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आंतरिक सुरक्षा को दरकिनार कर राजनीतिक लाभ लेने का निकृष्टतम प्रयास

Posted On: 17 Apr, 2010 Others में

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भारतीय राजनीति की इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि जहां एक ओर देश आतंरिक खतरे की पराकाष्ठा से जूझ रहा हो वहीं कई दल और उसके सिपहसालार अपने-अपने स्वार्थों को लेकर गलतबयानी किए जा रहे हैं. गृहमंत्री चिदम्बरम ने जब नक्सली आतंकियों को कुचलने की ठानी तो उन्हें इस कार्य में सहयोग प्रदान करने की बजाए उनके कार्य में बाधा डालने की पुरजोर कोशिश की जा रही है. यह एक प्रकार से देशवासियों को दिया जा रहा धोखा ही है. ऐसे में देश के नागरिकों को स्वयं ही फैसला करना होगा कि ऐसे दलों और उनके नेताओं को कैसे रास्ते पर लाया जाए. लेखक एवं वरिष्ठ स्तंभकार तरुण विजय ने इस आलेख में इससे संबंधित कुछ विशिष्ट मुद्दों पर प्रकाश डाला है.

 

जिस समय भारत की सुरक्षा और उसके सुरक्षा दस्तों पर आतंकवादियों की ओर से गहरा दबाव बढ़ रहा है, उस समय भारत के शासक एक दूसरे पर छींटाकशी करते दिख रहे हैं। गृहमंत्री चिदंबरम की माओवादियों के प्रति कठोर नीति का पक्ष-विपक्ष सभी ने स्वागत किया और उनके त्यागपत्र की माग भाजपा तक ने खारिज कर दी। लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह ने एक अंग्रेजी पत्र में उनकी ऐसी आलोचना की है, जिससे निश्चय ही न केवल गृहमंत्री मर्माहत हुए होंगे, बल्कि सुरक्षा बलों के जाबाज सैनिकों को भी भ्रमित करनेवाला संदेश गया कि यह सरकार आतंक के विरुद्ध एकमत नहीं है।

 

उससे भी बड़ा आश्चर्य है 10 जनपथ के वंशवादी शासक का मौन। सोनिया गाधी और राहुल गरीबों, दलितों, मनरेगा जैसी योजनाओं पर ही नहीं, चीन से संबंधों के संदर्भ में अपनी यात्राओं पर भी बोलने से चूकते नहीं। लेकिन 76 सुरक्षाकर्मियों की दर्दनाक शहादत पर दोनों का सन्नाटा ओढ़े रहना और माओवादी आतंकवादियों के खिलाफ एक शब्द भी न कहना आश्चर्यजनक है। उसी संदर्भ में दिग्विजय सिंह का बयान देखा जाना चाहिए जो पहले ही आजमगढ़ में आतंकवाद के आरोपियों के घर ‘तीर्थयात्रा’ का ‘राजनीतिक पुण्य’ बटोर आए हैं। ये वही राजनेता हैं जिन्हें 10 जनपथ का करीबी माना जाता है। इन्होंने ही पहले जामिया-बाटला हाउस कांड में आतंक के आरोपियों को मल्हम लगाया और फिर आजमगढ़ की बेरौनकी और देशभक्तों को आहत करनेवाली यात्रा की थी। अब उन्होंने एक लेख लिखकर अपनी ही सरकार के काग्रेसी मंत्री पर उस समय सार्वजनिक चोट की है, जब वह आतंकवादियों के विरुद्ध एक साझा राष्ट्रीय सर्वानुमति बनाने में कामयाब हो रहे थे और सुरक्षाकर्मियों के दुख में शामिल हुए थे।

 

क्या ऐसा कोई भी काग्रेसी नेता बिना उच्चस्तरीय आशीर्वाद, समर्थन और ‘निर्भय रहो’ के आश्वासन के बिना कर सकता है? क्या अपनी ही सरकार द्वारा राष्ट्रघाती आतंकवादियों के विरुद्ध चलाई जा रही मुहिम की आलोचना में कोई शासक दल का वरिष्ठ नेता अपनी मनमर्जी से निजी मत को अखबार में एक लेख के रूप में छपवा सकता है? जो लोग काग्रेस के वंशवादी चरित्र और उस पर दस जनपथ की गहरी पकड़ से परिचित हैं, वे यह विश्वास भी नहीं कर सकते कि दिग्विजय सिंह ने चिदंबरम को इस नाजुक मौके पर समर्थन के बजाय उन पर निशाना साधने का निर्णय बिना उस खानदानी सुप्रीमो की सहमति के लिया होगा जो अब तक नक्सली हिंसा तथा सुरक्षाकर्मियों की शहादत पर चुप्पी ओढ़े हुए हैं।

 

यह भारतीय राजनीति की विडंबना है। यहा किसी की शादी या आईपीएल के मुद्दे पर किसी के व्यक्तिगत जीवन में ताकाझाकी पहले पन्ने पर रहती है। यहा के नेता अखबारी सुर्खियों के मोहताज बनकर गाजा में फिलीस्तीनियों के दुख-दर्द पर ग्लिसरीन के आंसू बहाने पहुंच जाते हैं, लेकिन चीन और पाकिस्तान के बाहरी खतरों तथा नक्सली और जिहादियों से भीतरी तौर पर लहूलुहान देश के बारे में उनकी चिंताएं मजहबी सांप्रदायिकता एवं वोट बैंक लोकप्रियता के कारण प्राय: लुप्त रहती हैं। ऐसे नेता अकसर सुरक्षाकर्मियों का उपहास उड़ाते हुए आतंकवादियों का मनोबल बढ़ाते दिखते हैं।

 

राजमोहन गाधी, अरुंधती राय और दिग्विजय सिंह में क्या फर्क है? गाधीजी के पौत्र को जम्मू जाकर कश्मीरी हिंदुओं के दुख से परिचित होने का मौका नहीं मिला। वे 76 शहीद सैनिकों की माताओं से मिलने का रास्ता भी नहीं ढूंढ़ पाए, लेकिन फिलीस्तीन पहुंचकर इजराइल के खिलाफ बयान देना उन्हें सुविधाजनक लगा। अरुंधती राय अपने देश की जमीन, जन और जुबान की पक्षधर नहीं हुई तो दिग्विजय सिंह घावों पर नमक छिड़ककर किसी राजनीतिक निहितार्थ को पूरा करते दिख रहे हैं। उत्तर प्रदेश की वोट राजनीति उनके कार्यक्रम निर्धारित कर रही है। इस प्रकार का राजनीतिक दौर्बल्य जहा सुरक्षाकर्मियों का मनोबल गिराने वाला साबित हो रहा है, वहीं विदेश में इच्छाशक्ति रहित प्रधानमंत्री ओबामा तथा हिलेरी क्लिंटन से प्रवचन सुनकर खाली हाथ वापस लौट आए। अमेरिका अपने और केवल अपने सामरिक हितों के लिए भारत का उपयोग करना चाहता है और उसने पाकिस्तान जैसे आतंकवाद-प्रोत्साहक एवं भारत विरोधी देश को भारत के समकक्ष रखकर भारत का अपमान किया है।

 

दुख है कि भारत सरकार मीडिया को भ्रामक कोण से खबर देकर जनता को गुमराह करती है। जैसे कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान से कहा है कि वह भारत विरोधी आतंकवाद के नियंत्रण में भारत के साथ सहयोग करे। जबकि व्हाइट हाउस द्वारा ओबामा-गिलानी वार्ता के जो अंश अधिकृत तौर पर जारी किए गए, उनमें कहीं भी इस विषय का जिक्र तक नहीं है।

 

यह सरकार धुरी से हटी, थकी हुई प्रतीत होती है जो अनमने ढंग से चल रही है। कहीं भी दृढ़ता, दिशा और गति का अहसास तक नहीं दिखता। चिदंबरम के अहंकार के बारे में दो मत हो सकते हैं, पर चिदंबरम के युद्ध को कमजोर करने वाले क्या कहे जाएंगे? इन नेताओं को अपने मूर्तिपूजन, माल्यार्पण या राष्ट्रघातियों तक के वोट लेने के अलावा आम जनता के दुख-दर्द की चिंता नहीं है। महंगाई से सामान्यजन त्राहि-त्राहि कर रहा है। आम जरूरतों की हर चीज निम्न आय वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के दायरे से बाहर हो गई। ऐसी स्थिति में जनता के भीतर पनप रहा आक्रोश कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में तो इस राजनीतिक पाखंड के विरुद्ध फूटना चाहिए।

Source: Jagran Yahoo

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