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जिंदगी भी किताबों के सफ़हो की तरह

Posted On: 11 Jan, 2018 Others में

गोपाल रामचंद्र व्यासPoetry and Writing whatever comes in mind ..

गोपाल रामचन्द्र व्यास

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जिंदगी भी किताबों के सफ़हो की तरह

हर रोज़ पलटती हैं हर रोज़ बदलती हैं

नए सफहों पर ख्वाबो को उकेरती हैं

अगले ही पल नए सफहों के नीचे दबाकर

उन्हें यादों में तब्दील करती हैं

जिंदगी भी किताबों के सफ़हो की तरह

हर रोज़ पलटती हैं हर रोज़ बदलती हैं

जैसे जैसे सफ़हे बढ़ते जाते हैं

मुकम्मल होती किताब का दर्द बढ़ाते हैं

ये एक ऐसी किताब हैं जिसके सफ़हें पलट के नहीं आते

पढो या ना पढो सफ़हे खुद-ब-खुद पलट जाते है

जिंदगी भी किताबों के सफ़हो की तरह

हर रोज़ पलटती हैं हर रोज़ बदलती हैं

तुम क्या मैं क्या, क्या रंक क्या राजा

रुकते किसी के लिए नहीं

सफ़हे तो युहीं पलट जाते हैं

जिंदगी भी किताबों के सफहों की तरह

हर रोज़ पलटती हैं हर रोज़ बदलती हैं

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