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क्या द्रोण पर्वत पर संजीवनी आज भी चमकती है ?

Posted On: 4 Apr, 2017 Others में

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harirawat

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रामायण में वर्णित राम-रावण युद्ध के दौरान मेघनाथ और लक्ष्मण जी के मध्य युद्ध में मेघनाथ ने अपनी सारी शक्तियों वह का प्रयोग कर दिया था, सारे साम-दाम दण्ड-भेद भी उसने अजमा लिए थे, लेकिन लक्ष्मणजी ने उसके सारे नुस्खे निष्क्रिय कर दिए थे ! उसने युद्ध के वसूलों की अवहेलना करके लक्ष्मण जी पर शक्ती वाण मार दिया और लक्ष्मण जी शक्ती वाण के प्रहार से मूर्छीत होकर धरती पर गिर गए ! रामा दल में हलचल मच गयी ! लक्ष्मण जी को “शेषनाग” का अवतार बताया जाता है ! मेघनाथ ने अपने बड़े बड़े दिग्गज सैनिकों की सहायता से लक्ष्मण जी के मूर्छित शरीर को उठाकर अपने कैम्प में ले जाने की योजना बनाई लेकिन वह उन्हें उठा नहीं पाया ! इधर हनुमान जी ने लक्ष्मण जी को उठाया और अपने कैम्प में ले आया ! भक्त विभीषीण के कहने पर हनुमानजी ने लंकापति रावण के निजी वैद्य को पलंग सहित, औषधियों की पोटली के साथ अपने कैम्प में ले आए ! वैद्य ने लक्ष्मण जी का निरिक्षण किया और कहा की “अगर कोई वीर रातों रात हिमालय के द्रोण पर्वत से चमकती हुई संजीवनी वटी ला सके तो लक्ष्मण जी की जान बच सकती है,नहीं तो….! भगवान् राम ने हनुमान जी को भरोशे के साथ भेजा और भक्त शिरोमणि हनुमान जी द्रोण पर्वत पर चले तो गए लेकिन असली संजीवनी की पहचान नहीं कर पाए, क्योंकि वहां सारे पर्वत पर बहुत सारी जड़ी बूटियां प्रकाशित हो रही थी ! आखिर उनहोंने समय सीमा का ध्यान करते हुए प्रकाशित पूरे पहाड़ को ही उखाड़ लिया और अयोध्या के ऊपर से उड़ान भरते हुए रातोंरात लंका पंहुच गए ! असली संजीवनी की पहचान करके सुषेन वैद्य ने लक्ष्मण जी को पिलाई और वे स्वस्थ होकर खड़े होगये जैसे सो के उठे हों !

आज बड़े बड़े वैज्ञानिक, अनुसंधान से जुड़े बड़े बड़े विद्वान् उस संजीवनी की खोज में जुटे हुए हैं जिसे त्रेता में हनुमान जी लक्ष्मण जी के प्राण-रक्षा हेतु लाये थे ! हाल ही में अनुसंधान से जुड़े हुए कुछ महान हस्तियां हिमालय के ‘द्रोण पर्वत ‘ की तलहटी में बसे हुए गाँव में गए ! वहां के लोग आज भी हनुमान जी से नाखुश हैं ! उनका कहना है की “हमें नहीं पता की हनुमान जी ने किस के प्राण बचाने के लिए द्रोण पर्वत की खूबसूरती को बदरंग करने की गुस्ताखी की ! गाँव काफी बड़ा लगता है ! सारे हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं लेकिन मृत्यु होने पर शरीर को अग्नि नहीं देते बल्कि जमीन में गाड़ देते हैं ! बुजुर्गों का कहना है की ‘मृत्य शरीर को जलाने से वातावरण में प्रदूषण फैलने की आशंका रहती है’ !
हिमालय की तलहटी में बसा हुआ यह गाँव आधुनिक साज सज्जाओं से अनविज्ञ एक बहुत ही ख़ूबसूरत, हरा-भरा प्रदूषण रहित इंसान को कुदरत की ऒर से अनमोल तोहफा है !
शास्त्रों में वर्णित संजीवनी बटी वेजान शरीर में जान दाल देती है ! जिस दिन ये संजीवनी ‘रामदेव’ जैसे योग गुरुओं के हाथ लग जाएगी, समझो समाज के हर वर्ग को जैसे पारस मणि मिल गयी हो ! लेकिन अगर किसी दुष्प्रवृति के दरिंदे के हाथ यह जड़ी लग गयी तो फिर ऊपर वाले को ही राम – कृष्ण जैसे अवतार लेकर सच्चे, निर्मल सज्जनों की रक्षा करने आना पडेगा !

जागरण जंक्शन से जुड़े लेखकों और पाठकों से निवेदन है की इस लेख से समन्धित और भी जानकारी शेयर करके लेख को सार्थक बनाएं ! धन्यवाद !

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