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क्या क्या हो रहा हैं .....

Posted On: 1 Aug, 2016 Others में

शब्द बहुत कुछ कह जाते हैं...कुछ हक़ीकत से रूबरू...कुछ मन की गुफ्तगू...

JITENDRA HANUMAN PRASAD AGARWAL

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अपने इर्द गिर्द मौजूद सभी समस्याओं और कुरीतियों को एक कविता की माला में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास…..कृपया पूरी रचना ज़रूर पढ़िए !

कहीं हादसे सड़कों पर, कही पानी सर के पार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही झटके भूकंप के, कही झगड़ों में नरसंहार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही मचती हैं भगदड, कही कोई भूख से लाचार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही हैं चलती गोलियाँ, कही कोई दुश्मन का शिकार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही झूलते फन्दो पर, कही आग में राख घर बार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही नशे की बेहोशी, कही बीमारियों का भंडार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही भयानक महामारी, कही जहर का संचार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कहीं धमाके आतंक के, कही मासूम का बलात्कार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही हैं गिरती बिजलियाँ, कही ग़रीबों का अत्याचार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही लड़ाई धर्म की, कही साबित निर्दोष गुनाहगार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही अपहरण बच्चो का, कहीं काया का कारोबार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही दंगे दौलत के, कही भाई का भाई पे खून सवार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही गिरती इमारते, कही जानवर कोई ख़ूँख़ार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही दहशत गुण्डों की, कही शेर किसानों पर साहूकार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही ख़टकती बेवफ़ाई, कही मर कर प्यार का इज़हार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही पर काम नही, कही पर अब रहना दुश्वार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही हवेलियाँ सुनसान, कही छोटा मकान शहर का कारागार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही अकेलापन मन का, कही मन में चिंताओं का गुब्बार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही इंसान बिल्कुल बेफ़िक्र, कही हद से ज़्यादा होशियार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही दहेज की दानवता, कही रिश्ता खून का दागदार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही कुरीति मृत्युभोज की, कही अंधी आस्था पर खर्च हज़ार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही शादियाँ करोड़ो की, कही कफ़न का पैसा भी उधार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

कही निकम्मे सियासी सूरमा, कही कोई वतन पर निसार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

“जीत” किस किस की लूँ खबर, पूरा देश ही जब बीमार हो रहा हैं !
रोज कहर कुदरत का थोक में मौत का व्यापार हो रहा हैं !

जितेंद्र अग्रवाल “जीत”
मुंबई..मो. 08080134259

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