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पहले परमाणु परीक्षण के बाद एटम बम के जनक ने दुहराया गीता का श्लोक

Posted On: 30 May, 2016 Politics में

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6 अग्स्त 1945 की सुबह, जापान का हिरोशिमा शहर अपने नींद से बस जागा ही था. 8:15 पर उसने अपने आकाश पर 3 अमेरीकी लड़ाकू विमानों को मंडराते देख उसे खतरे का अभास तो हुआ, पर वह यह नहीं समझ पाया की अगले ही क्षण न केवल जापान का बल्कि पूरे विश्व का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाने वाला है.
लिटिल बॉय नामक अमेरिकी परमाणु बम ने जापान के हिरोशिमा शहर को पूरी तरह नष्ट कर दिया. 3 दिन बाद जापान का एक और शहर नागासाकी का भी यही हश्र हुआ. इन हमलों के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया. मित्र देश अंतिम रूप से विजयी हो गए और दुनिया की चौधराहट अमेरिका को मिल गई.
उपरोक्त सभी बाते हजारों किताबों में हजारों तरीके से लिखी जा चुकीं हैं. चलिए इससे कुछ आगे बढ़ते हैं. जे. रॉबर्ट ओपनहाईमर जिन्हें परमाणु बम का जनक कहा जाता है, उनसे एक कॉलेज में लेक्चर के दौरान एक छात्र पूछता है कि, “मैनहैटन प्रोजेक्ट के दौरान धरती पर हुए पहले परमाणु परीक्षण के बाद आपको कैसा महसूस हुआ.”
इस छात्र के प्रश्न का तात्पर्य यह था कि क्या अमेरिका ने मैनहैटन परमाणु परीक्षण जिसके ओपनहाईमर इंचार्ज थे, उससे पहले भी कोई परमाणु परीक्षण किया था? इस प्रश्न पर ओपनहाईमर का जवाब था कि यह धरती का पहला परमाणु विस्फोट नहीं था बल्कि आधुनिक युग का पहला परमाणु विस्फोट था. ओपनहाईमर के इस कथन का क्या अर्थ था. इसका जवाब हमें भारत में हजारों साल पहले लिखे गए ग्रंथ महाभारत में मिलता है.
महाभारत के द्रोण पर्व के अनुसार अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा युद्ध में उतरते हैं और पांडवों का सर्वनाश करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. अश्वत्थामा के जवाब में अर्जुन भी समान अस्त्र का प्रयोग करते हैं. ब्रहमास्त्र को प्रचीन ग्रंथों में एक ऐसे अस्त्र के रूप में उल्लेख किया गया है जिसका प्रयोग आखिरी विकल्प के रूप में किया जाता था. अश्वत्थामा और अर्जुन के इन भयंकर अस्त्रों की टकराहट से धरती पर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई. महाभारत के अनुसार वह एक ऐसा प्रक्षेपण था जिसमें संपूर्ण ब्रहमाण्ड की शक्ति निहित थी. धुंए और लपट का ऐसा बवंडर जैसे हजारों सूर्य एक साथ अपनी पूरे तेज के साथ उगे हों.
यह एक अंजान अस्त्र था, मृत्यु का भयंकर दूत जो हर चीज को राख में बदल रहा था. लाशें इस कदर जल रहीं थी जिसे पहचानना मुश्किल था. लोगों के बाल और नाखुन झड़ गए. मृदभांड बिना किसी दिखाई देने वाले कारण से फूटने लगे और पक्षियों का रंग सफेद हो चला. कुछ घंटे बाद भोजन संक्रमित हो गए. इस अस्त्र के प्रकोप से बचने के लिए सैनिक नदियों में कूदने लगे जिससे उन्हें कुछ राहत मिल रही थी.
महाभारत में वर्णित ब्रहमास्त्र के प्रभाव के इस वर्णन और हिरोशिमा और नागासाकी में हुए परमाणु विस्फोट क बाद उत्पन्न परिस्थितियों में काफी समानता है. तो क्या इसका अर्थ यह है कि ब्रहमास्त्र दरअसल आधुनिक युग का परमाणु बम था? उस छात्र को दिए अपने जवाब में ओपनहाईमर का यही इशारा है.
1933 में रोबर्ट ओपनहाईमर ने संस्कृत सीखकर गीता और महाभारत का गहन अध्ययन करना शुरू किया. लॉस एलमोस में ओपनहाईमर के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने महाभारत में वर्णित ब्रहमास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किए, ऐसा माना जाता है कि 16 जुलाई 1945 को अलामोगोर्दो के निकट हुए पहले परमाणु परीक्षण में इस शोध का बड़ा योगदान था.
विस्फोट को देखते हुए ओपनहाईमर गीता का यह श्लोक दोहरा उठे-
सको उन्होंने अनुदित किया: “मैं मृत्यु बन गया हूँ, संसारों को नष्ट करने वाला”
ओपनहाईमर ने इस ऐतिहासिक परीक्षण से दो दिन पहले भी अपनी आशाओं और डर को व्यक्त करने के लिए गीता का एक श्लोक अपने टीम के सामने उद्धृत किया था, पर 1965  में एक टीवी प्रसारण के दौरान उन्होंने जो कुछ कहा वह आज भी याद किया जाता है.
“यह प्रशीक्षण करते हुए हम जानते थे कि विश्व अब पहले जैसा नहीं रहेगा. मुझे गीता की एक पंक्ति याद आ गई- विष्णु राजकुमार को इस बात के लिए मना रहें हैं कि वह अपना कर्तव्य निभाएंगे और उससे कहते हैं, मैं मृत्यु बन गया हूं, संसारों को नष्ट करने वाला और मुझे लगता है हम सब कुछ ऐसा ही सोच रहे थे.”
इतने भयंकर हथियारों के प्रयोग के बाद सचमुच विश्व फिर पहले जैसा नहीं रहा था. ब्रह्मास्त्र के प्रयोग ने महाभारत के युद्ध का अंत किया और आधुनिक युग में परमाणु बम ने द्वितीय विश्व युद्ध का.
यह कहना तो मुश्किल है कि प्रचीन भारत परमाणु संपन्न समाज था पर इस संभावना से इंकार करना भी उतना ही मुश्किल है. गौरतलब है अणु या एटम की खोज महर्षि कणाद ने जॉन डाल्टन से करीब 2400 साल पहले किया था. आधुनिक युग में जॉन डाल्टन की एटम की खोज ही आगे चलकर एटम बम का आधार बनी.
इतना ही नहीं मोहनजोदड़ो का सड़कों पर ऐसी लाशों का दबा मिलना जिनमें से निकलने वाली रेडियोधर्मी विकरण समान्य से 50 गुना अधिक है, यह संकेत देती है कि संभवत: इस धरती ने भी जापान के दो शहरों के भांति परमाणु हमले का दंश झेला है. यानी हजारों साल पहले यहां का समाज परमाणु शक्ति संपन्न था?

6 अग्स्त 1945 की सुबह, जापान का हिरोशिमा शहर अपने नींद से बस जागा ही था. 8:15 पर उसने अपने आकाश पर 3 अमेरीकी लड़ाकू विमानों को मंडराते देख उसे खतरे का अभास तो हुआ, पर वह यह नहीं समझ पाया की अगले ही क्षण न केवल जापान का बल्कि पूरे विश्व का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाने वाला है. लिटिल बॉय नामक अमेरिकी परमाणु बम ने जापान के हिरोशिमा शहर को पूरी तरह नष्ट कर दिया. 3 दिन बाद जापान का एक और शहर नागासाकी का भी यही हश्र हुआ. इन हमलों के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया. मित्र देश अंतिम रूप से विजयी हो गए और दुनिया की चौधराहट अमेरिका को मिल गई. उपरोक्त सभी बाते हजारों किताबों में हजारों तरीके से लिखी जा चुकीं हैं. चलिए इससे कुछ आगे बढ़ते हैं. जे. रॉबर्ट ओपनहाईमर जिन्हें परमाणु बम का जनक कहा जाता है, उनसे एक कॉलेज में लेक्चर के दौरान एक छात्र पूछता है कि, “मैनहैटन प्रोजेक्ट के दौरान धरती पर हुए पहले परमाणु परीक्षण के बाद आपको कैसा महसूस हुआ.” इस छात्र के प्रश्न का तात्पर्य यह था कि क्या अमेरिका ने मैनहैटन परमाणु परीक्षण जिसके ओपनहाईमर इंचार्ज थे, उससे पहले भी कोई परमाणु परीक्षण किया था? इस प्रश्न पर ओपनहाईमर का जवाब था कि यह धरती का पहला परमाणु विस्फोट नहीं था बल्कि आधुनिक युग का पहला परमाणु विस्फोट था. ओपनहाईमर के इस कथन का क्या अर्थ था. इसका जवाब हमें भारत में हजारों साल पहले लिखे गए ग्रंथ महाभारत में मिलता है.


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महाभारत के द्रोण पर्व के अनुसार अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा युद्ध में उतरते हैं और पांडवों का सर्वनाश करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. अश्वत्थामा के जवाब में अर्जुन भी समान अस्त्र का प्रयोग करते हैं. ब्रहमास्त्र को प्रचीन ग्रंथों में एक ऐसे अस्त्र के रूप में उल्लेख किया गया है जिसका प्रयोग आखिरी विकल्प के रूप में किया जाता था. अश्वत्थामा और अर्जुन के इन भयंकर अस्त्रों की टकराहट से धरती पर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई. महाभारत के अनुसार वह एक ऐसा प्रक्षेपण था जिसमें संपूर्ण ब्रहमाण्ड की शक्ति निहित थी. धुंए और लपट का ऐसा बवंडर जैसे हजारों सूर्य एक साथ अपनी पूरे तेज के साथ उगे हों.



यह एक अंजान अस्त्र था, मृत्यु का भयंकर दूत जो हर चीज को राख में बदल रहा था. लाशें इस कदर जल रहीं थी जिसे पहचानना मुश्किल था. लोगों के बाल और नाखुन झड़ गए. मृदभांड बिना किसी दिखाई देने वाले कारण से फूटने लगे और पक्षियों का रंग सफेद हो चला. कुछ घंटे बाद भोजन संक्रमित हो गए. इस अस्त्र के प्रकोप से बचने के लिए सैनिक नदियों में कूदने लगे जिससे उन्हें कुछ राहत मिल रही थी. महाभारत में वर्णित ब्रहमास्त्र के प्रभाव के इस वर्णन और हिरोशिमा और नागासाकी में हुए परमाणु विस्फोट क बाद उत्पन्न परिस्थितियों में काफी समानता है. तो क्या इसका अर्थ यह है कि ब्रहमास्त्र दरअसल आधुनिक युग का परमाणु बम था? उस छात्र को दिए अपने जवाब में ओपनहाईमर का यही इशारा है.

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1933 में रोबर्ट ओपनहाईमर ने संस्कृत सीखकर गीता और महाभारत का गहन अध्ययन करना शुरू किया. लॉस एलमोस में ओपनहाईमर के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने महाभारत में वर्णित ब्रहमास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किए, ऐसा माना जाता है कि 16 जुलाई 1945 को अलामोगोर्दो के निकट हुए पहले परमाणु परीक्षण में इस शोध का बड़ा योगदान था.


विस्फोट को देखते हुए ओपनहाईमर गीता का यह श्लोक दोहरा उठे-

सको उन्होंने अनुदित किया: “मैं मृत्यु बन गया हूँ, संसारों को नष्ट करने वाला”



ओपनहाईमर ने इस ऐतिहासिक परीक्षण से दो दिन पहले भी अपनी आशाओं और डर को व्यक्त करने के लिए गीता का एक श्लोक अपने टीम के सामने उद्धृत किया था, पर 1965  में एक टीवी प्रसारण के दौरान उन्होंने जो कुछ कहा वह आज भी याद किया जाता है. “यह प्रशीक्षण करते हुए हम जानते थे कि विश्व अब पहले जैसा नहीं रहेगा. मुझे गीता की एक पंक्ति याद आ गई- विष्णु राजकुमार को इस बात के लिए मना रहें हैं कि वह अपना कर्तव्य निभाएंगे और उससे कहते हैं, मैं मृत्यु बन गया हूं, संसारों को नष्ट करने वाला और मुझे लगता है हम सब कुछ ऐसा ही सोच रहे थे.” इतने भयंकर हथियारों के प्रयोग के बाद सचमुच विश्व फिर पहले जैसा नहीं रहा था.

ब्रह्मास्त्र के प्रयोग ने महाभारत के युद्ध का अंत किया और आधुनिक युग में परमाणु बम ने द्वितीय विश्व युद्ध का. यह कहना तो मुश्किल है कि प्रचीन भारत परमाणु संपन्न समाज था पर इस संभावना से इंकार करना भी उतना ही मुश्किल है. गौरतलब है अणु या एटम की खोज महर्षि कणाद ने जॉन डाल्टन से करीब 2400 साल पहले किया था. आधुनिक युग में जॉन डाल्टन की एटम की खोज ही आगे चलकर एटम बम का आधार बनी. इतना ही नहीं मोहनजोदड़ो का सड़कों पर ऐसी लाशों का दबा मिलना जिनमें से निकलने वाली रेडियोधर्मी विकरण समान्य से 50 गुना अधिक है, यह संकेत देती है कि संभवत: इस धरती ने भी जापान के दो शहरों के भांति परमाणु हमले का दंश झेला है. यानी हजारों साल पहले यहां का समाज परमाणु शक्ति संपन्न था?…Next

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