्म कोई ऐसा न था जिसे किसी की तलाश न हो सार्थक ने सुबह होते ही दूध के लिए रोना शुरू कर दिया था पर चारो तरफ उसे देने के लिए कुछ न बचा था \
कुछ बचे लोग इकट्ठे होकर वहा से निकलने की सोचने लगे पर कोई रास्ता न बचा था जीवन के सामने जिन्दा रहने का प्रश्न था भूख प्यास ने हमें तोड़ दिया था सबने मिलकर पहाड़ी रास्ते पर चड़ने का का निश्चय किया हम सब थक चुके थे रास्ता जीवन की तरह लम्बा और कठिन था कुछ बूढे लोग रास्ते में ही रूककर मौत का इंतज़ार करने का मन बना चुके थे पर हम चलते रहे एक झरना दिखाई दिया सब लोग वही रुक गए सार्थक सुबह से लगातार रो रहा था तभी समूह में से कुछ लोगो ने उसे दो बिस्कुट दे दिए हम झरने का पानी पीने लगे किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कहा जाये थकान ने सब को बेदम कर दिया था मुझे ये बताना बहुत मुश्किल है की हम वहा कितने दिन झरने के नीचे बिताये पर अब झरने का पानी भी पीने लायक नहीं रह गया था ऊपर लाशो के सड़ने से इसमें बू आने लग गयी थी अब पानी का ये सहारा भी छुट चूका था समूह में कौन बेहोश था कौन मुर्दा ये बताना मुश्किल था मेरी चेतना भी मेरा साथ छोड़ रही थी पर बेहोश सार्थक मुझसे नहीं छुट रहा था मैं उसे उठाने की बहुत कोशिश कर रही थी पर वो बोल नहीं रहा था मैंने सारी ताकत जूटा कर राकेश को आवाज़ दी पर राकेश भी कुछ नहीं बोला मेरी चेतना मेरा साथ छोड़ रही थी पर ममता अब भी संघष् कर रही थी मैंने जी जान लगा कर अपने दुप्पटे को पानी से भीगो कर सार्थक के मुह पर डाला पर वो बेजान था मेरी चेतना ये आघात नहीं झेल पायी फिर पता नहीं वहा क्या हुआ ?
जब मैंने आँखे खोली तो कुछ लोग मुझे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे ये हैलिकोप्टर बचाव दल था केवल मैं ही जिन्दा थी मैं इतनी कमजोर हो चुकी थी की मैं रो भी नहीं पा रही थी मैं सार्थक, राकेश को भी अपने साथ ले जाना चाहती थी पर वो मर चुके थे बचाव दल मुझे जबरदस्ती ले जा रही थी मैंने आंखरी बार सार्थक के मासूम चेहरे की तरफ देखा ,आज भी उसकी हॅसी,उसकी आवाज़े उसकी हरकते कभी परदे के पीछे से उसकी झा-झा ,राकेश अम्मा बाऊजी सब मैं रूद्र के यहाँ छोड़ आई ॅहू, मुझे अपने जिन्दा रहने का आज भी बहुत अफ़सोस है काश मैं वहा मर गयी होती! आज भी मेरे कमरे से कभी भी सिसकने की आवाज़े आने लगती है कभी खाना खाते खाते मैं अचानक फफक पड़ती हु \
मेरे मन में गुस्सा है रूद्र से उसने ऐसा क्यों किया सार्थक जैसे बच्चो का क्या कसूर था ? वो तो दयालू था फिर उसकी दयालुता कहा चली गयी थी ?लोग कहते है वो क्रुद्र था यदि वो क्रुद्र था फिर वो कैसा भगवांन है जिसे क्रोध भी आता है ?अगर उससे सजा देनी थी तो उन्हें क्यों नहीं दी जो अवेध खनन करते है जिन्होंने पहाड़ो को वृक्षविहीन कर दिया है ?उन नेताओ या ठेकेदारों को क्यों नहीं दी जिन्होंने अपने लालच में पहाड़ो को बेच दिया है ?
फिर वो कैसा भगवान् है ?
( v.k azad)

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