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झुलसा अंतस(भाग १)

Posted On: 17 Nov, 2014 Others में

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vijay

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कई महीनों की कड़कड़ाती ठण्ड के बाद आज कुनकुनाती धूप धरती पर पसरी हुई थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ठण्ड के दिए ज़ख्मों पर कुदरत मरहम लगा रही हो , पेड़-पौधे पीले पत्तों से अटे नए कपड़ों के इंतज़ार में अधीर हुए किसी बच्चे कि तरह विकल हो रहे थे ,गन्ना खेतों में खड़ा-खड़ा थक रहा था, कहीं गेहूं के बीच सरसों इठला रही थी तो कहीं नन्हा जूही का पौधा दूब घास के झुण्ड में वसंती हवाओं से अठखेली कर रहा था, पाले का चिंताओं से भरा मौसम ख़त्म होते ही ठण्ड के साथ-साथ रमेश जैसे छोटे किसानों की चिंताएं भी शिथिल पड़ने लगी थीं, पूष का शायद ही ऐसा कोई दिन गुज़रा था जब रमेश अपनी पत्नि शामली के लाख मना करने के बावजूद चार बजे उठ कर खेतों पर न गया हो | किसानों का भोर में खेतों पर जाना कोई नयी बात नहीं थी पर ये लखीमपुर खीरी देहात के खेत थे जो दुधवा नेशनल पार्क से सटे थे ,अक्सर रात होते ही खेत-जंगल कब आलिंगन कर लेते थे पता नहीं चलता था , दिन के आठो पहर इस क्षेत्र के किसानों को ठन्डे मौसम ,सूदखोरों के साथ-साथ जंगली जानवरों से भी लोहा लेना पड़ता था ,पर रमेश निडर था ,शामली को छोड़ वो किसी से भी लोहा ले सकता था |
एक दिन रमेश के खेत से घर लौटते ही शामली चिल्लायी, “सुनो जी मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि तुम भोर होते ही खेतों पर मत जाया करो “ पड़ोस के झुमरू पर तेंदुए के हमले के जुम्मा-जुम्मा चार रोज भी नहीं हुए हैं और तुमने फिर तडके खेतों पर जाना शुरू कर दिया , किसी दिन कुछ हो गया तो ! रमेश चारपाई पर बैठते हुए –” अरे मेरे ऊपर कौन सी बड़ी ज़िम्मेदारी है , एक लड़की है वो भी सयानी हो चली है , बस उसके हाथ पीले हो जाएँ तो खेत-बाग़ बेचकर हरिद्वार में ठाकुर जी के ध्यान में जिंदगी गुजारूँगा,रमेश ने गहरी श्वास छोड़ते हुए जवाब दिया . शामली रमेश की बात के पीछे छुपे मर्म को खूब समझती थी ,रमेश के मन में पुत्र कि इच्छा नासूर की तरह टीसती रहती थी, “कौन से इष्ट के द्वार पर मत्था न रगड़ा, किस आश्रम या दरगाह पर एड़ी न घिसी पर सब बेकार गया , सास-ससुर भी पोते की इच्छा मन में लिए बैकुंठ गमन कर गए पर किस्मत के लेखे को कौन मिटा सकता है ,मुझ अभागन,कुलनाशिनी में ही कोई खोट होगा,बडबडाते हुए शामली की आँखें भर आयीं” कोई प्रतिक्रिया देने से पहले ही रमेश चारपाई पर लेटा स्वपन लोक में जा पहुंचा था , अब हवाओं में सन्नाटा चीरते उसके खर्राटे थे |
इन दो चेतनाओ का जीवन उनकी लड़की सरोज के सहारे ही कटता था, सरोज बड़ी रूपवान ,गुणवान कन्या थी , उसके रूप,गुण से ही राजसी लक्षण प्रकट होते थे , चौड़ा माथा, लम्बे बाल, गौर वर्ण , शामली तो उसे देखते ही तर जाती थी ,शामली ने सरोज का लालन पालन पुत्र के समान ही किया था , ये शामली की अनुशासन ,निष्ठा ही थी कि सरस्वती भी सरोज पर हमेशा मेहरबान रहती थी, इसी साल सरोज कस्बे के कॉलेज में अव्वल आयी थी ,रमेश सरोज की शादी का मन बना चुका था ,पर अब दौर बदल चुका था , भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ पश्चिमी विचारों का प्रभाव भारत पर पानी से भरे बादलो की तरह फट पड़ा था ,हर क्षेत्र में सनातन नूतन परम्पराओं का संघर्ष चल रहा था ,खीरी भी इससे कैसा अछूता रह पाता ,शामली भी अपनी लड़की को पढ़ा लिखा कर कलेक्टर बनाना चाहती थी ,सरोज की भी यही इच्छा थी कि वो आगे पढने के लिए शहर के डिग्री कॉलेज जाये ,पर रमेश उसकी शादी कर कर्त्तव्य मुक्त होना चाहता था,इसी बात को लेकर कई दिनों से शाम होते ही घर कुरुक्षेत्र का मैदान बन जाता था | “मैं कहती हूँ कि बड़े कॉलेज जाने में क्या हर्ज़ है”गाँव से ट्रेन जाती है और लड़कियों के साथ ये भी रोज आ जाया करेगी ,शामली रमेश को पानी देते हुए बोली, “अरे जवान लड़की कुबेर के खजाने कि तरह संभल कर रखी जावे है,तुम लोगों का तो टीवी देख-देख कर दिमाग ख़राब हो गया है ,इसलिए मैं इस बला को घर पर नहीं लाना चाह रहा था ,ना जाने कौन सा टोना फेर दिया है तुम्हारे दिमाग में, कहते-कहते रमेश खाना खाने चटाई पर बैठ गया , शामली थाली परोसते हुए धीरे से बोली –सुनो जी,अब दौर बदल चुका है ,अब तुम्हारा-हमारा ज़माना ना रहा ,आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं,पर रमेश कुछ सुनने को तैयार न था, अरे तुम लोगों को बाहर समाज का कुछ न पता है , जो दुनिया टीवी पर दिखाई देती है वो सच न होती है ,दुनिया में लोग महिला अधिकारों की बातें करते उनके आज़ादी, सम्मान की दुहाई दी जाती है,वहीं दूसरी तरफ यही लोग महिलाओं को पिज़्ज़ा,समोसे,मलाई की तरह विज्ञापनों ,फिल्मों,नाटकों में किसी लसलसाती वस्तु के समान पेश करते हैं , अरे- जिन्हें तुम टीवी पर देखती हो उन्हें वहां तक पहुँचने के लिए कैसे-कैसे समझौते करने पड़ते हैं ,ये किसी को न दिखाई देता है , अरे-ये सभ्य समाज बड़ा दोगला है ,ये लोग ही नियम बनाते हैं,फिर उसे तोड़ते हैं ,बड़े-बड़े घर की महिलाएं भी इनका शिकार बन जाती हैं ,अरे ! अपने बच्चों के बाप के नाम के लिए भी कोर्ट का सहारा लेना पड़ जाता है, शहर में सरे आम दरिन्दे लड़कियों को नोच कर फेंक देते हैं ,कभी-कभी समाचार देखो तो कुछ पता भी चले , और-तू चार जमात पास मुझे मत समझा ,अब वो ज़माना न रहा ,यहाँ गाँव में पुश्तैनी खेती करने से पहले मैंने मुंबई शहर में दो साल टैक्सी चलायी हैं , शहरों कि आबो-हवा मैं तुझसे ज्यादा पहचानता हूँ ,अरे जब मीना कुमारी जैसी हीरोइन की लाश अस्पताल में लावारिश पड़ी रही थी ,कितनी इज्ज़त थी,कितना यश था ,आखिर में कोई पानी पिलाने वाला न मिला , ये दुनिया ने औरत को कुल्हड़ की रबड़ी से ज्यादा कभी कुछ न समझा है, और सुन जड़ से दूर रहकर कौन सा पौधा फला है ,अपनी पुरानी परम्पराएँ ,सामाजिक नियम हमारी जड़ें हैं,मै इन्हें नहीं छोड़ सकता ,खाने की थाली को दुत्कारते हुए रमेश खड़ा हो गया और बडबडाते हुए कमरे में चला गया ,वो जानता था कि वो गलत है | शामली ने रमेश का यह रूप पहली बार देखा था ,आज तक रमेश को उसने इतने गुस्से में कभी नहीं देखा था ,उस रात किसी ने भी खाना नहीं खाया ,पर शामली हार कहाँ मानने वाली थी ,वो कई दिनों तक रमेश की मान-मुन्नवल करती रही,कस्बे के कॉलेज के प्रधानाचार्य और शिक्षकों की राय के आगे रमेश आखिर टूट ही गया ,जल्द ही सरोज महाविद्यालय की छात्रा हो गयी |
सुबह पौ फटते ही विद्यालय जाने की तैयारी शुरू हो जाती, कस्बे-गावों को शहर से जोड़ती मीटर गेज़ (छोटी पटरी) कि खटपट करती ट्रेन थी ,दुनिया में जहाँ अन्य देशों में बुलेट ट्रेन,मैंगलेव ट्रेन चल रही थी ,इस जगह की मीटर गेज़ ट्रेन अभी भी इस क्षेत्र कि सनातनता को संरक्षित किये हुई थी ,शहर जाने के लिए छोटे कस्बे ,गाँव इस ट्रेन पर निर्भर थे ,मजदूर,बढ़ई,नाई,लुहार सभी काम की तलाश में इसी से शहर जाते थे,अक्सर ये ट्रेनें प्रतिदिन जाने वाले विद्यार्थियों के कब्ज़े में हो जाती थी, वो लोग चैन खींचकर अपने अनुसार इसे रोकते व चलाते थे ,रेलवे भी इन ट्रेनों को चलाकर बस अपना सामाजिक दायित्व पूरा कर रहा था ,सुरक्षा के नाम पर गाड़ी में एक सिपाही भी नहीं होता था ,जिसका लड़कों का झुण्ड पूरा फायदा उठाता था ,ये लड़के गाँव के किसानों व मजदूरों के बच्चे थे,जो मार्गदर्शन के अभाव में अक्सर भटक जाते थे,और कुछ ये नव-उदारवाद का दौर था,अब समाज में युवा राष्ट्रचिंतन,मर्यादा,अनुशासन छोड़ स्वच्छन्दता का अनुयायी था | कसरती बदन,शाम होते ही बियर दारु के पैग,गर्लफ्रेंड अक्सर इन्हीं विषयों में युवाओं की चिंतन ऊर्जा आसक्त रहती थी, इस दौर में मेहनतकश,श्रमजीवी अब गुजरे इतिहास हो गए थे ,अब श्रम का नहीं धन का बोलबाला था,युवा वर्ग का प्रमुख उद्देश्य भी अब येन-केन-प्रकारेण लघु मार्ग से अपार धन प्राप्त करना भर रह गया था ,उनके आदर्श भी अब अधिकतर बेईमान,भ्रस्ट,कातिल,दबंग लोग हो गए थे,अक्सर ये गुण एक एक राजनीतिक व्यक्तित्व में आसानी से मिल जाते थे,कस्बे के युवा निर्वाचित ब्लाक प्रमुख इस पूरे क्षेत्र के युवाओं के आदर्श थे, दो क़त्ल करने के बाद उनका राजनीतिक ,आर्थिक उन्नयन सभी के लिए प्रेरणा का विषय था,उनका भतीजा पंकज जो छह फुट का हट्टा -कट्टा जवान था ,वो भी इसी ट्रेन से शहर जाता था और युवाओं का अघोषित नेतृत्त्वकर्ता भी था, इसी सवारी गाड़ी में सबसे शोषित वर्ग महिलाएं और लड़कियां ही थीं जिन्हें रोज़ इन अक्रांत युवाओं से लोहा लेना पड़ता था,शामली भी धीरे-धीरे इसकी आदी हो गयी थी लेकिंन पढाई में शामली ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी, घर पर भी देर रात लैंप की रौशनी और वो ही आखिरी आराम करने वाले जन होते थे,लाइट भी कस्बे में ईद के चाँद कि तरह कभी-कभी ही दिख जाती थी, लाइट के साथ-साथ और भी कई चीज़ों थी जिनसे शामली को दो-दो हाथ करने पड़ते थे,इधर ट्रेन में पंकज सरोज को कई बार दोस्ती का निमंत्रण दे चुका था,पर सरोज बड़ी विनम्रता से उसको मना कर देती थी,पर अब बात बढ़ चुकी थी,पंकज आए दिन सरोज को परेशान करने लगा था,कभी ब्लेड से अपनी कलाई पर सरोज का नाम लिखता,कभी स्टेशन की दीवार पर “पंकज-लव्ज़-सरोज लिखता” सरोज इन सबसे बहुत परेशान रहने लगी ,धीरे-धीरे पंकज कि हठधर्मिता जूनून बनती गयी, अब वो ट्रेन कि दीवारों से लेकर कॉलेज परिसर यहाँ तक कि नोटों पर भी पंकज-सरोज लिखने लगा,एक दिन शाम को घर लौटते समय पंकज ने सरोज को रोक लिया-“देख सरोज तू या तू मुझसे दोस्ती कर या शादी या तू क्या चाहती है मुझे बता दे”? पंकज बोला ,सरोज ने गुस्से में जवाब दिया-“देख पंकज मुझे अभी पढ़ना है,मुझे इन चक्करों में नहीं पड़ना और तू जो ये दीवारों और नोटों पर मेरा नाम लिखने का जो तमाशा कर रहा है,ये ठीक नहीं है” कहते हुए सरोज चली गयी,इन सबकी भनक न जाने किस तरह रमेश को लग गयी थी,रात को ही रमेश काफी समय से सुप्त ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा ,आज से सब पढाई-वढाई बंद,जो बनना था बन गयी,दीवारों से लेकर कागज के नोटों पर तेरे किस्से हैं ,सरोज को बोलने तक का मौका नहीं था,गुस्से की अभिव्यक्ति कमज़ोर के द्वार ही ढूंढती है,शामली भी युद्ध में दुश्मन के सामने समर्पण करने वाले सिपाही कि तरह रमेश को सुन रही थी,वो जानती थी कि सरोज निर्दोष है ,पर रमेश अब सुनने वाला नहीं था,सरोज का कॉलेज जाना बंद हो गया था,रमेश उसके विवाह के लिए लड़के की खोज में लग गया था,शामली ने उसको समझाने की बहुत कोशिश की पर अब वह टूटे बांध के जल प्रवाह की तरह निरंकुश था,जल्द ही रमेश की कोशिश कामयाब होने लगी,पड़ोस के गाँव में सरोज की शादी तय हो गयी,सरोज अब बिना जुर्म के सजा पाए कैदी की तरह मौन हो गयी थी,कभी-कभी शामली के साथ रोकर अपना मन हल्का कर लेती थी,उधर पंकज का उन्माद चाचा के तुगलकी मशवरों से गंभीर रूप ले चुका था, शादी के तय हो जाने की बात ने आग में घी का काम किया,एक दिन नेता जी की महफ़िल में अंगूर की बेटी का जलवा था,महफ़िल में पंकज का मर्ज मनोरंजन का साधन बन गया था,एक ने पलीता सुलगाते हुए कहा-अरे भाई ! पंकज को तो शादी में काम करवाना पड़ेगा और क्यूँ ना हो,इलाके की लड़की तो बहन के समान होती है,दूसरे ने चुटकी ली,पंकज को काफी चढ़ गयी थी,उसकी शादी तो मैं करवाऊंगा,बडबड़ाते हुए पंकज महफ़िल से भाग गया,पंकज क्रोध की अग्नि में तप रहा था,ये उसकी बेईज्ज़ती थी,वो सरोज को सबक सिखाने का मन बना चुका था,एक दिन सरोज शामली के साथ शादी का सामान खरीदने शहर जा रही थी, पंकज आजकल शहर नहीं जाता था,पर ये खबर उस तक पहुंचाई जा चुकी थी,यही मौका था सबक सिखाने का,शाम ढल चुकी थी,शामली-सरोज ट्रेन से उतरकर पगडण्डी से घर जा रहे थे,अचानक झाड़ियों में छुपे पंकज ने सरोज के चेहरे पर हाथ में छुपी बोतल से तेजाब फ़ेंक दिया,इससे पहले सरोज कुछ समझ पाती ,धधकता लावा उसके चेहरे पर फ़ैल चुका था,शामली सदमे में चीखकर बेहोश हो गयी थी |
आधी रात का समय था,स्वास्थ्य केंद्र का आपातकालीन कक्ष पेट्रोमेक्स की रौशनी और मच्छरों से आच्छादित था,रमेश और शामली एक कोने में बैठे दहाड़ मार-मार कर रो रहे थे,स्वास्थ्य केंद्र में केवल नशे में धुत कम्पाउण्डर था, डॉक्टर साहब को बुलावा भेजा गया,पर वो घर पर सो गए थे,सुबह आने का आश्वासन मिल गया था,उधर सरोज का चेहरा बुरी तरह से जल चुका था,जिसको देखकर पहले प्रसन्नता और सकारात्मकता के पुष्प पल्लवित होते थे,वही अब जली हुई चमड़ी के छेदों से झांकते सफ़ेद हड्डी के टुकड़े थे,सरोज रात भर उसी स्वास्थ्य केंद्र के कक्ष में मृत्यु से लडती रही,लेकिन वो अभी भी बेहोश थी,सुबह होते-होते पूरे क्षेत्र में खबर फ़ैल चुकी थी,हवाओं में बादलों की तरह अफवाहें भी तैरने लगीं,एक कहता लड़की का चाल-चलन ठीक न था,दूसरा कुछ तो तीसरा कुछ,रमेश रात में थाने भी गया था, पर आज़ादी के इतने साल बाद आज भी कानून केवल उस दरिया की तरह था,जिसका पानी केवल धनी और प्रभावशाली लोगों के लिए ही उपलब्ध था,कमज़ोर और सर्वहारा के लिए यहाँ आज भी कुछ न था,सुबह के सूरज के साथ डॉक्टर साहब ,पुलिस भी खाना-पूर्ति के लिए आये,जल्द ही सरोज को शहर के अस्पताल रेफर कर दिया गया,पुलिस ने भी कागज़ी कार्यवाही पूरी कर पंकज के यहाँ दबिश भी दी,पर पंकज रातों-रात क्षेत्र से दूर जा चुका था,राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते केस भी बहुत कमज़ोर बनाया गया था,उधर रमेश और शामली की तो मानो खड़ी फसल में आग लग गयी थी,दोनों बिना खाये-पीये ही कई दिनों तक शहर के अस्पताल में ही रुके रहे,डॉक्टरों के प्रयासों से सरोज बच तो गयी थी पर तेज़ाब के असर से उसका चेहरा छत- विछत हो गया था एक आँख की रौशनी हमेशा के लिए चली गयी थी कई महीनो के इलाज के बाद सरोज घर आ गई थी अब पूरा घर मातम की चादर ओढे हुए था, रमेश ने खेतो पर जाना छोड़ दिया था ,सरोज और शामली का सारा समय केवल रुदन विलाप मे ही कट जाता था | शामली ने घर के सारे दर्पण तोड़ दिए थे जिन्हें देखकर सरोज अक्सर रो देती थी ,अब अँधेरा ,तन्हाई ही उसके संगी साथी हो गए थे वो बिना कुछ खाए पिए कई कई दिनों तक अँधेरे कमरे मे ही पड़ी रहती थी जाने कितनी राते घर मे बिना दिया प्रकाश के ही गुजर जाती थी ,कभी कभी तीनो में हफ्तों तक कोई संवाद नहीं होता था,हां कभी कभी रमेश और शामली आपस मे झगड़ते जरुर थे, रमेश दुर्घटना के इतने समय बाद भी अक्सर शामली को ही इसका जिम्मेदार ठहरता रहता, ये सदमा शामली ज्यादा दिन न झेल पाई | न जाने कौन सा रोग लग गया, रातो -रात का तीव्र ज्वर जीवन की डोर टूटने का बहाना बन गया |
सरोज ,रमेश और एक निर्जीव नरकंकाल में सांसो की गति का अंतर मात्र रह गया था ,काल यात्रा मे दोनों ट्रेन मे गंतव्य की इंतज़ार मे बैठे यात्री की तरह मुत्यु का इंतज़ार करने लगे थे,साँसों का क़र्ज़ भी महाजन के सूद की तरह ख़त्म नहीं होता था ,इस गहरे अवसाद को सरोज से और न सहा गया उसने घर मे रखी कीटनाशक दवाई को पी लिया रमेश का आखिरी साथी भी उससे विदाई ले रहा था पर मत्यु भी सरोज से सौभाग्य और सुखों की तरह दूर भाग रही थी, जल्द ही इलाज के चलते उसे बचा तो लिया गया पर कीटनाशक के प्रभाव से उसका एक गुर्दा बुरी तरह ख़राब हो गया था | जीवन की दुश्वारिया और बढ़ गयी |
अस्पताल के कमरे में सरोज की सिसिकियो की लय को तो तोड़ते हुए एक अधेड़ उम्र की महिला ने प्रवेश किया , खादी की साड़ी, चौड़ी बिंदी चेहरे पर सत्य का तेज प्रकाशमान था वो सरोज के बेड के निकट आकर खड़ी हो गयी ,सरोज के सर पर हाथ फेरते हुए उंगलियों से उसके बालो को सवारने लगी ,सरोज ने प्रश्न पूछती निगाहों से उनकी तरफ देखा | बेटा “मेरा नाम गायत्री है मैं लखनऊ में जागृति नामक संस्था चलाती हूँ ”बेटी तुम मेरे साथ चलोगी” ? महिला ने अपनायत भरे लयजे से पूछा |
गायत्री प्रदेश का जाना पहचाना नाम था, महिला अधिकारों और शोषण की शिकार महिलायों के प्रति उनका जज्बा आये दिन अखबारों और समाचारों की सुर्खिया बनता था, कभी लखनऊ में विलासिता, भोतिकता के प्रतीक के रूप प्रसिद्ध ये नाम आज कल समाजसेवा के क्षेत्र का उत्तरी तारा था | परिवार के साथ हुई एक दुर्घटना ने जीवन की दिशा ही बदल दी थी | अक्सर भोतिकता, सांसारिक लिप्ताओ के संकीर्ण शिखर से गिरा मनुष्य वैराग्य, विरक्ति के धरातल पर ही जीवन का सत्य खोजता है यही खोज गायत्री देवी के समाजसेवा का बीजक था | इतनी बड़ी हस्ती का सरोज को अपने साथ ले जाने का अनुग्रह रमेश ठुकरा न पाया, अस्पताल की कैंटीन मे चाय पीते हुए गायत्री रमेश को समझा रही थी “देखो रमेश उस घटना के पांच साल बिताने के बाद भी सरोज अभी भी उसी समय में जी रही है” तुम्हारे यहाँ कोई देखभाल करने वाला नहीं है अब उसे शारारिक और मानसिक सहारे की जरुरत है जो उसे हमारे आश्रम में ही उसे मिल सकती है | ठीक है मेमसाब ! वैसे भी अब उस हाड़ मांस के पुतले में अब बचा ही क्या है सोचा था डोली में बिठा के विदा करूँगा ,बोलते -बोलते रमेश का गला भर आया | गायत्री ने रमेश के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा रमेश मैंने सरोज की बीती एक मैगजीन में पढ ली है अब जो होना था हो चुका अब हमें आगे देखना है, रमेश आधे मन से हामी भर देता है |
जल्द ही सरोज को अस्पताल से छुट्टी दिलाकर गायत्री देवी अपने साथ लखनऊ ले जाती है, शहर की चे-चे ,पो-पो से दूर उनकी महल की तरह विशाल हवेली थी, चारो तरफ चौड़ी-चौड़ी सड़के ,दूर तक लेटे हुए सपाट मैदान थे ,हवेली के एक कोने में आश्रम था जहाँ महिलाओ का पूरा समूह रहता था | नयी जगह पर सरोज की झेप को समझते हुए गायत्री देवी ने समझाया “देखो बेटी तुम अभी बीमार हो जब तक तुम ठीक नहीं होगी घर पर ही रहोगी बाद में तुम्हे आश्रम में भेजा जायेगा इसे अपना ही घर समझना बेटी “इस हवेली में अगर आश्रम को छोड़ दे तो मैं और मेरी चार वर्षीय बेटी जानकी रहती है” जानकी बहुत ही शरारती ,तेज तरार लड़की है ये तुम्हारा पूरा ख्याल रखेगी ,गायत्री देवी ने जानकी की तरफ हँसते हुए देखा |
……………………………….भाग २ …………..

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