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ईसाई मतांतरण का सच

Posted On: 1 Feb, 2011 Others में

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हाल के दिनों की दो घटनाओं से चर्च द्वारा किए जाने वाले मतांतरण के पीछे छिपा वीभत्स सत्य एक बार फिर रेखांकित हुआ है। उसके साथ-साथ तथाकथित सेकुलर मीडिया ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को जनता के सामने जिस तरह अतिरंजित कर पेश करता है उसका भी खुलासा हुआ है। सन् 2008 में कर्नाटक के कुछ गिरजाघरों में तोड़फोड़ की घटनाएं हुई थीं। सेकुलरिस्ट दलों और मीडिया ने इन घटनाओं के लिए संघ परिवार और भाजपा की नवनिर्वाचित प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया था। न्यायाधीश सोमशेखर की अध्यक्षता में गठित न्यायिक आयोग ने जांच में पाया कि इन घटनाओं के पीछे संघ या सरकार का कोई हाथ नहीं है। सरकार को सौंपी रिपोर्ट में बताया गया है कि ये घटनाएं इसलिए घटीं, क्योंकि ईसाई मत के कुछ संप्रदायों ने हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ में अपमानजनक साहित्य वितरण किया था। भड़काऊ साहित्य का मकसद हिंदुओं में अपने धर्म के प्रति विरक्ति पैदा करना था। इस जांच ने यह भी स्थापित किया कि इस भड़काने वाली हिंदू विरोधी गतिविधि में कैथोलिक चर्च का कोई हाथ नहीं था।


चर्च की कार्यप्रणाली पर पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने भी चिंता प्रकट की है। सर्वोच्च न्यायालय ने आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो पुत्रों को जिंदा जलाने के मामले की सुनवाई करते हुए ईसाई मतप्रचार को लेकर जो बेबाक टिप्पणी की थी उसे ईसाई मतावलंबियों की भावनाओं का स्वत: संज्ञान लेते हुए वापस ले लिया है, किंतु संशोधित फैसले से भी चर्च के मतप्रचार और कार्यशैली पर चिंता स्पष्ट झलकती है।


अपने पहले के फैसले में विज्ञ न्यायाधीश पी सदाशिवम और बलबीर सिह चौहान की खंडपीठ ने कहा था,”गरीब आदिवासियों का मतांतरण कराने वाले ग्राहम स्टेंस को सबक सिखाने केलिए जला दिया गया था। किसी के धार्मिक विश्वास के साथ किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करना गलत है। किसी के साथ जबर्दस्ती करके अथवा बरगलाकर उसका धर्म परिवर्तन करने को सही नहीं ठहराया जा सकता।” न्यायाधीशों ने महात्मा गांधी और पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा था कि भारत की एकता ‘सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति आदर सम्मान’ के सिद्धांत पर आधारित है।


न्यायालय की टिप्पणी पर मिशनरियों ने कड़ी आपत्ति व्यक्त की थी, किंतु यह स्थापित सत्य है कि विदेशी धन के बूते चर्च दलितों-वंचितों व आदिवासियों के बीच छलफरेब से ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। इस अनुचित कार्यशैली पर जब भी प्रश्न खड़ा किया जाता है, चर्च और उसके समर्थक सेकुलरिस्ट उपासना की स्वतंत्रता का शोर मचाने लगते हैं। किसी भी सभ्य समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रोजी-रोटी कमाने के अधिकार के नाम पर वेश्यावृत्ति की छूट नहीं दी जा सकती। उसी तरह उपासना के अधिकार के नाम पर लालच और धोखे से किसी के मजहब परिवर्तन की भी इजाजत नहीं होनी चाहिए। यदि देह का व्यापार अनैतिक है तो आत्मा का व्यापार तो और भी घृणित और निंदनीय है।


सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा था वह मिशनरी मतप्रचार को लेकर महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों के अनुरूप ही था। बाल्यावस्था में ही गांधीजी ने स्कूलों के बाहर मिशनरियों को हिंदू देवी-देवताओं के लिए गालियां देते सुना था। बहुत अध्ययन के बाद उन्होंने चर्च के मतप्रचार पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा था,”यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों और गरीबों की सेवा करने के बजाय डॉक्टरी सहायता, शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करेंगे तो मैं उन्हें निश्चय ही चले जाने को कहूंगा। प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य किसी राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। निश्चय ही भारत का धर्म यहां के लोगों के लिए पर्याप्त है। हमें धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है।”


मई, 1935 में एक मिशनरी नर्स ने गांधीजी से पूछा था कि क्या आप मतांतरण के लिए मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगा देना चाहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ”अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा खेल ही बंद करा दूं। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिंदू परिवारों में, जहा मिशनरी पैठे हैं, वेशभूषा, रीतिरिवाज और खानपान तक में अंतर आ गया है।” मिशनरी मत प्रचार के सदर्भ में डॉ. अंबेडकर ने कहा था, ”यह एक भयानक सत्य है कि ईसाई बनने से अराष्ट्रीय होते हैं। साथ ही यह भी तथ्य है कि ईसाइयत, मतांतरण के बाद भी जातिवाद नहीं मिटा सकती।” स्वामी विवेकानद ने इससे बहुत पहले ही मतातरण के दुष्परिणामों की चेतावनी देते हुए कहा था, ”जब हिंदू समाज का एक सदस्य मतांतरण करता है तो समाज की एक संख्या कम नहीं होती, बल्कि हिंदू समाज का एक शत्रु बढ़ जाता है।” मध्य प्रदेश में मिशनरी गतिविधियों की शिकायतों को देखते हुए इन आरोपों की जाच के लिए 14 अप्रैल, 1955 को तत्कालीन काग्रेस सरकार ने पूर्व न्यायाधीष डॉ. भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने जांच के लिए 14 जिलों के सैकड़ों स्थानों पर जाकर लोगों से पूछताछ की और उनके बयान लिए थे। 77 ईसाई केंद्रों का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया गया।


जांच-पड़ताल में अपने विरुद्ध प्रमाण जाते देख जांच में सहयोग न करके चर्च ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर समिति की कार्यवाही रोकने का प्रयास किया। चर्च की अपील न्यायालय ने खारिज कर दी थी। अंतत: 1956 में 1500 पृष्ठों की रिपोर्ट समिति ने जारी की। समिति की प्रमुख सस्तुतिया मतातरण के उद्देश्य से आए विदेशी मिशनरियों को बाहर निकालना और उन पर पाबदी लगाने की थी। समिति ने यह भी संस्तुति की थी कि भारतीय ईसाई विदेशी आश्रय छोड़कर स्वतत्र सयुक्त भारतीय चर्च की स्थापना करें। बल प्रयोग, लालच, धोखाधड़ी, अनुचित श्रद्धा, अनुभवहीनता, मानसिक दुर्बलता का उपयोग मतातरण के लिए नहीं हो। देश के अन्य भागों में गठित समितियों ने भी नियोगी आयोग की सस्तुतियों को उचित ठहराया है। इसलिए अदालत की हाल की टिप्पणी पर चर्च और सेकुलरिस्टों का स्यापा एक स्थापित सच को नकारने से ज्यादा कुछ नहीं है। बहुलतावादी सनातनी संस्कृति से प्रेरित भारत में ईसाइयों समेत सभी मतावलबियों को अपने मजहब के प्रचार-प्रसार की छूट है। क्या चर्च अपनी संकीर्णताओं से उबर कर हिंदुत्व के बहुदेववाद के सत्य को भी स्वीकार करेगा? क्या छलकपट और फरेब के बल पर मत परिर्वतन की अनुमति देकर कोई समाज अपनेआप को नैतिक और सभ्य कहला सकता है?


[बलबीर पुंज: लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

Source: Jagran Nazariya

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