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मन का प्रपंच

Posted On: 12 Oct, 2018 Others,Uncategorized में

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मेरे हाथों में टंगा हुआ माँस का थैला अचानक से जैसे कई टन का हो गया था | कसाई की दुकान से बकरे के गोश्त के अपने मनपसंद टुकड़े लेकर निकल ही रहा था की मेरी नज़र एक मिमियाते हुए बकरे पर पड़ी जिसे कसाई बूचड़ खाने की तरफ घसीटता हुआ लेकर जा रहा था | ऐसा नही था की ये दृश्य मैने पहली बार देखा था, पर उस दिन पहली बार हुआ की उस बकरे की निरीह नज़रें मेरी नज़रो से टकरा गयीं | वो बेचारा पूरा ज़ोर लगाकर अपने घास के ढेर की तरफ भागने की कोशिश कर रहा था| ऐसा लग रहा थी की वो चाहता हो की एक आखरी बार मुंह भर के घांस और चबा ले, बस एक आख़िरी बार | पर मुझे उसकी डरी हुई आँखो मे ज़िंदगी के अंतिम सत्य के दर्शन से हो गये, की जब अंत समय आता है तो कितना भी ज़ोर लगा लो समय की छुरी गर्दन पर चल ही जाती है |
मुंह का स्वाद खराब हो गया | इतने दर्द से निकले हुए जीव के माँस को पकाने के लिए मैं इतना उत्सुक!! इसका स्वाद लेने के लिए इतना लालायित!! आत्मा भारी सी हो उठी|
स्वयं के जीवन का आत्ममंन्थन सा दिमाग़ मे चलने लगा| मैं कोई बहुत भाग्यशाली मनुष्य नही था| साधारण सा जीवन था, रोज़ कमाने रोज़ खाने जैसा| एक सर्राफ़ के यहाँ नौकरी करता था, जो धीरे धीरे वर्षों की मेहनत के बाद मुझे अपना खास आदमी समझने लगा था| मेरी महत्वाकांक्षाएं भी कुछ खास नही थी , बस दो वक़्त की रोटी और चैन की नींद मिल जाए | शायद इसी निःस्वार्थ भाव की वजह से किस्मत ने मुझे मेरी पत्नी से मिलाया | मृदुभाषी, सयमीं, और पाक कला मे निपुण| उसे जितना भोजन बनाना पसंद था, मुझे उतना ही खाना |

आज भी यही सोच कर निकला था स्वादिष्ट सा भोजन करूँगा, परंतु नियती ने मन पर ये कैसा बोझ डाल दिया था| सोचा की इस माँस के थैले को यही फेंक दूं| बीवी को बोल दूँगा की आलू या बैंगन का भरता ही बना दे| आख़िर स्वाद तो उसके परोसने के प्रेम मे है, वह कुछ भी खिला दे | मन मे निश्चय कर ही रहा था की सोचा चलो एक सिगरेट पीकर फिर उठते हैं इस बेंच से | जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और एक होठों मे दबा ली| माचिस जलने ही वाली थी की सिगरेट की डिब्बी पर छपी चेतावनी पर नज़र पड़ी – “सिगरेट पीने से कर्क रोग होता है”

मन बिलख उठा| हे ईश्वर आज तू मुझसे चाहता क्या है| एक भय अंतरात्मा को चीरता हुआ सा निकल गया| सोचा की सब कुत्सित आदतें, माँस मदिरा सिगरेट सब छोड़ दूँगा| संत सा जीवन जियूंगा | अपने अंतः को जीत ना पाया फिर मैं कैसा मानव !! ये जो लोलुपता से भरा जीवन हम जीतें हैं, क्या मतलब है इसका? स्वार्थ और लालच के वशीभूत सम्पूर्ण जीवन यूँ ही वृथा हाथ से निकल जाता है । परन्तु अब नहीं । अब मैं ऐसा नहीं होने दूंगा अपने साथ । नयी राह पकडूँगा, खुद की नयी लीक बनाऊंगा !

यह सोच ही रहा था की सामने से मेरे पूर्व प्रिय मित्र आते हुए दिखे । होठो में सिगरेट दबाये हुए, ढीला कुर्ता, एकदम बेफिक्री की चाल चलते हुए । आते ही मेरे कंधे पर धौल जमा दी -“और बंधू, कैसे हो । विवाह क्या हुआ दिखना ही बंद हो गए । यहाँ कोने में छुप के सुट्टा मार रहे हो । लगता है भाभी का चाबुक खूब तेज़ पड़ता है ।”मैं खिसिआई सी हंसी हंस दिया । मेरे मित्र आदतन मेरी मनोस्थिति जान कर उपदेश देने की भूमिका में आ गए । बोले -” बंधू, जीवन उतना ही है जितना इंसान इसको जीता है । बाकि तो मौत ही है । रोना तो हर बात पर हो सकता है ।मैं लोगों को देखता हूँ जो बस मशीन की तरह सुबह शाम काम करते जाते हैं। न जीवन की सुध है न संसार की । बोलते हैं की जो हम नहीं जी पाए वो हमारी संताने जियेंगी । मगर ये नहीं सोचते की यही बोझ से भरा जीवन वो अपनी सन्तानो को सौंप कर चले जाते हैं । अरे, जीवन खत्म होने का नाम है । यहाँ अपनी मर्जी से एक सिगरेट भी न पी पाए तो क्या जिए? अपने मन को दबाना मैंने इसलिए छोड़ दिया । जैसे जीना है जिओ, अंत सबका एक है । ”

अपना व्यख्यान देकर वो उठे और बोले – “चलो चलता हूँ , मूवी देखने जाना है ” इतना कह कर मेरे मित्र चले गए परन्तु एक विचार की क्रांति मेरे मन में छोड़ गए । कमजोर मन उधर ही झुकता है जिधर उसकी इक्षा होती है, बस जरा से धक्के की जरुरत होती है |

मेरे विचारों का सिलसिला जो मुझे नियति तक ले जाने वाला था चल चुका था। वो सिलसिला की मैं अपराधी भी महसूस न करूँ और जो करना है सो कर भी सकूँ । मैं जो करना चाहता हूँ वो नहीं कर पाया तो मेरा जीवन किसने जिया? एक मैं हूँ जो सांस लेने से पहले भी सोचता हूँ की सही है या गलत और एक ये हैं, कोई चिंता नहीं कोई तकलीफ नहीं । मैं ऐसा क्यों नहीं हो सकता । सब तो मांस भक्षण करते हैं, फिर मैं क्यों अपराधी महसूस करूँ ! एक सिगरेट पी लूँ तो भी खुद को अपराधी महसूस करता हूँ | ये ख्याल मेरे मन को झकझोड़ गया । संत बनने की सारी वेदना मन से निकल चुकी थी । मैं मांस खाना चाहता हूँ तो खाऊंगा । मेरी जुबान और मेरे जीवन पर किसी और का अधिकार क्यों हो ? ये निश्चय होते ही मैं उठा और तेज़ क़दमों से अपने घर की ओर बढ़ चला । मन का प्रपंच मुझे समझ नहीं आया । ये तो विभिन्न विचारों के बीच यूँ ही गोते खता रहता है । कभी श्वेत कभी श्याम ।

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