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पीएम की गरीबी रेखा और मेरी भाग्‍य लेखा

Posted On: 27 Jul, 2013 Others में

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ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

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पीएम साहब!
मैं 11वीं का छात्र हूं। स्कूल नहीं जाता हूं। स्कूल मुङो भगाता नहीं है, मैं पहुंच नहीं पाता हूं। मेरे पैरों में गरीबी की बेड़ी है। वही बेड़ी, जिसको आप की नई गरीबी रेखा ने मुक्त किया है, किया क्या है, बताया है- आज मैं ऊपर, गरीबी नीचे। किसी गाने सा ही लगता है, जिसे सुना तो जा सकता है, गाया नहीं जा सकता, गाने के लिए गला चाहिए और गला के लिए खाना, जो पेट भर मिलता ही नहीं। मेरे ललाट पर आप की नई गरीबी रेखा से गहरी भाग्य लेखा चिपकी है। यह स्कूल की जगह फुटपाथ ले जाती है। किताब की जगह दुकान खुलवाती है। शिक्षक की जगह ग्राहकों का इंतजार करवाती है। इसी इंतजार के बीच आज जार-जार रोने वाली एक बात अखबार के रास्ते आती है। दुकान का एक ग्राहक दूसरे को बताता है, अब रोज तैंतीस रुपये से अधिक पाने वाला गरीब नहीं कहा जाएगा। कोई परिवार 166 रुपये कमा लेता है तो गरीबी रेखा से बाहर माना जाएगा। मनमोहन जी! मैं इन दोनों में धनी हूं। खुद रोजाना सौ कमाता हूं। बापू का भी जोड़ दो तो प्रति दिन दो सौ का आनंद उठाता हूं। पर, नहीं उठा पता हूं गरीबी का बोझ। बोझ भी कोई बड़ा नहीं। दादी, बापू, दो बहनें, और अकेला मैं। मां तो न जाने कब की आप के सरकारी बोझ को हलका कर गई। अब पांच ही हैं हम सभी। इसमें से भी दो कमाते हैं। बापू चौकीदारी करते हैं, मैं फुटपाथ पर चाय बेंचता हूं। ग्राहक नहीं होते हैं तो किताब भी खोलता हूं, लेकिन नहीं खुलती है आप की नई गरीबी रेखा पर हमारी समझ। आप से अधिक महाजन समझाता है। रोज जब मैं दुकान पर सामान लेने जाता हूं, बढ़ते बिल के बारे में बताता है- महंगाई बढ़ी है बिल तो बढ़ेगा ही। पीएम साहब! क्या आपने कभी हमारे जैसे लोगों के साथ खाना खाया है। सबसे सस्ता। यह और बात है कि इसे बड़े लोगों के कुत्ते भी नहीं खाते। इसे आपन की भाषा में थाली बोलते हैं। इसमें चार रोटी होती हैं और होती है दाल, पानी की धनी इस दाल के साथ सब्जी और थोड़ा सा चावल होता है। पेट नहीं भरता, लेकिन जेब पेट को मना लेती है। प्रति थाली पचीस रुपये जो देनी पड़ती है। दो बार खा लिया तो 50 रुपये। आप तैंतीस रुपये में 24 घंटे अमीरी झाड़ने को कह रहे हैं, हम पचास रुपये में बारह घंटे में ही पेट को घंटी बजा पाने से नहीं रोक पाते हैं। खैर, यह तो रही मेरी बात, अब पूरे परिवार की सुनिए..। आप की गरीबी 166 में ही दुम दबा कर भाग जाती है, हमारी दो सौ रुपये में भी दामन नहीं छोड़ती है। 1छोड़ें भी तो कैसे। पांच लोगों के लिए प्रतिदिन 400 ग्राम दाल चाहिए, 28 रुपये बैठते हैं। साढ़े सात सौ ग्राम आटा पर 17 रुपये खर्च हो जाता है। एक किलो सब्जी पर पचास रुपये चला जाता है। डेढ़ सौ ग्राम तेल पर तेरह रुपये खर्च होता है। नमक, मिर्च, हल्दी, मसाला आदि भी बीस रुपये से कम में नहीं आता है। गैस नहीं है पीएम साहब, स्टोव है। सो, आग के लिए इसमें पचास रुपये का मिट्टी तेल रोज जलाना पड़ता है। असल में इसकी आंच खाना कम पूरे परिवार की दिन भर की कमाई अधिक पकाती है। कमाई के दो सौ में से 178 रुपये महज दो जून के भोजन में चले जाते हैं। चाय पी लिया तो दो सौ रुपये खत्म। दोनों बहनें पिंकी और रोशनी की जिंदगी में पूरे परिवार की कमाई कोई रोशनी नहीं दे पाती है। इनकों स्कूल भेजना तो दूर इन्हें साल में एक जोड़ी कपड़ा बनवा पाना भी उधार को न्यौता देना होता है। दादी की खांसी भगवान पर है। बहनों का बचपन बड़ों की पीडा में जीता है। मां नहीं है, अच्छा है। वरना, उसका दर्द देखा नहीं जाता। रोज कमाने और रोज खाने में परिवार का कोई स्कूल नहीं जा सका। मैं मुश्किल से स्कूल पहुंचा हूं। मेरी पढ़ाई पॉलीटेक्निक के सामने फुटपाथ पर खुले में चाय की दुकान में ही यदा कदा हो पाती है। कच्चे घर में खालिस सपने आते भी हैं तो कभी छत से टपकती बरसात की बूंदे बहा ले जाती हैं, कभी तीखी धूप सुखा जाती है। पीएम साहब! सुख तो हम कभी देखे नहीं और आप कह रहे हैं हम गरीबी रेखा से ऊपर हैं। खैर आप प्रधानमंत्री हैं और अर्थशास्त्री भी। आप ही बताइए आप की नई गरीबी रेखा पर पेट की भूख को भूल चंद समय के लिए मुस्कुराएं तो कैसे..।
देवेंद्र कुमार
कांठ रोड, मुरादाबाद

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