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धर्मराज और चित्रगुप्त के दरबार में

Posted On: 1 Aug, 2018 Others में

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harirawat

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चित्रगुप्त जी के सामने दो आत्माएं खड़ी थीं । एक आत्मा, एक बहुत ही गरीब किसान की थी, वह धरती पर अपनी पूरी जिम्मेदारियां पूरी करके ९० साल की उम्र पूरी करके अपने पंचतत्व के शरीर को किसी धर्मार्थ अस्पताल को दान करके यहां आया था । चित्रगुप्त जी ने अपने सबसे विश्वशनीय सहायक नंबर पांच देवदूत को बुलाया और पूछा, “क्या तुम इस किसान को पहचानते हो” ? देवदूत ने जबाब दिया, “चित्रगुप्त जी भला इस दानदाता, परोपकारी, अपनी जान की प्रवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाने वाला, अपने हिस्से की रोटी भूखे अभागे के उदर भरने वाले को भला कौन नहीं जानता होगा, पहचानता होगा । बीमार इंसान की तीमारदारी के अलावा इसे रास्ते में कोई जख्मी पशु पक्षी भी मिलता था तो ये अपनी क्षमता के अनुसार उनके जख्मों को भी साफ़ करके दवा लगाकर उसे बैंडेज लगा दिया करता था ।” “इन्हें आवा गमन की मुक्ति वाले कवच में बिठा कर विष्णुलोक पहुंचा दो ” चित्रगुप्तजी ने देवदूत को आदेश दिया ।

अगला नंबर एक नारी की आत्मा की थी, जो कही सालों तक एक बहुत बड़े कंट्री की सर्व सर्वा रही है । थी तो कंट्री प्रजातांत्रिक पर इस महिला ने वहां के संविधान को अपने ढंग से मोड़ तोड़ कर नया संविधान बनाया और तानासाही रवैये से कही सालों तक निष्कंटक राज किया । पिता के स्वर्ग सिधारने के बाद परम्परा के अनुसार उनके डिपुटी को गद्दी पर बिठाया गया था, लेकिन इस महिला ने सारे कानूनों परम्पराओं को ताक में रखकर, उस शख्स को अपने रास्ते से सदा के लिए हटा दिया । चुनाव अधिकारी ने इनके चुनाव को रद्द किया, इन्होंने कोर्ट का सहारा लिया, कोर्ट ने भी चुनाव कमिश्नर के हक़ में फैसला दिया तो इन्होंने उस जज को ही गायब करवा दिया ।जब इन पर कुर्सी छोड़ने का दबाव बढ़ा तो इन्होंने देश में आपालकाल (एमरजेंसी) घोषित करके उन तमाम लोगों, नेता-राजनेताओं, शासक-प्रशासकों को जिन्होंने एमरजेंसी का विरोध किया, जेल में डालकर उनके साथ बड़ा अमानुयय व्यवहार किया । आपातकालीन काले जहरीले धुनें की अग्नि में बहुत सारे संत बेक़सूर इंसानों की आहुति दी गयी । एक देश प्रेमी ने एक दिन अपना सब कुछ खोकर, आखिर तंग आकर इन्हें गोलियों से भून दिया, ये आपके सामने इसी महिला की आत्मा खड़ी है । उधर देखिए उस देश की राजधानी की ओर, इतने क्रूर अहंकारी हत्यारे अन्यायी शासक की मृत्यु पर भी दबी हुई जनता उनके मृतक शरीर को सम्मान देते हुए उनकी जय जैकार कर रही है । दूसरी ओर गोली मारने वाले की जात विरादरी वालों की, इस महिला के खासम-ख़ास बड़ी निर्दयता से हत्या कर रहे हैं सुनने वाला कोई नहीं है” । यह सब कुछ सुनने के बाद चित्रगुप्त जी सोच में पड़ गए । सोचने लगे ‘क्या नारी के कोमल, नरम नाजुक मखमली चोले में ऐसे भयानक शैतान का वास था जिसने इतने घिनौने पाप किए वह भी केवल अपने स्वार्थसिद्धि के लिए ।’ फिर उनहोंने देवदूत को आदेश दिया “जाओ इस नारी आत्मा को विराट भारी भरकम काले नाग के कवच में बिठाकर घनघोर कंटीले पर्वतीय जंगल में छोड़ आओ “। (१)

लघु कथा
साथ साल के बाद
भगवानदास एक प्राइमरी स्कूल के अध्यापक रहे हैं, स्कूल घर से दूर पहाड़ी प्रदेश की एक ऊंची चोटी पर था । गर्मियों के लिए तो अच्छा समय निकल जाता था, लेकिन सर्दी के एक एक दिन बिताने भारी पड़ जाते थे । इस पहाड़ी के इर्द गिर्द ८-९ गाँव बसे हुए हैं । हर गाँव से ७-८ बच्चे कम से कम २५० से ५०० मीटर की चढ़ाई नापकर रोज सुबह सबेरे स्कूल आया करते थे । शुरू शुरू में भगवानदासजी को कुछ अटपटा सा लगा । धीरे धीरे उनहोंने इस पहाड़ी इलाके की सुंदरता पर अपना ध्यान लगाना शुरू कर दिया । हजार डेड हजार मीटर नीचे पूर्व में नदी बहती है, उतर दक्षिण में दो नाले जो बरसात में कही छोटे बड़े झरनों से मिलकर बहुत बड़ी जल रासी लेकर नदी में विलीन हो जाती हैं । यह स्थान पहाड़ के उच्च शिखर पर कुदरत की एक अनुपम भेंट है । खुला बड़ा विस्तृत मैदान
था । स्कूल चारों और से पांच फ़ीट ऊंची पत्थरों की मजबूत दीवारों से घिरा हुआ था । यहीं बीच बीच में अध्यापक बच्चों को शारीरिक व्यायाम करा दिया करते थे ।
बच्चों के मनोरंजन के लिए बच्चे फुटबॉल भी खेलते थे, इस चारदीवारी के अंदर ।अध्यापक के लिए अलग से दो कमरे किचन की व्यवस्था थी । सहायक अध्यापक वहीँ नजदीकी गाँव का था, जो रोज स्कूल बंद होने पर अपने घर चला जाता था । साथ में स्कूल की चौकसी के लिए एक चौकीदार भी था, जो मास्टर जी के निजी कामों में सहायता कर दिया करता था । नजदीक गाँव से एक आदमी झाड़ू लगाने के लिए आजाया करता था । यह स्थान काफी ऊंचाई पर होने की वजह से कोटद्वार की गाड़ी जो नजीबाबाद से कोटद्वार और वापिस नजीबाबाद रोज के चार चक्कर लगाती थी, दिखाई देती थी । भाप के इंजनवाली गाडी हुआ करती थी । जब वह धुंवा उड़ाती हुई व जोर की सीठी बजाती हुई भागने लगती थी तो बच्चों के कान खड़े हो जाया करते थे । एक ऊंची उठी हुई पहाड़ी हल्का सा जंगल, चीड़ और बांज के पेड़ों से आच्छादित । पानी करीब २५० मीटर दूर था । दो बच्चे मिलकर बांस के डंडे पर पानी भरी बाल्टी लटकाकर मास्टर जी के लिए लाया करते थे । पानी चश्मे का वहीँ पहाड़ से निकल कर झरना बनकर नीचे गिरता था, हल्का सा गर्म इसकी तासीर होती थी । बच्चे कभी कभी इसी के नीचे खड़े होकर “हरे गंगे, हरे गंगे” करके नहा जाया करते थे । कभी कभी रविवार को मास्टर जी भी इसी चश्मे के निचे नहाने के लिए चले जाते थे । उन दिनों केवल इतवार की छुट्टी होती थी, शनिवार हाफ होता था, १२ बजे स्कूल बंद होता था । मास्टर जी तीसरे चौथे हफ्ते ही अपने घर जाते थे । अब उनहोंने बच्चों की पढ़ाई पर दिलचस्पी लेनी शुरू करदी । चौथी और पांचवीं के बच्चों की एक्स्ट्रा क्लास लेनी शुरू कर दी । नतीजा स्कूल के बच्चों के पास मार्क प्रतिशत बढ़ने लगा, शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड्स में स्कूल नंबर वन पोजीशन की तरफ बढ़ने लगा । बच्चों के अभिभावक अब भगवानदास के मेहनत पर अपनी खुशी जाहिर करने लगे । वे पढ़ाई के अलावा भी बच्चों को अच्छी अच्छी कहानियां सुनाने लगे । कबि कभार अपनी पत्नीको एक दो हफ्ते के लिए साथ रख लिया करते थे । गाँव वालों की तरफ से उनके रोज एक किलो शुद्ध गाय का दूध आने लगा, खेतों की ताज़ी सब्जियां तथ ताजे रताजे फल जैसे, अमरुद, से-नासपाती ।गाँव के लोग उन्हें अपने गाँव की शादी विवाहों में भी बुलाने लगे ।

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