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"केजरीवाल", नये नवेले या शातिर-माहिर राजनेता ?????

Posted On: 18 Jul, 2015 Others में

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शिशिर घाटपाण्डे

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अप्रैल २०११ में भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल विधेयक हेतु महा आन्दोलन छिड़ा जो आज़ादी के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा जन आन्दोलन था. जितने विराट स्वरूप में इसकी शुरुआत हुई, मात्र तेरह दिनों में इसका अन्त भी उतनी ही लचरता से विफ़लता के स्वरूप में हुआ. लेकिन जो लोग इसकी विफ़लता के ज़िम्मेदार थे, जिन्होंने सरकार से समझौता किया, उनकी आँखों में नई चमक दिखाई देने लगी थी, स्वयम के राजनैतिक भविष्य को लेकर. अप्रत्यक्ष रूप से अन्ना हज़ारे पृष्ठभूमि तैयार कर ही चुके थे, स्वर्णिम अवसर था और उस स्वर्णिम अवसर को बस भुनाना बाक़ी था. अन्ना हज़ारे अपने गाँव-अपनी कर्मस्थली “रालेगण सिद्धि-महाराष्ट्र” वापस जा चुके थे, शेष रह गई थीं तो बस उम्मीदों की आस लगाए लाखों आँखे जो शायद अन्ना के वापस चले जाने के बाद, आन्दोलन के दौरान उनके साथियों में आशा की नई किरण तलाश रही थीं.

जैसा कि अक़्सर होता है, शुरुआत में तो राजनैतिक दल बनाये जाने की किसी भी सम्भावना से साफ़ इंकार किया गया लेकिन बाद में जनता की तीव्र माँग का हवाला देते हुए आख़िरकार पार्टी बना ही ली गई. आन्दोलन के दौरान जुड़ें लाखों लोगो विशेषकर युवाओं का बेहतरीन सहयोग भी मिला साथ ही मिली चुनावों में भारी सफलता. आशा के विपरीत, अप्रत्याशित रूप से दिल्ली की सत्तर विधानसभा सीटों में से अठ्ठाईस पर विजय प्राप्त हुई. सत्ता पर नज़रें तो गढ़ी हुई थीं लेकिन किसी का समर्थन भी ज़रूरी था. इतने में कॉंग्रेस की ओर से ही परोसी हुई थाली की तरह, समर्थन की पेशक़श आ गई. अँधा क्या चाहे दो आँखें मानों उसकी तो मुँहमाँगी मुराद ही पूरी हो गई. पहले तो सशर्त समर्थन लेने का नाटक किया गया, अन्ततः बच्चों की क़सम को ताक पर रख कर, सरकार बनाने की जनता की पुरज़ोर माँग का हवाला देते हुए उसी कॉंग्रेस से समर्थन ले लिया गया जिसे जन आन्दोलन के दौरान पानी पी-पी के कोसा गया था, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार बताया गया था.

बहरहाल, सत्ता और पॉवर की भूख अभी शान्त नहीं हुई थी. लोकसभा चुनावों की सुगबुगाहट से सत्ता और पॉवर की एक नई गन्ध आने लगी थी, केन्द्र की सत्ता और पॉवर की. महत्वाकांक्षाएँ अब बलवती होने लगीं थीं. शायद ये विश्वास भी था कि लगभग पचास सीटें आ जाएँगीं और लोकसभा त्रिशंकू होगी. ऎसी स्थिति में केन्द्र की राजनीति को प्रभावित करते हुए “ब्लैकमेलिंग” हेतु ये स्वर्णिम अवसर है. इसी विश्वास के बलबूते दिल्ली की जनता और सत्ता को मँझधार में छोड़कर “क़ुर्बान अली” बनने का प्रयास करने के साथ-साथ ठीकरा कॉंग्रेस-बीजेपी पर फ़ोड़ते हुए लोकसभा चुनाव लड़ा गया लेकिन इस बार आशा के विपरीत सवा चार सौ से ज़्यादा सीटों पर ज़मानत ज़ब्त हो गई.

अब तो हालत धोबी के कुत्ते जैसी हो गई, ना घर के रहे ना घाट के. छटपटाहट बढ़ने लगी, हाथ से फिसली हुई दिल्ली की सत्ता फ़िर याद आने लगी. स्वच्छ-साफ़ सुथरी-ईमानदार-पारदर्शी राजनीति के जुमले, जुमले मात्र से होकर कहीं दूर पीछे छूटते चले गये. काँग्रेसी विधायकों को तोड़ने की यथासम्भव कोशिशें की जाने लगीं, धर्म-जातिगत आधार पर भी जोड़-तोड़ की बातें की जाने लगीं. बहरहाल, सफ़लता नहीं मिली.

अन्ततः दिल्ली चुनावों की घोषणा हुई. एक और चाल चली गई. नारे और पोस्टर लगे “केन्द्र में मोदी, दिल्ली में केजरीवाल”. लुभावने वादों की झड़ी लगा दी गई. कार्यकर्ताओं, विशेषकर युवा कार्यकर्ताओं ने अभूतपूर्व जोश और उत्साह के साथ पूरी लगन से जी तोड़ मेहनत की. दिल्ली के हर घर में घर-घर में गए, उनन्चास दिनों के बाद सरकार छोड़ने के लिए हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए एक मौक़ा और दिए जाने की विनम्र विनती की. दूसरी ओर बीजेपी द्वारा, पन्द्रह सालों से विपक्ष में होते हुए भी पार्टी के लिए जी-जान लगा देने वाले वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर ऐन मौक़े पर बाहरी व्यक्ति को मुख्यमन्त्री का प्रत्याशी बनाया जाना भी पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं के साथ-साथ दिल्ली की जनता को भी हजम नहीं हुआ. परिणाम आये. इतनी ज़बर्दस्त सफ़लता पहले किसी को नहीं मिली थी. दिल्ली की जनता ने एक बार फ़िर भरोसा करते हुए सत्तर में से सड़सठ सीटें झोली में डाल दीं. युवाओं के अथक कठोर परिश्रम को दरकिनार करते हुए, इस अभूतपूर्व सफलता का सारा श्रेय अकेले एक आदमी ने लूट लिया.

अब उस आदमी का मक़सद पूरा हो चुका था. दिल्ली की सत्ता पाँच साल के लिए उसकी झोली में आ चुकी थी. अब उसे किसी से कोई मतलब नहीं था. हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्थानीय सरकारों से जमकर लोहा लेते हुए, मन में उम्मीदों और आँखों में आशा की किरणें सँजोए, पार्टी के लिए जी-जान लगा देने वाले लाखों कार्यकर्ताओं पर कुठाराघात करते हुए, उस आदमी ने किसी भी राज्य में कोई भी चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी. हवाला दिया, दिल्ली को मॉडल बनाना चाहता हूँ, दिल्ली पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ. भई बहुत ख़ूब !!!! पहले जिस तरह उनन्चास दिनों बाद दिल्ली की जनता को मँझधार में छोड़ा था, अब बेचारे लाखों कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया. देश भर में पार्टी से जुड़े वो बेचारे लाखों कार्यकर्ता अब कहाँ जाएँ ? कहाँ गुहार लगाएँ ? ख़ुद तो राजधानी का मुख्यमन्त्री बनकर पाँच साल तक सत्ता सुख भोगो, कार्यकर्ता जाएँ भाड़ में. श्रीमान जी को अब किसी से कोई मतलब नहीं. उनका स्वार्थ पूरा हो चुका है. सत्ता हासिल करने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद जैसे तमाम हथकण्डे किस तरह अपनाए जाते हैं, कोई इनसे सीखे. अपने आप को राजनीति में नया-नवेला-नौसीखिया बताने वाला दरअसल राजनीति का शातिर-माहिर खिलाड़ी निकला.

नक़ली खाँसी, बनावटी हँसी, अपने आप को एकदम सीधा-सादा-सज्जन-नेक- भला मानुस साबित करने की कोशिश में दबी हुई धीमी आवाज़ में बोलना, सहानुभूति बटोरने की हर सम्भव कोशिश करना, मीडिया और सुर्ख़ियों में बने रहने के निरन्तर प्रयास करना, जानबूझकर मुकेश अम्बानी सहित बड़े-बड़े लोगों पर निराधार आरोप लगाकर जनता का ध्यान आकर्षित करते रहना. इसे कहते हैं “राजनीति” जो वाक़ई राजनीति के पुराने चावल कहे जाने वाले धुरन्धर राजनेताओं को भी सीखने की ज़रूरत है.

अभी तो इस आदमी को ऑडियो टेप में बुरे वक़्त के अपने ही पुराने साथियों को गालियाँ बकते सुना है, अभी तो सत्ता के लिए कॉंग्रेसी विधायकों को तोड़ने की बात करते ही सुना है, अभी तो सत्ता के लिए धर्म-जाति (मुस्लिम) के आधार पर विधायकों को तोड़ने की बात करते ही सुना है. इन्तज़ार कीजिए, शायद झूठ-फ़रेब-स्वार्थ और मक्कारी की बहुत सी परतें खुलेंगीं, कुछ लोगों की आँखों पड़ा झूठ का पर्दा भी शायद धीरे-धीरे खुलने लगेगा. अभी तो लोगों ने लोगो और कार ही माँगे हैं अब भरोसे के टूटने का हिसाब भी मांगेंगे.

१. केजरीवाल ने अन्ना जी को धोख़ा दिया और अपने फ़ायदे-अपने स्वार्थ के लिए उस नेक इन्सान का इस्तेमाल किया

२. केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव, प्रो. आनन्द कुमार, अजीत झा, अँजली दमानिया, कैप्टेन गोपीनाथ जैसे नेक और ईमानदार लोगों को पार्टी से दरकिनार कर दिया

३. केजरीवाल ने बुरे वक़्त के अपने ही पुराने साथियों के लिए अभद्र-अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया

४. केजरीवाल ने आआपा को अपनी जागीर या एकाकी निर्णय वाली पार्टी बना डाला है जिसमें उसकी जी-हुज़ूरी करने वाले चमचों के आलावा और किसी का स्थान नहीं. आवाज़ उठाने वाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है

५. केजरीवाल ने सत्ता हासिल करने के लिये सारे सिद्धांतों-आदर्शों को ताक पर रखते हुए, ना केवल अनैतिक रूप से चोरी छुपे, कॉंग्रेस जैसी भ्रष्ट पार्टी से साँठ-गाँठ करने की कोशिश की बल्कि मुस्लिम वोटों-विधायकों और धर्म आधारित राजनीति करने की कोशिश भी की

६. केजरीवाल को अब पाँच साल तक केवल सत्ता-सुख भोगने के अलावा और कुछ दिखाई नहीं दे रहा है

७. केजरीवाल ने देश भर में पार्टी से जुड़े लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी इस घोषणा से धोख़ा दिया कि अब पार्टी कहीं कोई चुनाव नहीं लड़ेगी

८. केजरीवाल, ऊपर से तो बहुत सच्चा-भोला-नेक-मासूम बनने का ढोंग करते हैं लेकिन असलियत में झूठे-धोखेबाज़-पल्टीबाज़ और सत्ता के लालची हैं

९. केजरीवाल ने अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये गजेन्द्र की बलि चढ़ा दी

१०. केजरीवाल ने एक महिला का जीवन बर्बाद करने वाले और महिला आयोग और उस महिला से भागते फ़िरने वाले कुमार विश्वास, आधी रात को महिलाओं के घर में घुसने वाले और पत्नी को पीटने वाले सोमनाथ भारती, पत्नी को पीटने वाले आआपा कार्यकर्ता और विधायक राखी बिड़लान के भाई, फ़र्ज़ी डिग्रीधारी जीतेन्द्र तोमर, धोखाधड़ी के आरोपी मनोज कुमार, सरकारी अधिकारियों ऑन ड्यूटी पीटने वाले नरेश बाल्यान पर कोई कार्यवाही नहीं की

११. केजरीवाल ने स्वयं तथा अपनी पार्टी के विधायकों के लिये सुरक्षा-गाड़ी-अन्य सुख सुविधाएँ नहीं लेने की बात कही थी लेकिन आज न केवल उन्होंने सुरक्षा-गाड़ी और अन्य सुविधाएँ ले रखी हैं बल्कि उनके विधायकों ने भी नई-चमचमाती गाड़ियाँ और अन्य सुविधाएँ ले रखी हैं. यहाँ तक कि केजरीवाल ने बीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर और कुछ नेताओं को कैबिनेट स्तर का दर्जा देकर विशेष सुविधाएँ प्रदान कर रखी हैं

१२. केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से वादा किया था कि टैक्स में कमी करके महँगाई कम की जायेगी लेकिन अब धोख़ा देते हुए वैट बढ़ाकर डीज़ल-पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये जिससे अन्य सभी वस्तुओं के दाम बढ़ गए, महँगाई बढ़ गई. केजरीवाल की दलील है वैट की दरें समान करने के लिये पड़ौसी राज्यों की सहमति से ऐसा किया गया, पड़ौसी राज्यों की सहमति बनाकर वैट की दरें घटाई भी तो जा सकती थीं ? टीवी-समाचार पत्रों में “केजरीगान” के लिये ५२६ करोड़ जुटाने हेतु जनता की जेबों पर डाका डालने की क्या ज़रूरत थी ?

१३. केजरीवाल, अपनी नाकामियों को छुपाने और उनका ठीकरा दूसरे के सर फोड़ने के लिए आये दिन टकराव-तानाशाही-अड़ियलपन की राजनीति करते हुए दिल्ली की जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं

१४. केजरीवाल ने आज तक झूठ और बनावट का आवरण ओढ़कर, नेक-ग़रीब-भोला-मासूम-बेचारा बनने का ढोंग करते हुए आज तक दिल्ली की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया

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