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कहां हैं बदलाव चाहने वाले

Posted On: 9 Feb, 2010 Others में

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एक क्षण के लिए कल्पना करें कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय सोनिया गांधी के बजाय कांग्रेस के नेताओं और संप्रग के घटकों ने लिया होता-कुछ वैसे ही जैसे नरसिंह राव के बारे में लिया गया था। यदि ऐसा होता तो शायद क्या, निश्चित तौर पर देश में इस तरह की आवाज उठ रही होती-मनमोहन हटाओ, देश बचाओ। यह आवाज विरोधी दल ही नहीं, संभवत: कांग्रेस के सहयोगी दल भी उठा रहे होते और इस पर भी आश्चर्य नहीं कि खुद कांग्रेसी नेता भी खुले-छिपे ढंग से ऐसी मुहिम छेड़े होते कि नेतृत्व परिवर्तन होना चाहिए। कुछ नेता गांधी परिवार के सदस्य को सत्ता की बागडोर संभालने की मांग कर रहे होते तो कुछ किसी बड़े कांग्रेसी नेता को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रहे होते। इस पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा होता? पिछले नौ माह के मनमोहन सरकार के क्रिया-कलाप यदि कुछ कह रहे हैं तो यही कि संप्रग सरकार अपने दूसरा कार्यकाल में नितांत असफल है। महंगाई रोकने के नाम पर जैसी तमाशेबाजी हो रही है और पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए जो कुछ किया जा रहा है या फिर पद्म सम्मान की जैसी छीछालेदर हो रही है उससे कोई भी इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि इस सरकार को खुद ही नहीं पता कि वह क्या कर रही है? गृहमंत्री चिदंबरम को छोड़ दिया जाए तो अन्य केंद्रीय मंत्री ‘समय बिताने के लिए करना है कुछ काम’ वाली शैली में काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार हर समस्या का समाधान किसी न किसी समिति को सौंपकर यह मान ले रही है कि उसकी जिम्मेदारी पूरी हो गई। यदि सब कुछ समितियों को ही करना है तो फिर सरकार किस मर्ज की दवा है? इस पर गौर करना चाहिए कि संप्रग सरकार को समितियां कितनी प्रिय हैं? कुछ समितियां तो इसलिए गठित करनी पड़ीं है, क्योंकि खुद सरकार ने ही समस्या खड़ी की। उदाहरणस्वरूप पहले तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की हामी भरी गई और जब लगा कि ऐसा करने से समस्या खड़ी हो गई है तो एक समिति बना दी गई।

कुछ समितियां महज इसलिए बनाई जा रही हैं ताकि जनता को यह संदेश दिया जा सके कि सरकार कुछ तो कर रही है। महंगाई रोकने के लिए मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों की समिति इसका ताजा उदाहरण है। यह समिति इसलिए बनानी पड़ी, क्योंकि मनमोहन सरकार कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार की निष्क्रियता के खिलाफ कुछ करने की स्थिति में नहीं। नि:संदेह महंगाई केवल भारत में ही नहीं बढ़ी है, लेकिन कम से कम अन्य देशों में उसे काबू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति तो दिखाई गई है। भारत सरकार तो शायद जानती ही नहीं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति किस चिडि़या का नाम है, क्योंकि जो काम खुद उसे करने हैं उनके लिए औरों को उपदेश दिए जाते हैं। शायद खुद केंद्र सरकार को यह नहीं पता होगा कि वह मुख्यमंत्रियों और नौकरशाहों के कितने सम्मेलन आयोजित कर चुकी है? इन सम्मेलनों में या तो उपदेश दिए जाते हैं या फिर केंद्र-राज्य एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं? दिल्ली में आए दिन होने वाले किस्म-किस्म के सम्मेलन समय और धन की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं। जो काम करना जानते हैं और उसे करना भी चाहते हैं वे बातें नहीं करते। यह सरकार तो जरूरत से ज्यादा बातें कर रही है। पिछले दिनों राज्यों के मुख्य सचिवों को दिल्ली बुलाकर प्रधानमंत्री ने उनसे कहा कि सरकारी भ्रष्टाचार से आम जनता आजिज आ गई है और शासन करना जटिल हो गया है, लेकिन किसी ने उनसे सवाल नहीं किया कि वह प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों पर अमल करने से क्यों बच रहे हैं?

नि:संदेह प्रधानमंत्री की छवि एक विनम्र और ईमानदार प्रशासक की है, लेकिन देश इस छवि का क्या करे? जब खुद गृह मंत्रालय यह कह रहा है कि करोड़ों के गोलमाल के आरोपों से ‘मुक्त’ संतसिंह चटवाल को पद्म सम्मान प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल पर मिला तब सवाल तो उठेंगे ही? देश जानना चाहेगा कि क्या गंभीर आरोपों से मुक्त होना कोई उपलब्धि है? हाल में जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन अपने इस पद से मुक्त हुए तो खुद प्रधानमंत्री ने उनकी तारीफ में कसीदे काढ़े। यदि ऐसा ही था तो उन्हें इस पद से हटाया क्यों गया? इस पर भी गौर करें कि उनके स्थान पर जिन शिवशंकर मेनन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया गया है वह वही हैं जिन पर शर्म-अल-शेख में भारत को शर्मिदा करने वाला ड्राफ्ट तैयार करने का आरोप है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद पर मेनन की ताजपोशी और एमके नारायणन के पश्चिम बंगाल के राजभवन में सुशोभित होने से इस आरोप की पुष्टि हो जाती है कि संप्रग सरकार से जुड़ा कोई भी उच्च पदस्थ व्यक्ति सेवानिवृत्त नहीं होने दिया जा रहा है। यहां तक कि महा नाकारा साबित हुए शिवराज पाटिल को भी राज्यपाल बना दिया गया। एक अनुमान के अनुसार तीन दर्जन से अधिक नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद फिर से किसी न किसी महत्वपूर्ण पद पर जा बिराजे हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या उनकी है जो संप्रग शासन के पहले कार्यकाल में रिटायर हुए थे। आखिर ऐसे लोगों को इसका अहसास क्यों होगा कि देश में महंगाई, असुरक्षा और गरीबी जैसी समस्याएं हैं? कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ढेर सारी समितियां, अधिकरण, प्राधिकरण आदि इसीलिए हैं कि चहेते नेताओं और नौकरशाहों को रिटायर न होने दिया जाए। माना कि विपक्ष बुरी तरह बिखरा और जनता की नजरों से उतरा हुआ है, लेकिन क्या इसका यह मतलब है कि केंद्र सरकार कोई काम ही न करे? अभी तो संप्रग शासन का एक वर्ष भी नहीं हुआ। यदि अगले चार साल तक केंद्रीय शासन इसी तरह चला तो देश को बेड़ा गर्क तय समझिए। बेहतर होगा कि नेतृत्व परिवर्तन के आकंाक्षी अपनी आवाज उठाएं, क्योंकि अब बेहतर विकल्प भी है और उनमें से सबसे बेहतर चिदंबरम हैं।

[राजीव सचान: लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं]

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