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"चतुर बनियाँ था गांधी" ..चाणक्य उवाचः

Posted On: 12 Jun, 2017 Others में

PAPI HARISHCHANDRASACH JO PAP HO JAYEY

PAPI HARISHCHANDRA

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मात्र व्यंग्य ..हिंदुस्तान के आधुनिक चाणक्य अमित शाह जी कहते हैं कि…... “चतुर बनियाँ था गाँधी”…...| उचित ही तो कहा आधुनिक चाणक्य अमित शाह ने …| खाली व्यर्थ ही नहीं मिली है उन्हें चाणक्य की उपाधि ….| जिस तरह चाणक्य ने केवल अपने ही दम पर एक विशाल साम्राज्य कायम किया और नीति निर्धारण किया उसी तरह एक साधारण व्यक्ति ने भारतीय जनता पार्टी का विशाल हिंदुस्तान साम्राज्य स्थापित कर दिया है | ……………………………………………………………………………………………… चाणक्य -नीति का मुख्य आधार है,………………………………. ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ …………………..अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की वृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।………………………………………………………………………………………चाणक्य स्वरुप माने जाने वाले अमित शाह भी तो यही कर रहे हैं | जब चाणक्य जैसे महान व्यक्ति ने यही किया और साम्राज्य स्थापित किया तो अमित शाह के करने पर इतना हो हल्ला क्यों …?.अमित शाह भी तो हिंदुस्तान मैं भारतीय जनता पार्टी का साम्राज्य बड़ा ही तो रहे हैं | अभी तो विश्व विजय करते विश्व विजय भी तो करनी है | साधारण लोगों की परगलानी(सम्मान की हानि ) से क्या विश्व विजय मिल सकेगी …? …हिंदुस्तान तो कांग्रेस ,मन मोहन सिंह और राहुल गाँधी की पर ग्लानि से विजित हो चूका है | अब विश्व पटल पर स्थापित व्यक्तियों की ही ग्लानि करनी होगी | तभी अगला पड़ाव जीता जा सकता है | …………………………………………………………….आचार्य चाणक्य एक ऐसी शख्सियत थे जिनका नाम सुनते ही हमें अपने सुनहरे इतिहास की याद आ जाती है, भारत की महान राजनीति की याद आ जाती है और दिमाग में एक ऐसा प्रतिभावान इंसान उभर कर आता है जिसने अपने दिमाग की ताकत से ही भारत की पूरी राजनीति को ही बदल दिया था |

एक ऐसा इंसान जो हमें यह बताता है कि यदि किसी इंसान में आत्मविश्वास हो तो बड़े से बड़ा संकल्प को भी पूरा किया जा सकता है ……………………………………………………………………………………….चाणक्य यानि कौटिल्य राजतंत्र का पक्षधर था | एक व्यावहारिक एवं चतुर राजनीतिज्ञ के रूप में भी उसे ख्याति मिली । नंदवंश के विनाश तथा मगध साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार में उसका ऐतिहासिक योगदान रहा । ‘मैकियावेली’ की भाँति कौटिल्य ने भी राजनीति को नैतिकता से पृथक कर एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में अध्ययन करने का प्रयास किया है। …………………………………………………………………………………………..जैसा कि कहा जाता है , कौटिल्य नाम प्रतीकात्मक है, जो कुटिलता का प्रतीक है। कौटिल्य के कई सन्दर्भों से यह स्पष्ट हो चुका है कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता से नंदवंश का नाश किया था और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी।………………………………. ………………………………..चाणक्य और मकियावेली

यह सत्य है कि कौटिल्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए गुप्त जासूसों के एक विशाल संगठन का वर्णन किया है। शत्रुनाश के लिए विषकन्या, गणिका, औपनिषदिक प्रयोग, अभिचार मंत्र आदि अनैतिक एवं अनुचित उपायों का विधान है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महान धन-व्यय तथा धन-क्षय को भी राष्ट्र-नीति के अनुकूल घोषित किया …………………………………………………………(सुमहताऽपि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्य:)

‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में ऐसी चर्चाओं को देखकर ही मुद्राराक्षसकार कवि विशाखादत्त चाणक्य को कुटिलमति कहा है …………………………… (कौटिल्य: कुटिलमतिः)….…………..और बाणभट्ट ने ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को ‘निर्गुण’ तथा निर्दयता तथा नृशंसता का उपदेश देने वाला कहकर निन्दित बतलाया है। ‘अतिनृशंसप्रायोपदेशम्’’……..………………………………………………………..मञ्जुश्री मूलकल्प’ नाम की एक नवीन उपलब्ध ऐतिहासिक कृति में कौटिल्य को ‘दुर्मति’, क्रोधन और ‘पापक’ पुकारकर गर्हा का पात्र प्रदर्शित किया गया है।

…………………………………………………………………………………….प्राच्यविद्या के विशेषज्ञ अनेक आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने भी उपर्युक्त अनैतिक व्यवस्थाओं को देखकर कौटिल्य की तुलना यूरोप के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिज्ञ “मेकियावली” से की है, जिसने अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स’ में राजा को लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उचित अनुचित सभी साधनों का आश्रय लेने का उपदेश दिया है। विण्टरनिट्ज आदि पाश्चात्य विद्वान् कौटिल्य तथा मेकियावली में निम्नलिखित समानताएं प्रदर्शित करते हैं:

इन समानताओं भरी विशेषताओं को आधुनिक चाणक्य अमित शाह जी के परिपेक्ष्य मैं पाठक स्वयं नाप तोल सकते हैं |

(क) मेकियावली और कौटिल्य दोनों राष्ट्र को ही सब कुछ समझते हैं। वे राष्ट्र को अपने में ही उद्देश्य मानते हैं।

(ख) कौटिल्य-नीति का मुख्य आधार है,………………………………. ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ …………………..अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की अभिवृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।

(ग) अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किसी भी साधन, नैतिक या अनैतिक, का आश्रय लेना अनुचित नहीं है। मेकियावली और कौटिल्य दोनों का मत है कि साध्य को सिद्ध करना ही राजा का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। साधनों के औचित्य या अनौचित्य की उसे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

(घ) दोनों युद्ध को राष्ट्र-नीति का आवश्यक अंग मानते हैं। दोनों की सम्मति में प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध के लिए उद्यत रहना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा देश की सीमा तथा प्रभाव का विस्तार हो सकता है।

(ङ) अपनी प्रजा में आतंक स्थापित करके दृढ़ता तथा निर्दयता से उस पर शासन करना दोनों एक समान प्रतिपादित करते हैं। दोनों एक विशाल सुसंगठित गुप्तचर विभाग की स्थापना का समर्थन करते हैं, जो प्रजा के प्रत्येक पार्श्व में प्रवेश करके राजा के प्रति उसकी भक्ति की परीक्षा करे और शत्रु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को गुप्त उपायों से नष्ट करने का यत्न करे।

कौटिल्य तथा मेकियावली में ऐसी सदृशता दिखाना युक्तिसंगत नहीं। निस्सन्देह कौटिल्य भी मेकियावली के समान यथार्थवादी था और केवल आदर्शवाद का अनुयायी न था। परन्तु यह कहना कि कौटिल्य ने धर्म या नैतिकता को सर्वथा तिलांञ्जलि दे दी थी, सत्यता के विपरीत होगा। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में ही स्थापना की है;

तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।
स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति॥ (1/3)

अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।

इसी प्रथम अधिकरण में ही राजा द्वारा अमर्यादाओं को व्यवस्थित करने पर भी बल दिया गया है और वर्ण तथा आश्रम-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आदेश दिया गया है। यहां पर त्रयी तथा वैदिक अनुष्ठान को प्रजा के संरक्षण का मूल आधार बतलाया गया है। कौटिल्य ने स्थान-स्थान पर राजा को वृद्धों की संगत करने वाला, विद्या से विनम्र, जितेन्द्रिय और काम-क्रोध आदि शत्रु-षड्वर्ग का दमन करने वाला कहा है। ऐसा राजा अधार्मिक अथवा अत्याचारी बनकर किस प्रकार प्रजा-पीड़न कर सकता है ? इसके विपरीत राजा को प्रजा के लिए पितृ-तुल्य कहा गया है, जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण, संवर्धन, संरक्षण, भरण, शिक्षण इत्यादि वैसा ही करता है जैसा वह अपनी सन्तान का करता है।

यह ठीक है कि कौटिल्य ने शत्रुनाश के लिए अनैतिक उपायों के करने का भी उपदेश दिया है। परन्तु इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के निम्न वचन को नहीं भूलना चाहिए:

एवं दूष्येषु अधार्मिकेषु वर्तेत, न इतरेषु। (5/2)

अर्थात्- इन कूटनीति के उपायों का व्यवहार केवल अधार्मिक एवं दुष्ट लोगों के साथ ही करे, धार्मिक लोगों के साथ नहीं। (धर्मयुद्ध में भी अधार्मिक व्यवहार सर्वथा वर्जित था। केवल कूट-युद्ध में अधार्मिक शत्रु को नष्ट करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता था।)………………………………………………………………………………….राजनीतिक शास्त्र को धार्मिकता की ओर अधिक झुके होने की प्रवृत्ति से मुक्त किया। यद्यपि वह धर्म व नैतिकता का विरोध नहीं करता, किन्तु उसने राजनीति को साधारण नैतिकता के बन्धनों से मुक्त रखा है।…………………………………………………………………………………….संकटकाल में राजस्व प्राप्ति हेतु वह राजा को अनुचित तरीके अपनाने की भी सलाह देता है।… राज्य का हित सर्वोपरि है जिसके लिए कई बार वह नैतिकता के सिद्धांतो को भी परे रख देता है।……………………………………………………………………………………….“अगर सांप जहरीला न भी हो तो उसे खुद को जहरीला दिखाना चाहिए।”..……………………………………………………………………………….भारत मैं एक ऐसा व्यक्ति जिसको चाणक्य कहा जाता है जिसने अपनी कूटनीतियों से विशाल साम्राज्य स्थापित किया | जिसको दुनियां ने शातिर ,धूर्त माना | जो शातिरता का पर्याय था | और अब भी माना जाता है | लोग अपने आप को चाणक्य कहलाना सम्मान की बात मानते हैं | और दुनियां भी उस व्यक्ति की शातिरता यानि धूर्तता को चाणक्य बुद्धि से सम्मानित करती है | यानि सीधी ऊँगली से घी नहीं निकले तो चाणक्य नीति से ऊँगली टेडी कर लो | जीत गए तो चाणक्य नीति हार गए तो शातिर ,धूर्त ….| ………………………………………………………………………………………....अरविन्द्र केजरीवाल और उनके बकील राम जेठमलानी …………………………………………………………………………………………. अरुण जेटली द्वारा अरविन्द्र केजरीवाल पर किये मान हानि के मुकदमे की पैरवी कर रहे राम जेठमलानी द्वारा अरुण जेटली को शातिर यानि धूर्त कहा जिस पर अरुण जेटली ने पुनः मान हानि का मुकदमा दायर कर दिया | राम जेठमलानी कहते हैं कि मैंने अरविन्द्र केजरीवाल के कहने पर कहा | अरविन्द्र केजरीवाल और उनके बकील राम जेठमलानी द्वारा जान बूझ कर शातिर और धूर्त कहा आखिर वे क्या सिद्ध करना चाह रहे थे जब कि उन्हें मालूम था कि मान हानि का मुकदमा हो सकता है | ……………………………………………………………………………………………….क्या अपने आप को चाणक्य कहलाने मैं गौरव महसूस करने वालों के लिए कोई सन्देश देना चाहते हैं | या चाणक्य को शातिर ,धूर्त का पर्याय सिद्ध करके उनको हतोत्साहित करना चाहते हैं | …जो भी हो चाणक्य जब तक जिन्दा रहा अपने शातिर दिमाग से विजय पाता रहा और चाणक्य नाम से गौरवान्वित होता रहा | विश्व ने उसकी नीतियों का गुण गान करते अनुसरण किया और विजय पाई | दुनियां उसकी नीतियों को चाणक्य नीति के नाम से जानती अनुसरण करती है | शातिर नीति या धूर्त नीति नाम से राज काज नहीं चलाया जा सकता है | | …………………………………………………………………………………………...रक्तबीज क़ी तरह .वर्तमान हिंदुस्तान मैं चाणक्यों की भरमार हो गयी है | यदि राम जेठमलानी ,अरविन्द्र केजरीवाल यदि अरुण जेटली की पर ग्लानि करते चाणक्य नीति अपनाते हैं तो अमित शाह भी तो ऊँचे लेवल के चाणक्य बन चुके हैं अतः उनको ऊँचे व्यक्ति की पर ग्लानि से ही ऊंची सीडी मिलेगी | अब महात्मा गाँधी जी तो रहे नहीं जो मान हानि का मुकदमा करते ,राष्ट्रपिता तो पूरे देश के हैं अतः अपनी अपनी क्षमता से अलंकृत कर सकते हैं | ………………………………………………………………………..जब चाणक्य महान माना जाता है और उसकी नीतोयां महान तो उसका अनुसरण करना तो और भी महानता का परिचायक हुआ | माननीय न्यायलय ने इस पर विचार करके ही न्याय करना चाहिए | ……………………………………………………………………...ॐ शांति शांति शांति

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