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दुनिया पर कम्युनिस्ट सोच का असर

Posted On: 24 Aug, 2018 Uncategorized में

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hksharma1

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बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसीलिए किया गया था, की जनता की सालों की बचत पर भी नेताओं और सरकारी बाबुओं का नियंत्रण हो जाये.  आम आदमी लोन लेने जाये तो दस तरह के पेपर मांगते हैं. घूस ,प्रमोशन और ट्रांसफर के लालच मैं या नेता के फ़ोन करने पर चोर किस्म के बिजनेसमैन के पेपर ये खुद तैयार कर देते हैं. जबकि गरीब को साहूकारों से बचाने के नाम पर यह किया गया था, लाखों करोड़ रुपए जनता के डुबो दिए. 1947 से 2008 तक 18 लाख करोड़ रुपए लोन बांटा था और 2009 से 2014 तक 52 लाख करोड़ बाँट दिया . उसमें से 12 लाख करोड़ वापस नहीं आ रहा है ,  ये तो होना ही था. कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर सरकारी एकाधिकार किया गया. आज यह हालत है देश मैं कोयले के प्रचुर भंडार होते हुए भी महंगा कोयला आयात करना पड़ता है और देश मैं निकला कोयला भी बहुत महंगा पड़ता है. जब सैलरी 3000 रुपए थी बीएसएनएल 1 मिनट बात  के 100  रुपए लेता था, आज आप  देख ही रहे हैं. एकाधिकार खत्म होने से इतने साल बाद कितना सस्ता हो गया है.

35 साल से एच ए एल  प्लेन बना रहा है, हज़ारों करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए, अभी भी  तेजस विमान का इंजन अमेरिकन कंपनी जी. इ . और कण्ट्रोल सिस्टम्स भी अमेरिकन कंपनी  के हैं,  फ्रेम की डिज़ाइन टेस्टिंग के लिए विंड टनल भी हमारे पास नहीं है.  अगर प्राइवेट प्लेयर्स को काम दिया होता, तो आज देश आयात की बजाय निर्यात कर रहा होता, देश के लोगों को काम मिलता .  यु पी ए  आएगा तो नरेगा की तरह की नई योजना लाएगा, उत्तर कोरिआ जैसा हमें बनाएगा.  कोरिया हज़ारों साल से एक देश था, जिसे जापान ने 1910 मैं गुलाम बना लिया, 1948 में हमारे साथ ही आजाद हुआ, दो टुकड़े हो गए. साउथ कोरिआ में लोकतंत्र और फ्री मार्किट की पालिसी अपनाई गयी हुंडई, सैमसंग, एल जी  , देवू  जैसी प्राइवेट कम्पनीज ने साउथ को विकसित देश बना दिया.  एक आदमी की कमाई 28000 डॉलर है,  हमारी 1700 डॉलर है और नार्थ कोरिआ की 600 डॉलर है. नार्थ में कम्युनिज्म आया सब कुछ सरकारी, जमीन, फैक्ट्री, स्कूल,न्यूज़ पेपर ,टीवी.  और सब लोग बराबर लेकिन उनका देश बर्बाद हो गया हम से भी पीछे छूट गया कांग्रेस की नीतिओं  पर भी कम्युनिज्म का प्रभाव रहा है, पर नार्थ कोरिया जैसा नहीं इसलिए हम उससे आगे हैं.

सब लोग बराबर यह एक बहुत अच्छी अवधारणा है, तो कम्युनिज्म क्यों फेल हो गया. एक कम्युनिस्ट लीडर बनने के लिए इंसान में गुस्सा भरा होना चाहिए  समाज के, व्यवस्था के या परिवार के प्रति,  ऐसे लोग नेता बनने लगे. दुनिआ उन लोगों से आगे बढ़ी है, जो कहीं ध्यान नहीं देते अपनी धून में लगे रहते हैं. कम्युनिस्ट लीडर पावर लेकर ऐसे लोगों को भी काम नहीं करने देते इसीलिए इतनी अच्छी अवधारणा ने भी देशों को बर्बाद कर दिया है.  गरीबी दूर करने में और समानता लाने में, लोकतंत्र और फ्री मार्किट ने बहुत ज़यादा सफलता पाई है, जबकि कम्युनिस्टों ने लोगों को बर्बाद कर दिया है.  वेनेजुएला मैं दुनिआ के सबसे ज्यादा तेल के भंडार हैं, कम्युनिस्टों  के कारन वहां क्या हालत हो गई है,  22 प्राइवेट कम्पनिओं का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था, रोज समाचार पत्रों मैं वहां के बुरे हालात के बारे मैं पढ़ते हैं. वेनेजुएला हमेशां ऐसा नहीं था पर आगे बढ़ने की बजाय बर्बाद हो गया.

कोरिया उदहारण है, हज़ारों सालों  से एक ही जैसे लोग,  70 साल से अलग -अलग सिस्टम, अलग- अलग परिणाम. सब कुछ सरकारी जमीन, फैक्ट्री, स्कूल,न्यूज़ पेपर ,टीवी लोग दुनिया से कटे हैं, उन्हें मालूम नहीं दुनिआ कैसे जी रही है, वो अपने को ही अच्छा मानते हैं, जैसा की सरकार बताती है. सचमुच ऐसा है   कम्युनिस्ट सोच पर भी कण्ट्रोल करते हैं. हमारे देश मैं,  सरकार ने व्यापार पर पूरा नियंत्रण कर रखा था, व्यापार के लिए कई तरह की अनुमति और बैंक का लोन सरकार के हाथ मैं था, और उद्यमी वही हो सकता था, जिसकी सरकार से जुगलबंदी हो, जुगलबंदी वाले दलाल किस्म के लोग होते हैं. सरकार ही अपने नियंत्रण मैं दलाल किस्म के बिजनेसमैन बनाती थी, और जनता को इनसे डराती थी.  अपनी मेहनत और गुण से आगे बढे लोग हमेंशा अच्छे लोग होते हैं उन्हें जो दुनिया से मिलता है उसे कई गुना कर वापस भी देते हैं. पर ऐसे लोग अनुमति और पूंजी नहीं पा पाते हैं, और इन्हें दलालों के यहाँ नौकरी करनी पड़ती है.

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