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दौड़े तो खुशी के लिए!

Posted On: 16 May, 2020 Spiritual,Uncategorized में

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gurmeetsingh33

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सफलता का अर्थ
किसको पता है। क्या कोई स्वयं को सफल घोषित करता है, प्राय: दूसरे व्यक्ति ही किसी को सफल बताते है।किसी एक व्यक्ति द्वारा आकलित सफल व्यक्ति दूसरे के दृष्टिकोण में आंशिक सफल अथवा असफल भी होता है। अगर यह सही है तो सफलता की सर्वमान्य वैश्विक परिभाषा क्या है। अगर कोई सुधि पाठक विद्वान सफलता की पॉवर,पैसा,संसाधन से सम्बन्धित सर्वमान्य तथा यूनिवर्सल स्वीकृत परिभाषा बता सकता है तो उसका स्वागत है। ऐसे पॉवर फुल व सफल व्यक्तियों की सूची प्रति वर्ष कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं, संगठनों द्वारा घोषित की जाती है लेकिन मजे की बात यह है कि यह सूची व उनकी वरीयता प्रति वर्ष बदलती रहती हैं। अर्थात जो व्यक्ति भारी सफल था अचानक कुछ समय बाद असफल अथवा कम सफल हो गया।अब ऐसी सफलता के क्या मायने है,जो अस्थिर है,बरसो दौड़ भाग करके,स्वास्थ्य खराब करके,परिवार की अपेक्षाओं पर ध्यान न देकर जो तथाकथित सफलता प्राप्त की,वह अचानक तिरोहित हो गई,अब पूरे जीवन की मेहनत व्यर्थ हो गई।

 

 

 

तो सफलता क्या है? क्या भौतिक संसाधन,शक्ति तथा अपार धन हासिल कर लेना ही सफलता है। जो हासिल कर लेता है वह संतुष्ट नहीं है, कभी भी अपने धन से शक्ति तथा संसाधनों से संतुष्ट होना मानव की फितरत में भी नहीं है। आज काफी सारे लेखक, यूट्यूब शो, लाईफ कोच, पत्रिकाएं गारंटी के साथ सफल होने के नुस्खे बताती है।  प्रेरक लेख, कहानियां उनकी नजरो में सफल लोगों की शैली, कार्य में समर्पित होकर लगे रहने, व उनकी ऊर्जा के किस्से हम आए दिन पढ़ते है, कुछ को जोश आ जाता है, व होश खोकर उनके पद चिन्हों का अंधानुकरण करने लगते हैं।इनमें से शायद पांच ,दस प्रतिशत लोग जो लक्ष्य रखते हैं पा लेते हैं। परंतु अधिकांश इस मैराथन को अधूरा छोड़ देते हैं,अथवा बीच में ही धारा शायी हो जाते हैं। काफी समय बर्बाद करने के बाद अपने मूल स्वभाव में लौट आते हैं।

 

 

वास्तव में अतिरेक पूर्ण लक्ष्य निर्धारित करने के पूर्व व्यक्ति अपने ज्ञान,विवेक,शारीरिक व मानसिक शक्ति का आकलन नहीं कर पाता है।ये तथाकथित प्रेरक लेखक भी इस पहलू की सर्वथा उपेक्षा कर देते है,अथवा उन्हें इस महत्वपूर्ण कारक का ध्यान नहीं होता है।जिन्हें वह सब मिल भी जाता है। प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, क्रोध, अशांति, नफरत, अंहकार के शिकार हो जाते है। तथाकथित सुख व साधनों का दिल से उपभोग करने असफल रहते हैं। ऐसे कितने प्रतिशत लोग होंगे जिनकी आत्मा ,मन,शरीर व परिवार इस सफलता के बाद आनंदित रहता होगा।पाठक स्वयं अंदाजा लगा सकते है,शायद पांच से दस प्रतिशत।अर्थात सफलता हेतु जो मानक व लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, वे भ्रामक व असत्य थे।

 

 

ऐसे भी लोग है,जिनके लिए जीवन एक अमूल्य धरोहर है, व आनंदित रहना उनका मूल स्वभाव है।वर्तमान के प्रतिस्पर्धी युग में आनंदित रहना भी आसान नहीं है,जब सर्वाइवल का संकट हो,आजीविका का प्रबंध दुष्कर हो तो,आनंद खोजना लोगों को मजाक लगता होगा।ऐसे में ये लेखांश उनके लिए निश्चित रूप से अव्यवहारिक ही होगा।यह सत्य भी है कि,कल का ठिकाना नहीं,और आनंदित रहने ,खुशी प्राप्ति की बात करते हो।वास्तव में यह मन:स्थिति बचपन से रोपे गए संस्कारों,सामाजिक व पारिवारिक परिवेश तथा हमारी शिक्षा प्रणाली की देन है।

 

 

बचपन से मन के पोषण पर शायद ही कोई ध्यान देता हो।समाज,परिवार तथा शिक्षा जो सिखा देती है,वह अवचेतन में इतने गहरे स्थाई रूप में प्लांट हो जाता है कि,हम अनजाने में इन्हीं प्लांटेड संस्कारों के मार्गदर्शन के अनुसार चलते है।विवेक और बुद्धि भी इससे इतर कुछ नहीं सोचती।संघर्ष काल तो हर युग में रहा है,तथा निरन्तर अनेक चुनौतियों के साथ ही जीना है,ऐसे में अगर सफलता की परिभाषा को आनंद,प्रेम,दया तथा शांति के साथ जोड़ दिया जावे, व साथ ही प्रत्येक चुनौती को शांत मस्तिष्क के साथ, आनंद अनुभव करते हुए सामना किया जाए तो छोटी छोटी उपलब्धियां भी असीम ऊर्जा,उल्लास तथा खुशी का अनुभव देंगी।यही वास्तविक सफलता है,जब उल्लास युक्त मन, कम संसाधनों में भी हवा में उड़ रहा हो, तब आप किसी करोड़पति,अरब पति से कम नहीं होंगे।

 

 

हमारी आत्मा का मूल स्वभाव प्रेम तथा आनंद के वाइब्रेशन से युक्त है। जहां से भी लेश मात्र प्रेम,स्नेह,सम्मान मिलता है आत्मा बाग बाग हो जाती है, मन प्रफुल्लित हो उठता है,ऐसे आनंद की तुलना अनेकों भौतिक संसाधनों से भी नहीं हो सकती।असली जीवन की सफलता की परिभाषा यही हो सकती है,जब हमारा परिवार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ सर्वथा आनंदित स्थिति में,पूर्ण स्वस्थ हो,प्रेममय हो,दिव्य शक्ति का आभारी हो।यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।इसी दिशा में किए गए प्रयास शाश्वत तथा स्थाई सफलता वाले होंगे।हमें किंचित भी भौतिक सफलता को खोने,अपनी रैंकिंग के नीचे आने का भय नहीं रहेगा। अत: प्रत्येक कर्म, अपनी क्षमताओं के अनुसार, मानसिक शांति, प्रेम व विश्वास के साथ, आनंदित हृदय के साथ ये गीत गाते हुए “जोत से जोत जागते चलो,प्रेम की गंगा बहाते चलो ” निरन्तर असली सफलता को अंगीकार कर करें।यही मूल मंत्र है जीवन जीने का जो ईश्वर हमसे अपेक्षा रखते हैं।

 

सप्रेम
गुरमीत सिंह

 

 

 

नोट : इन विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं।

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