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सरकारी तगमे लौटा दिये _ आखिर क्यों ?

Posted On: 6 Nov, 2015 Others में

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harirawat

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शाम के समय समाज के हर विभाग से जुड़े लोग इकट्ठे हुए, सरकारी पार्कों में ! हमेंशा ही होते हैं ! इनमे बुजुर्ग सरकारी गैर सरकारी विभागों से अवकास लेने वाले, भारतीय सैना, पुलिस, पैरा मिलिट्री के पेंशनर शामिल होते हैं ! इनमे ऊँचे ओहदे वाले या कनिष्ट पदों पर अपनी आजीविका कमाने वाले भी शामिल होते हैं ! हर वर्ग जाति धर्म, अवर्ण, सवर्ण भी संख्या बढ़ाने में अपना योगदान देते हैं ! आजकल चर्चा का विषय है, आखिर क्या कारण है की वर्षों की मेहनत और परिश्रम के बाद, मिला हुआ पुरस्कार, ये समाज में ऊंची नाक के सभ्रांत कवि लेखक, वैज्ञानिक फ़िल्मी हस्तियां क्यों वापिस लौटा रहे है ? ये मात्र एक पुरुष्कार नहीं है, बल्कि सम्मान है, आपके किसी ऐसी कृति, आविष्कार, या फिर आॅलम्पिक, एशियाड खेलों में अपनी मातृ भूमि के लिए गोल्ड, सिल्वर लेने के लिए ! ये पुरुष्कार रूपी समान उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ जाता है ! ये आनर उसके नाम के साथ जुड़ा रहता है जब तक आत्मा इस जिस्म रूपी पिंजरे में बंद रहती है! जो लोग इसको वापिस करते हैं, वे या तो मीडिया में प्रसिद्धि पाने के लिए या फिर दबाव में आकर अपने सम्मान की तिलांजलि दे रहे हैं ! कुछ भी हो यह उस पुरुष्कार का अपमान है ! यह भी हो सकता है, पुराने मंत्री ने आपको यह सम्मान देने के लिए अच्छे अच्छे कवि लेखकों की रचनाओं को दर किनार कर दिया हो, किसी नजदीकी रिश्तेदारी या दोस्ती निभाने के खातिर ! आखिर यह दिमाग ही तो है, खुछ भी सोच सकता है !

अगर वे किसी सरकारी काम काज पर अपना रोष जाहिर करने के लिए ऐसा कदम उठा रहे हैं तो भी उनका ये कदम सही नहीं कहा जाएगा ! अगर इनका ये गुस्सा दादरी काण्ड पर है तो, पुरुष्कार का अपमान न करके वे सरकार तक अपनी नाराजी पहुंचा सकते थे ! १९८४ के दंगों में जहां हजारों सिख मृत्यु की गोद में सुला दिए गए, उन दिनों भी कांग्रेस सरकार के खिलाफ पुरूरुष्कार लौटा सकते थे ! ये उन दिनों कहाँ दुबके पड़े थे, जब मुम्बई में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने सैकड़ों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उत्तर दिया था, इनमें से किसी भी महाशय ने अपनी नाराजी नहीं दिखाई ! पाकिस्तानी पालित आतंकियों ने काश्मीर के लाखों पंडितों को काश्मीर से निकाल बाहर किया, क्या उनका क्रंदन उनको नहीं सुनाई दिया ! अपने निजी स्वार्थ के खातिर वोट बैंक बनाने के लिए इंसान इतना निचे गिर जाता है की अपनी धर्म संस्कृति की भी धज्जियां उड़ाने लग जाता है ! बिहार में लालू की लड़की ने भारत के प्रधान मंत्री को “गली का गुंडा” कहा, उस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन उनके एक शब्द पर “लालू जी ने अपने बच्चों को राजनीति में स्याट कर दिया” सबने बबाल मचा दिया, कोई उन्हें राजधर्म सीखा रहा है, कोई उनकी सीमा उन्हें दिखा रहा है, गरिमा की याद दिला रहा है ! कही लाख गरीबों के बैंक अकॉउंट खुलवाकर उनमे एक एक लाख जमा कराकर, ‘ वे भी समाज के महत्वपूर्ण अंश हैं’ , उनको अहसास करवाया ! ये सब कुछ विशिष्ट अति विशिष्ट मैडल गले से उतारने वाले नहीं देख पाए ! उन्हें तो अपने आकाओं की कुर्सी गंवाने का गम सत्ता रहा था, देश जो इन्हें पाल पोस कर मैडल, पुरुष्कार की देहलीज तक पहुंचा रहा है, की इन लोगों को कोई चिता नहीं है ! भगवान इन्हें सद बुद्धी दे ! कम लिखा ज्यादा समझना ! भूल चूक लेनी देनी !

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