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शायरी: पार्लियामेंट के डकैतों के नाम एक शाम (Shayari)

Posted On: 29 Aug, 2012 Others में

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jack

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“बिहड में बागी होते है डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में”

Shayari in Hindi

हिन्दी फिल्म का यह डायलॉग आज सौ अन्ना सच साबित हो रहा है. कोयला घोटाले की कालिख से कांग्रेस सरकार इतनी डर गई कि उनके मंत्री ने चुप रहने में ही भलाई समझी. यूं तो पार्लियामेंट सिर्फ डकैतों ही नहीं शायरों का भी गढ़ है. जवानी के दिनों में लड़कियों को छेडते-छेडते यह नेता शेरो-शायरी की सारी उस्तादी हमारी पार्लियामेंट में ही झाड़ते हैं.


इतना अंधेरा क्यूं है भाई
इतना अंधेरा क्यूं है भाई

Political Shayari in Hindi

अब आप रेल मंत्री त्रिवेदी जी या लालू जी को ही ले लीजिएं. शायरी की बात हो और लालू जी का जिक्र ना हो ऐसा हो सकता है भला! जवानी के दिनों में लालू जी ने राबड़ी जी के लिए इतनी शायरी की किताबे चाटी की उसका ज्ञान वह संसद में रेल बजट पेश करते हुए भी झाड़ते हैं. नहीं यकीन तो दो नजर मारिए एक शेर पर :


1. सब कह रहे हैं, हमने गज़ब काम किया है,
करोड़ों का मुनाफ़ा हर एक शाम दिया है.

2. उजड़ा चमन जो छोड़ गए थे हमारे दोस्त
अब बात कर रहे हैं वो फ़सले बहार की.



यह वाला तो लल्लन टॉप लालू स्पेशल बिहार का सुपरहिट शायरी :


कारीगरी का ऐसा तरीका बता दिया,
घाटे का जो ही दौर था, बीता बना दिया,
भारत की रेल विश्व में इस तरह की बुलंद,
हाथी को चुस्त कर दिया, चीता बना दिया।


हमें तो ऐसा लगता है लालू जी आपने हाथी को बेच चीता खरीद लिया था और चीते को हाथी का पाजमा पहना लगा दिया रेल के आगे और ऊपर से पकड़ा दिया उसे लालटेन लगे हाथ राजेडी का चुनाव-चिह्न का प्रचारो हो गया.


लालू जी की शैली को आगे बढ़ाया दिनेश त्रिवेदी जी ने जिन्होंने लालू से थोड़ा अपर क्लास के शेर मारे जैसे:


1. अब तक की कामयाबियां तुम्हारे नाम करता हूं। हर एक की लगन को सलाम करता हूं।


2. ‘देश की रगों में दौड़ती है रेल, देश के हर अंग को जोड़ती है रेल, धर्म जात पात नहीं मानती है रेल, छोटे-बड़े सभी को अपना मानती है रेल।


3. मंजिल अभी दूर है और रास्ता जटिल है, कंधा मिलाकर साथ चलें तो कुछ नहीं मुश्किल है।


संसद में शायरी का एक नया अध्याय जोड़ा देश के मौनी बाबा मनमोहन सिंह जी ने. इनकी शायरी सुन अगर आपके मुंह से वाह ना निकली तो जनाब आप गालिब और मिर्जा के शहर के बासिंदे नही. इन्होंने कोलगेट की कालिख से बचने से लिए चुप्पी नामक अस्त्र का प्रयोग किया और कुछ यूं बयां किया अपना दर्द:


हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी,

न जाने कितने सवालों की आबरू रखी।


चाहे आपकी चुप्पी ने किसी की आबरू रखी हो या ना रखी हो गुलजार, गालिब और मीर की इज्जत जरूर रख ली है.

(यह लेख मात्र व्यंग्य और हंसने का माध्यम भर है इसे किसी और अर्थ में ना लें. )


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