blogid : 10082 postid : 74

ग़ज़ल : "सय्याद ने कफस को रखा चमन के पास"

Posted On: 17 May, 2012 Others में

कड़वा सच ......सत्य कहने से अभी तक डरा नहीं है / घाव गहरा है अभी तक भरा नहीं है // लाख पैरों तले कुचला गया "अंकुर" ज़माने के सत्य से जन्मा है, इसलिए मरा नहीं है //

Mohd Haneef "Ankur"

23 Posts

650 Comments

(Kafas)

जाने को हूँ बैचैन मैं, अपने सजन के पास !
सय्याद ने कफस को, रखा चमन के पास !!
.
गुलशन की महक मुझको अच्छी नहीं लगी,
रहना नहीं है मुझको ऐसी घुटन के पास !
.
महरूम हो गया हूँ, दुनियाँ की चमक से,
घर बन गया है देखो मेरा तपन के पास !
.
मैंने हसीन ख्वाव सजाया था आँख में,
खोली जो मैंने आँख तो पाया चुभन दे पास !
.
मैयत की मेरी दोस्तों तैयारियां करो,
अब ले चलो यहाँ से मुझको अमन के पास !
.
मैं तो चला गया हूँ दुनियाँ से बहुत दूर,
फरमान अपना रख दो चलती पवन के पास !
.
जब था कफस में कैद तो आये नहीं करीब,
अब रो रहे हो बैठकर मेरे कफ़न के पास !
.
जुल्मो-सितम से मुझको सताया गया बहुत,
दिल काट कर रखा गया मेरा अगन के पास !
.
दुनियाँ की ठोकरें मिलीं “अंकुर” तुझे बहुत,
राहत मिली, सुकूं मिला, रब के वतन के पास !
**************************************

सय्याद = शिकारी,    कफस = पिंजरा,     मैयत = अर्थी

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग