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अधर्मी दुर्योधन को एक घटना ने बना दिया महापुरुष, आखिर क्या था पांच सुनहरे वाणों का रहस्य

Posted On: 9 Sep, 2015 Others में

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धार्मिक और पौराणिक ग्रंथ महाभारत हिन्दुओं का एक ऐसा प्रमुख काव्य ग्रंथ है जिसकी रचना धर्म की संस्थापना हेतु की गई थी. इस विशाल ग्रंथ में ऐसे अनेकों पात्र रहे हैं जिन्होंने अपने कृत्य से अधर्म की संस्कृति विकसित कर ली थी. इसी अधर्म के नाश के लिए ही महाभारत में धर्म के किरदार भी गढ़े गए थे.


यहां बात अधर्म की हो रही है तो महाभारत में सबसे बड़ा अधर्मी दुर्योधन था, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता. सबसे बड़े प्रपंची मामा शकुनि के बहकावे में आकर उसने अनेक अनैतिक और अधार्मिक कार्य किए. उसने पांडवों को नष्ट करने लिए अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर कई प्रपंच रचे. महाभारत युद्ध के लिए भी हम दुर्योधन को सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन कोई सोच सकता है कि यही दुर्योधन एक कर्तव्यनिष्ठ धार्मिक योद्धा भी हो सकता है. आइए इसे एक घटना के जरिए समझते हैं.


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महाभारत युद्ध में कौरवों की हार हो रही थी. यह चीज दुर्योधन को बर्दाश्त नहीं हो रहा था, उसने एक रात भीष्म पितामह पर यह आरोप लगाया कि पांडवों के साथ ज्यादा लगाव होने की वजह से आप पूरी शक्ति के साथ पांडवों से युद्ध नहीं कर रहे हैं. इस आरोप से भीष्म पितामह क्रोधित हो गए और उन्होंने पांच ऐसे सुनहरे बाण निकाले जिनके उपर पांडव पुत्रों की मौत लिखी थी. उन्होंने दुर्योधन को बताया कि इन पांच बाणों से ही पांडव पुत्रों का वध होगा. दुर्योधन को भीष्म पितामह की बातों पर यकीन नहीं हुआ, इसलिए उसने पांचों तीरों को अपने कब्जे में ले लिया और कहा कि यह सुबह तक मेरे पास ही रहेंगे.


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पांडव पुत्रों का वध करने वाले इन पांच बाणों के बारे में भगवान श्रीकृष्ण भी जानते थे इसलिए उन्होंने उसी रात अर्जुन को उस वरदान का स्मरण कराया जब पांडव पुत्र जंगल में निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे थे.


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दरअसल महाभारत युद्ध से बहुत पहले 12 साल के वनवास के दौरान पांडव पुत्र एक कुण्ड के पास रहते थे. उस कुंड के सामने दुर्योधन भी शिविर लगाकर रह रहा था, ताकि पांडव पुत्रों पर नजर रख सके. एक बार जब दुर्योधन उसी कुंड में नहाने गया उसी दौरान गंधर्व राजकुमार भी उसी कुंड में नहाने के लिए आए. यह चीज दुर्योधन को पसंद नहीं आई उन्होंने गंधर्व के साथ युद्ध किया. इस युद्ध में दुर्योधन को बंदी बना लिया गया.


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धर्मराज युधिष्ठिर के कहने पर अर्जुन ने ही गंधर्व से दुर्योधन को मुक्त कराया था. अर्जुन के हाथों मुक्त होने की वजह से अहंकारी दुर्योधन खुद में लज्जित महसूस कर रहा था लेकिन एक क्षत्रिय होने के नाते उसने अर्जुन को वरदान मांगने को कहा. तब अर्जुन ने उसे कहा कि सही समय आने पर वह अपना वरदान जरूर मांगेगा.



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भगवान श्रीकृष्ण इसी वरदान के बारे में अर्जुन को स्मरण करा रहे थे. उन्होंने अर्जुन से कहा कि जाओ पार्थ, दुर्योधन से वह पांच सुनहरे बाण लेकर आओ जिसे भीष्म पितामह ने तुम पांच भाइयों के वध के लिए घोषित कर रखा है.


दुर्योधन के पास पहुंचने के बाद जब अर्जुन ने उन पांच सुनहरे बाणों की मांग की तो वह हैरान हो गया. तब अर्जुन ने उसे पुराने वरदान के बारे में याद दिलाया. आखिरकार दुर्योधन को न चाहते हुए भी अपने वरदान को पूरा करना पड़ा और उन पांचों बाणों को अर्जुन को समर्पित करना पड़ा जिससे पांचों पांडवों की मृत्यु निश्चित हो जाती.


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दुर्योधन चाहता तो यह बाण अर्जुन को नहीं देता और अपने दिए हुए वरदान की अवहेलना कर देता लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने एक महापुरुष की भांति अर्जुन को बाण देकर अपने वचन की प्रतिष्ठा रखी.


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