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भूखमरी और आर्थिक विकास ( पूर्व प्रकाशित) राजनीतिक आलोचना कांटेस्ट

Posted On: 28 Jan, 2014 Others में

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vijay

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जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप भी आज उसके जर्जर एवम रोगिण देह को नहीं रोक पा रहे थे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसके हाथ बिजली की गति से काम कर रहे हो उसकी कुल्हाड़ी वृक्ष पर ऐसे प्रहार कर रही थी जैसे ये प्रहार वो अपने दुःख और कष्टों पर कर रही हो तभी ऐसे लगा जैसे अपने बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए दो दिन भूखी माँ के लिए स्वयं वृक्ष को दया आ गयी और उसने अपनी शाखाए खुद ही गिरा दी जल्द ही डोडा कुछ लकड़िय इकट्ठा कर उनको बेच कर खाना और दवाइयां लेकर अपने घर पहुचती है जहाँ उसका तीन साल का बेटा जिंदगी और मौत से अपनी आखरी लड़ाई लड़ रहा था |
पति के आत्महत्या करने के बाद डोडा के जीवन का एक मात्र सहारा भी आज उससे अन्तिम विदाई लेने के लिए तेयार था बेटा को मृत्यु शैया पर देखकर डोडा तो मानो जड़ मूर्ति हो गयी आज उसके लिए जीवन निरुद्देश्य हो गया था अब उसके लिए संसार में कुछ भी नहीं बचा था उसके ह्रदय की पीड़ा की अभिव्यक्ति आज संसार की किसी भी भाषा सामर्थ्य से परे की बात हो गयी थी उसके कंठ में कोई स्वर ऐसे ना थे जो उसके रुदन विलाप को प्रकट कर सके डोडा आज मौन हो गयी | ये सब पड़कर आपको लग रहा होगा की ये सब किसी फिल्म का भावात्मक द्रश्य या किसी उपन्यास का अंश है किन्तु आप को ये जानकार हेरानी होगी की ये महाराष्ट्र के विदर्भ प्रान्त में एक किसान के घर की सच्ची कहानी है जिसने साहूकारों के क़र्ज़ के बोझ एवेम भूखमरी के चलते आत्महत्या कर ली थी और उसकी आत्महत्या के एक महीने के अंदर ही उसके पुत्र मधुसूदन की भूखमरी एवम बिमारी से मौत हो गयी जिसके सदमे से उसकी पत्नी डोडा भी इस दुनिया से चल बसी पर इस कहानी में कोई बेचने लायक मसाला ना होने के कारण ये भारतीय लोकतंत्र के चोथे स्तंभ मीडिया की नज़र में ना आई ऐसे ना जाने कितने लोग है जो भूखमरी एवं निर्धनता से मर रहे है या आत्महत्या करने के लिए मजबूर है अगर हम uno की विश्व भूख सुचकांक (GHI) की रिपोर्ट पर निगाह डाले तो पूरे भारत में भूख से मरने वाले लोगों की संख्या विश्व में भूख से मरने वाले लोगों की एक तिहाई है लेकिन फिर भी मानवता के माथे पर कलंक रूपी इस समस्या की ओर ना किसी का ध्यान जाता है और ना ही ये खबरे मीडिया की सुर्खिया बनती है जरा कल्पना कीजिये उस पल को जब आपको तेज भूख लगी हो और आपको खाना ना मिले उस असमर्थता को महसूस करे जो भूख से तडपते और मरते लोगों को होती होगी जब जीवन भूख के आगे ही नहीं मृत्यु के सामने भी समर्पण कर देता है ऐसी मौते अपने पीछे वर्तमान व्यवस्था पर कई प्रश्न छोड़ जाती है क्योंकि जहा देश में भूख से मौते हो रही है वही सरकारी गोदामो में 66 लाख टन अनाज सड़ रहा है या चूहों द्वारा खाया जा रहा है जिसको सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने आर्थिक विवशता के चलते गरीबो में मुफ्त बाटने से इंकार कर दिया मैं ये जानना चाहता हु कि ऐसी कोन सी आर्थिक विवशता है जिसके चलते सरकार लोगों को भूखा तो मरने दे सकती है पर मुफ्त में अनाज नहीं बाट सकती नवउदारवादी दवाब के चलते राशन प्रर्णीली को तो 1997 में ही लगभग बंद ही कर दिया गया तो क्या देश के आर्थिक विकास के लिए भूखे लोगों कि बलि आवश्यक हो गयी है भूख से बड़ा कोई अपमान नहीं है लाभों के छन छन कर नीचे तक पहुचने के सिदान्तो से गरीबी व भूख की न्यायसंगत आकांशाओ का समाधान नहीं हो सकता है, क्यों आर्थिक समानता का सपना केवल राष्ट्र पति एव म प्रधानमंत्री के भाषणों में ही सुनने को मिलता है इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायगा की इसका लोकतन्त्र 65 वर्ष का तो हो गया है पर आज तक कोई चुनाव ऐसा नहीं हुआ जिसमे राजनीतिक पार्टीयों ने देश की आर्थिक नीतियों को चुनावी मुद्दा बनाया हो आज भी हम अपना चुनाव मंदिर एव म मस्जिदों,जाति धर्मो के नाम पर लड़ते है अर्थशास्त्र के नाम पर जनता केवल संसेक्स ,मह्गाई दर ,SLR,GDP तक ही सीमित होकर रह जाती है हम ये नहीं सोचते की ये ऐसा कोन सा आर्थिक तंत्र है जिसमे आम आदमी के बैंकों में जमा बचत के पैसे को दुगना होने में 8 साल लगते है जबकि रिलायंस ,टाटा और अन्य ओद्योगिक घरानों की कुल सम्पति हर तीसरे साल दुगनी हो जाती है जहा अपने पसीने से अन्न पैदा करने किसान आत्महत्या को मजबूर है जबकि शेयर मार्केट व वायदा बाज़ार के दलाल बिना श्रम के करोड़ पति हो रहे है इस आर्थिक विषमता ने समाज के मूल दाचा को छिन्न भिन्न कर दिया है इस प्रथ्वी पर ही समान्तर में मानो कई दुनिया चल रही है एक वो लोग है जो अपने लिए शोचालयों में भी लाखो रुपये खर्च कर रहे है एक वो लोग भी है जो २८ रुपये होने पर भी गरीब नहीं है ये कोन सा अर्थशास्त्र है जिसका समाजशास्त्र से कोई सरोकार नहीं है |प्रकति ने सबको जीने का बराबर अधिकार दिया है और उसके संसाधनों पर भी सबका बराबर अधिकार है एक गुलाब के फूल की सुंदरता किसी की निजी मिल्कियत नहीं हो सकती उसी तरह प्रकति के संसाधनों पर मनुष्यों का समान अधिकार है फिर ये कैसे संभव हुआ की डोडा जैसे परिवार भूख से मृत्यु आलिगंन कर रहे है और कुछ परिवारों की पार्टियों में सेकडों किलो खाना झूठन में फेका जा रहा हो ,इसका कारण है पूजीवादी अर्थव्यवस्था पूजी के केंद्रीकरण के कारण ताकत केवल कुछ गिने चुने लोगों के हाथ में ही रहती है जो समाज को अपने हिसाब से चलाते है सरकारे भी उन्ही का सरक्षण करती है |
इन चंद मुठी भर लोगों के हितों के कारण समाज में एक आपाधापी का माहोल बना दिया गया है जहा पूंजी के केम्द्रीकरण के चलते देश में बेरोजगारों की फोज खड़ी हो गयी है तेजी से चलते निजीकरण ने शिक्षा और चिकित्सा जैसे शेत्रो को भी लील लिया है मुनाफा और सिर्फ मुनाफा का संकल्प लिए ओद्योगिक घरानों द्वारा सरकार की मदद से देश के सार्वजनिक उपक्रमों की सरेआम लूटपाट कर रहे है २G ,३G,कोयला ब्लाक आवंटन इसके कुछ छोटे उदाहरण है इन सब ने आज देश में एक मौन आर्थिक गुलामी जैसे हालात पैदा कर दिए है जिसका समाज पर असर सहज ही देखा जा सकता है आज हर कोई एक असुरक्षा केवातावरण में जी रहा है महगाई,भ्रस्टाचार,समाप्रदायिकता,शत्रिये संघर्ष जैसे समाजिक बुराईयो ने आज देश को खोकला कर दिया है इस अराजकता ने मानव की सोच को बेहद संक्रिड़ ,स्वार्थपरक बना दिया है हर कोई खुद की दुनिया में ही व्यस्त हो चला है सहअस्तित्व भावना समाप्त हो रही है आज हम इतने असवदेंशील हो गए है की अपने आस पास कोई दुर्घटना एवम किसी की मृत्यु हो जाने पर भी लोग उसे अनदेखा कर अपने काम पर चले जाते है कोई भी मदद को नहीं आता है जबकि यदि हम जानवरों के व्यव्हार का अध्ययन करे तो हम पायेगे की जानवर भी अपने साथी या हम नस्ल की संकट में मदद करता है तो क्या हम जानवरों से भी बदतर स्थिति में पहुच गए है जीव विज्ञानं कहता है की मनुष्य को जानवर से आदमी बनने में सेकडों वर्ष लग गए फिर कैसे हम इतनी जल्दी आदमी से जानवर बन सकते है ?
आइए हम अपने समाज को जंगल होने से बचाए ! हमारे इतिहास ने अनेको क़ुरबानी देकर हमे यहाँ तक पहुचाया है अब ये आप पर निर्भर है की आप अपने आने वाली पीड़ी को वसीयत में आलिशान मकान ,लंबा चोड़ा बैंक बैलेंस देकर जाना चाहेंगे या एक अच्छा समाज जहा जानवर नहीं बल्कि इंसान रहते हो जहा कोई भूख से कोई मासूम ना मर रहा हो , जहा बिना इलाज के किसी को दुनिया ना छोडनी पड़े जहा हर किसी को जीवन की बुनयादी सुविधा मिले |

हम सजायेगे सवारेंगे निखारेंगे तुझे ,
हर मिटे नक्श को उभार,फिर से चमकायेगे तुझे
डार पे चड फिर से पुकारेंगे तुझे
राहे अग्यार की देखे ये भला ठोड नहीं
हम भगत सिंह के साथी है कोई और नहीं

(v.k.azad)

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