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द्रौपदी का चीर हरण

Posted On: 24 Mar, 2014 Others में

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जग मोहन ठाकन द्वारा –वर्तमान रंग प्रसंग पर व्यंग्य
द्रौपदी का चीरहरण
निर्वस्त्र हो द्रोपदी , करे समुद्र तीरे स्नान ,
चीर हरण को कुछ नहीं , खुद दुर्योधन हैरान !
परन्तु दुर्योधन क्यों हैरान है ,यह सोचकर स्वयं द्रौपदी भी शर्मिंदगी से चेहरा छुपाये भयभीत और भविष्य में घटित होने जा रहे अनिष्ट के प्रति आशंकित है ! द्रौपदी को चिंता है ! दुर्योधन द्वारा चीर हरण के संकट के समय तो श्रीकृष्ण ने उसे बचा लिया था , परन्तु अब जब चीर हरण करने वाला कोई और नहीं बल्कि स्वयं पांडव हैं ,तो द्रौपदी किससे आस कर सकती है ! वो किसे पुकारे , किसकी तरफ आस लगाये ! यों तो बेचारी अकेली द्रौपदी का सदियों से पाँचों पांडव भाइयों द्वारा लगातार चीर हरण होता आ रहा है ! इस श्रेष्ठतम संस्कृति के संवाहक देश में , जहाँ नारी को पूजा योग्य माना जाता है , वहां माता कुंती के एक बिना विचारे दिए गए आदेश , “ पाँचों भाई मिलकर प्रयोग करो “ की कितने सटीक ढंग से अनुपालना होती आई है ! परन्तु अब द्रौपदी इस लिए शर्मिंदा है कि पहले जहां चीर हरण बंद दरवाजों में होता था , आज वो प्रजा के सामने खुले आम हो रहा है ! माँ कुंती तो आदेश देकर न जाने कहाँ विदेश चली गई ,परन्तु अब पांडव मिलकर उपयोग करने की बजाय अपना अपना एकल एवं पूर्ण स्वामित्व कायम करने को आतुर हैं ! मानव की यही कमजोरी है ,जो उसे ले बैठती है ! बेचारी द्रौपदी विकट समस्या में है कि वो किसके साथ जाये और कैसे ? द्रौपदी अन्दर विश्राम भवन में चिंतातुर है ! बाहर अर्जुन की आवाज़ आ रही है ! “ मुझे भ्राता श्रीकृष्ण ने हजारों वर्ष पूर्व गीता का उपदेश दिया था ! हे अर्जुन – सामने देखो , तुम्हारा न कोई भाई है , न पिता है , न बन्धु है ,न अपना न पराया ! सब जगह मेरा ही अस्त्र कार्य कर रहा है ! तुम तो निमित मात्र हो ! पर उस समय मैं समझ नहीं पाया था ! पर जब से मैं वाराणसी गया हूँ , मुझे सब समझ आ गया है !
“ खाके पान बनारस वाला , खुल गया बंद अक्ल का ताला “
द्रौपदी को स्वयंबर में मैंने जीता था , इस पर पहला और एक मात्र अधिकार मेरा है ! अब मेरा लक्ष्य मछली की आँख छेदना नहीं ,अपितु द्रौपदी पर सर्वाधिकार सुरक्षित करना है ! मैं किसी भी “ सूरत “ में पांडव भाइयों से द्रौपदी का सांझापन नहीं रखूँगा ! द्रौपदी मेरी है ,मेरी रहेगी !
“ चाहे रब रूठे या दाता ,मैंने तेरी बांह पकड़ ली “ !
गुनगुनाते –गुनगुनाते अर्जुन तीर हाथ में लिये जंगल की तरफ निकल पड़ा है !
तभी बूढा हो चुका , केश विहीन अर्ध चंद्रमाकार शीश पर कहीं कहीं दिख रहे बिखरे हुए चंद श्वेत बालों पर हाथ फेरते हुये , युधिष्टर का प्रवेश होता है !
“ मुझे तुमसे प्यार कितना , यह हम नहीं जानते ,
मगर रह नहीं सकते , तुम्हारे बिना ! “
पर द्रौपदी बूढ़े , हाथ पैर कांपते , युधिष्टर को चाल से ही पहचान जाती है ! मन में द्रौपदी भी नहीं चाहती कि वो बूढ़े खूंसट के खूंटे से बंधे ! पर क्या करे , आगे के परिणाम और घटनाक्रम को सोच कर भयभीत है ! तभी युधिष्टर पुनः बोल उठता है –
“ काहे को डरती है ,क्यों है विकल तूं ?
चल चल चल तूं , संग मेरे चल तूं !
गांधीनगर क्यों ? भोपाल चल तूं ,
बूढ़े इस रसिया को , इतना ना छल तूं !
चल चल चल तूं , संग मेरे चल तूं .! “
द्रौपदी की तरफ से कोई संकेत न मिलने पर बूढा युधिष्टर कोपभवन में जा बैठता है और द्रौपदी की बेवफाई पर बेचैन हो इधर उधर टहल कदमी करने लगता है !
तभी रेत से लथपथ जटाओं , हाथ में गदा थामे , चेहरे पर झुरियों के बाहुल्य वाला महाबली भीम , लम्बे लम्बे सांस लेते हुए द्रौपदी द्वारे आकर दरवाजा खटखटाता है !
“ हे द्रौपद रानी बोलो ,
जरा दरवाजा तो खोलो ,
चला आया हूँ अकेला बाड़मेर से ! “
पर अन्दर से फिर कोई प्रतिक्रिया नहीं ! द्रौपदी के इस दुत्कार व अनादर भरे संकेत से भीम आहत हो वापिस लौटते हुए कहता है –
“ तेरी दुनिया से दूर ,
चले होके मजबूर ,
हमें याद रखना ! “
लड़खड़ाते संभलते लौट रहे भीम भाई को दूर से देख कर नकुल सहदेव से अनुरोध करता है – “ भ्राता , भाई भीम का यों मुह मोड़कर जाना सहन नहीं होता ! द्रौपदी क्यों इतनी निष्ठुर हो गई है ! कहीं हमारे बड़े भाईओं की हठ धर्मिता हमसे परिवार के साथ साथ द्रौपदी भी न छिनवा दे ! माँ कुंती पहले ही अपने लिए सुरक्षित जगह ढूंढ़कर विदेश चली गई है ! मुझे

तो यह सब माँ की ही करतूत दिखती है ! हे सहोदर तुम ही कुछ करो ! मगर सहोदर सहदेव मात्र इतना कहता है – – हे नकुल तुम चिंता मत करो ! सब ठीक हो जायेगा !
“ रूठा है तो मना लेंगे ,
देकर खिलौना बहला लेंगे ,
फिर भी न माना तो ,
फिर भी न माना तो —– ! “
अन्दर द्रौपदी कभी द्वार की तरफ देखती है ,कभी छत की तरफ ! उसे चिंता सता रही है , कहीं एकल स्वामित्व के चक्कर में ये पांडव भाई सामूहिक स्वामित्व भी ना खो बैठें ! कहीं पांडवों की आपसी फूट का फायदा उठाकर कौरव उसका अपहरण ही न कर लें ! और ये पांडव हाथ मलते ही रह जाएँ ! लगता है कि अब तो खुद द्रौपदी को ही कुछ करना पड़ेगा ! वह दीवार पर टंगी तलवार की तरफ निहारने लगती है ! तभी बाहर प्रजा का शोर सुनाई देता है ! होली है , भई होली , रंग रंगीली होली है , अप्रैल की ठिठोली है ! आवाज़ धीरे धीरे मंद पड़ती जा रही है ! नींद द्रौपदी को अपने आगोश में कसती जा रही है !
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