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उच्च शैक्षणिक क्षेत्र में विदेशी संस्थानों की एंट्री

Posted On: 25 Mar, 2010 Others में

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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए केन्द्र सरकार ने विदेशी शैक्षिक संस्थान (प्रवेश, नियमन एवं संचालन) विधेयक-2010 को संसद में पारित करवाने के लिए कमर कस लिया है. सरकार का मानना है कि इससे देश में उच्च शिक्षा की स्थिति में बेहतरी होगी और शिक्षा गुणवत्ता के स्तर में देश, विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थाओं से प्रतिस्पर्धी रूप से उन्नत साबित होगा.

 

चार वर्षों से लंबित विदेशी शैक्षिक संस्थान (प्रवेश, नियमन एवं संचालन) विधेयक-2010 को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. संसद के मौजूदा सत्र में अब इस विधेयक के पास होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं. इसके पश्चात अब विदेशी संस्थान भारत में अपना कैंपस खोलने के साथ-साथ डिग्री भी दे सकेंगे. बिल में प्रावधान के तहत किसी विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान को देश में कैंपस खोलने की मंजूरी मिलने के बाद आठ माह में अपने विस्तृत कार्यक्रम के अंतर्गत शुल्क, प्रवेश, पाठ्यक्रम तथा पढ़ाई के घंटों इत्यादि का खुलासा करना होगा. इन संस्थानों को यूजीसी अथवा अन्य समकक्ष निकाय में पंजीकृत कराते हुए 50 करोड़ रुपए संचित राशि के रूप में जमा कराने होंगे. लाभ से प्राप्त रकम को भी ये संस्थान देश से बाहर नहीं ले जा सकेंगे. साथ ही इन संस्थानों में कोई आरक्षण नहीं रहेगा.

 

उल्लेखनीय है कि चार वर्ष पूर्व जबसे विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत में आने का विचार सतह पर आया है, तबसे न्यूयार्क, हार्वर्ड, येले, कैलोग, कोलंबिया, इंपीरियल, ड्यूक तथा आक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालय यहां अपना कैंपस खोलने को लालायित हैं. सरकार का दावा है कि इस विधेयक के पास होने के बाद मौजूदा उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रतिस्पर्धा ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार भी आएगा. सरकार का दूसरा तर्क यह है कि 2.25 अरब डालर की जो मुद्रा ट्यूशन एवं अन्य खर्च के रूप में देश से बाहर चली जाती है, उसे यहां रोकने में भी मदद मिलेगी. भारत सरकार को अब यह बात समझ में आने लगी है कि विश्व अर्थव्यवस्था में देश को शीर्ष पर पहुंचाने के लिए विश्व स्तरीय उच्च शिक्षा तंत्र खड़ा करना होगा. इसी का परिणाम है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नीति निर्धारकों ने अपने स्वदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के ढांचे की समृद्धता व गुणवत्ता में वृद्धि करने के बजाय बड़े तार्किक ढंग से विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में आने की राह सुलभ बनाने की तैयारियां पूरी कर ली हैं.

 

‘दि टाइम्स’ ने 2006 में विश्व के श्रेष्ठतम 200 संस्थानों की सूची प्रकाशित की थी. उनमें भारत के मात्र तीन उच्च शिक्षण संस्थानों को स्थान मिला था. उसमें आईआईटी को 57वा, आईआईएम को 68वा तथा जेएनयू को 183वा स्थान मिला था. वर्ष 2007 की सूची में किसी भी भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान का नाम शामिल नहीं किया गया. इसका सीधा-सा अर्थ यह हुआ कि विदेशी विश्वविद्यालय अपने शैक्षिक बाजार व विषयवस्तु की ब्रांडिंग हमसे कहीं बेहतर ढंग से कर रहे हैं.

 

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठ कहे जाने वाले आईआईटी, आईआईएम व एम्स जैसे संस्थान अनुभवी फैकल्टी से रिक्त हैं तथा लो वेजेज के सिंड्रोम से जूझ रहे हैं.
पाश्चात्य देशों में चार हजार से लेकर सात हजार डालर तक मासिक वेतन मिलता है. भारत और चीन में यह मासिक वेतन मात्र 1500 अमेरिकी डालर के आस-पास है. इसका दुष्प्रभाव यह दिखाई पड़ता है कि भविष्य में सरकार द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों के साथ में निजी विश्वविद्यालय भी उच्च शिक्षित व अनुभवी प्राध्यापकों से वंचित हो सकते हैं. भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों का विकास पिरामिड की तरह सोपानिक क्रम में हुआ. इसके शिखर पर आईआईटी व आईआईएम के साथ में एम्स तथा एनआईटी जैसे संस्थान विकसित हुए, जिनमें आज लगभग एक लाख छात्र अध्ययनरत हैं. इस पिरामिड के मध्य में डीम्ड विश्वविद्यालय हैं. इनमें से कुछ को छोड़कर शेष की हालत किसी से छिपी नहीं है.

 

मानव संसाधन विकास मंत्री विदेशी विश्वविद्यालयों से जुड़े इस विधेयक को मील का पत्थर बताकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दूरसंचार से भी बड़ी जिस क्रांति की संकल्पना कर रहे हैं, निश्चित ही उसमें अभी संदेह है. सरकार जिस प्रकार निजी व विदेशी विश्वविद्यालयों को इस क्षेत्र में पनपने का मौका प्रदान कर रही है, उसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि वह सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों के लचर हालातों से पूर्णत: अवगत है. स्पष्ट है कि विदेशी शिक्षण संस्थानों का ढांचा, स्वभाव, मूल पाठ्यक्रम व शोध कार्य भारत की समस्याओं और आवश्यकताओं को दरकिनार करते हुए विदेशों के कारोबारी हित को ध्यान में रखते हुए ही तैयार किया जाएगा.

 

उच्च शिक्षा से जुड़े उन मुद्दों पर पार्टी और राजनीति की सीमाओं से बाहर आकर संसद के साथ में भारत के नागरिक समाज को भी इस बहस में भागीदार होना चाहिए. तभी स्वदेशी और विदेशी उच्च शिक्षा के मध्य पनपने वाले सोपानक्रम, व्यावसायिकता और आंतरिक रूप से होने वाली एक वर्गीय गुणवत्ता के संघर्ष को रोका जा सकता है.

Source: Jagran Yahoo

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