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क्यों सीता को अपने पति की बदनामी का भय सता रहा था, जानिए पुराणों में लिखी एक रहस्यमय घटना?

Posted On: 14 Apr, 2014 Others में

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पुराणों में हिन्दू देवी-देवताओं से जुड़े कई किस्से व्याप्त हैं. धर्म ग्रंथों का जिक्र करें तो जिन 33 करोड़ देवी-देवताओं की बातें हम करते हैं उनसे जुड़ी कोई ना कोई घटना का उल्लेख उनमें जरूर होता है. भारत विभिन्नताओं का देश है और यहां कदम-कदम पर धार्मिक मतावलंबियों की आस्था में भी विभिन्नता देखी जा सकती है लेकिन किसी ना किसी रूप या अवतार में भगवान राम का संबंध लगभग सभी धर्मों में देखा जा सकता है. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का उल्लेख एक ऐसे पुत्र, पति और राजा के तौर पर होता आया है जिन्होंने ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ की अवधारणा पर अपना पूरा जीवन बिता दिया. मर्यादाओं के घेरे में घिरे राम ने अपने सभी कर्मों को धर्म के अनुसार पूरा किया है. सीता हरण और भगवान श्रीराम द्वारा अपनी पत्नी को रावण की कैद से मुक्त करवाए जाने जैसी घटना के बारे में सभी ने सुना होगा और आज हम इसी घटना से जुड़े एक ऐसे रहस्य से पर्दा उठाने जा रहे हैं जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं:

ramayan


अपनी बहन शूर्पणखा की कटी नाक का बदला लेने के लिए साधु का भेष बदलकर असुर रावण, भगवान श्रीराम की पत्नी सीता को हरने के लिए उनकी कुटिया पहुंचा.

surpnakha


सीता के लंका के राजा रावण के पास होने की खबर मिलने के बाद भगवान राम ने हनुमान को अपना दूत बनाकर सीता के पास ये संदेश पहुंचाने के लिए भेजा कि वह जल्द ही उन्हें मुक्त करवाने आएंगे.


लेकिन ये सवाल हर समय उठता है कि जब हनुमान स्वयं इतने शक्तिशाली और ताकतवर थे तो उन्होंने स्वयं सीता को रावण की कैद आजाद क्यों नहीं करवाया? सिर्फ संदेश पहुंचाकर ही क्यों वह वापस लौट आए?

hanuman


असल में पवनपुत्र हनुमान ने माता सीता से आग्रह किया कि वह उनके साथ यहां से चलें. लेकिन सीता ने ये कहकर उनके आग्रह को टाल दिया कि वह किसी पर पुरुष को छू नहीं सकतीं.

sita and hanuman


इस पर हनुमान ने उनसे कहा कि वह उनके पुत्र के समान हैं और अगर कोई माता अपने पुत्र को छूती है तो वह पाप नहीं होता.

hanuman


हनुमान का कथन भी सही था लेकिन सीता ने फिर भी उनके साथ चलने से मना कर दिया. सीता ने हनुमान से कहा कि उनका काम सिर्फ संदेश पहुंचाना था और ये काम वे भली-भांति कर चुके हैं. इसके अतिरिक्त उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी इसलिए अब वह चले जाएं.



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असल में सीता को डर था कि अगर वह हनुमान के साथ लंका छोड़ देंगी तो उनके पति यानि भगवान श्रीराम के विषय में संसार तक गलत संदेश पहुंचेगा. संसार में उनकी अपकीर्ति होगी और वह असुर सम्राट राजा रावण को दंडित भी नहीं कर पाएंगे.


पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान के साथ सीता के लंका से वापस ना आने का एक और कारण भी है. रावण समेत अनेक श्रापित लंकावासियों की नियती थी कि वे किसी अवतारित पुरुष के लंका आगमन के बाद ही उन्हें संबंधित श्राप से मुक्त होंगे, इसलिए भगवान श्रीराम का लंका जाना आवश्यक था.


अनेक किस्सों में एक ये किस्सा भी है, अब पुराणों की बातें झुठलाई नहीं जा सकतीं इसलिए भगवान राम की महिमा का ये उदाहरण भी खूब रहा.


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