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जब बच्चे थे

Posted On: 4 Jan, 2018 Others में

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harirawat

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पार्क में बच्चे खेल रहे थे,
हँसते खेलते झगड़ रहे थे,
खेल खेल में एक दूसरे को पकड़ रहे थे !
यह देख कर मुझे अपना बचपन याद आगया,
जब हम छोटे थे,
शैतान भी थे पर
साथ साथ रहते थे,
लड़ते थे झगड़ते थे फिर एक ही थाली में पेट भरते थे!
एक दिन की बात है,
मैं अपने गाय बच्छियों के बीच बैठा था !
गाय बच्छियां खड़ी थी,
किनारे पर बैल लेटा था !
सर्दियों के दिन थे,
बारह बजे घूप अच्छी थी,
दो बच्छियाँ मेरा सिर चाट रही थी,
गाय भी बड़े प्रेम से हमें देख रही थी !
नींद की झपकी लगी,
लगा ये तो अपने ही परिवार के हैं,
दो आत्माएं दादी और छोटी दादी !
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
गीता के प्रवचन उस झपकी से जोड़ता हूँ,
“अर्जुन, तुझमें मुझमें बस भेद यही,
तू नर है, मैं नारायण हूँ,
तू है संसार के हाथों में,
संसार है मेरे हाथों में “: !
“इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम ! (आठ चतुर्थो अध्याय )
विवस्वान्मनवे प्रायः मनुरिक्ष्वाकवे अब्रवीत !!
श्रीकृष्ण बोले,” मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था,
सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा था !
फिर राज ऋषियों ने इसे जाना, लेकि फिर ये ज्ञान पृथ्वी से लुप्त प्राय हो गया” !
अर्जुन के पूछने पर की “आपका जन्म तो अब हुआ है फिर कल्प के आदि सूर्य से आपने इस ज्ञान कैसे कहा” ?
भगवान् ने जबाब दिया ”
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन !
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ पंतप ”
हे परन्तप अर्जुन, मेरे और टरटर बहुत से जन्म हो चुके हैं,
उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ !!
अजोअपि सन्नव्ययात्मा भूता नामीश्वरो अपि सन !
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया !!
मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का
ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से
प्रकट होता हूँ !
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम !!
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ! धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे !!

जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं साकार रूप में लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ !
साधू पुरुषों का उद्धार करने और पापकर्म करने वालों का विनाश करने और धर्म की अच्छी तरह स्थापना करने के
liye मैं युग युग में प्रकट होता हूँ !
अब हम बुजुर्ग होगए, अपनो से दूर होगए,
पर यह देख कर हैरान होता हूँ की,
जवान भी हमें भूल गए !
शुभ कामनाओं के साथ हरेंद्र

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