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परदा जरूरी! कॉरपोरेट तालिबान उभर रहा है

Posted On: 6 Jun, 2010 Others में

संपादकीय ब्लॉगजन-जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे, राष्ट्र की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाले विचार, संवेदना की धरातल पर विमर्श की गुंजाइश को जनम देता ब्लॉग

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hot-colleagueकोई सीनियर कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिव महिला क्या करे जब उस पर यह आरोप लगे कि उसके आकर्षक दिखने के कारण उसके अन्य साथी इम्प्लाई ध्यान भटका लेते है और ऑफिस का काम प्रभावित हो रहा है.

 

है ना एक तालिबानी रवैय्या? इस हैरतंगेज कारनामे को अंजाम दिया है सिटी बैंक ने अपने एक प्रतिबद्ध महिला कर्मचारी को छुट्टी देके और वह भी अमेरिका जैसे आजाद ख्यालात वाले देश में. सिटी बैक ने डेब्राहली लोरनजाना को यह सजा दी है जिसके खिलाफ उन्होंने न्यायालय में अपील किया है.

 

सभी लोगों को इस पर विचार करना चाहिए कि यदि कोई महिला अपने मनपसंद कपड़े पहनना चाहती हो तो क्या उसे इतना भी अधिकार नहीं. क्या मौलिक आजादी जैसी कोई बात सिर्फ संविधान में लिखी हुई इबारत है जिसे ढक कर रख दिया गया है. यदि अमेरिका में यह घटना हो रही है तो फिर भारत और अन्य एशियाई देशों की क्या हालत होगी आप खुद ही सोच सकते हैं.

 

यहाँ कुछ सवाल हैं जो मन को मथते हैं.

 

१. आजादी के वास्तविक मायने क्या हैं?
२. व्यक्ति सर्वोपरि है या व्यवस्था?
३. क्या हैं मौलिक अधिकार और क्या इन मौलिक अधिकारों व मानवाधिकारों में कोई अंतरविरोध है?
४. महिलाओं को किस सीमा तक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए?
५. और आखिर में, हम कौन होते हैं महिला के जीने के मापदण्ड तय करने वाले?

 

आप सभी इन प्रश्नों के समाधान तलाशने की कोशिश करें और अपने विचारों से दुनिया को अवगत कराएं.

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