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बिल्कुल औरों की तरह भाजपा

Posted On: 8 Aug, 2013 Others में

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rajiv sachanअब यह सारे देश को पता है कि केंद्र सरकार के सहयोग, समर्थन और अगुआई में सभी दल राजनीति के अपराधीकरण को रोकने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अस्वीकार कर रहे हैं। इसी के साथ सूचना आयोग के उस निर्णय को भी खारिज करने के लिए कानून में बदलाव करने की ठान ली गई है कि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून के दायरे में आएंगे। इन दोनों ही मामलों में सरकार को सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है। अभी तक केवल राष्ट्रीय जनता दल के रघुवंश प्रसाद और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने यह कहा है कि राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार के दायरे में आना चाहिए। इसके आसार कम हैं कि अन्य राजनेता रघुवंश प्रसाद और डेरेक ओ ब्रायन के सुर में सुर मिलाएंगे। अगर ऐसा होता भी है तो सूरत बदलने के आसार नहीं हैं, क्योंकि इन दोनों मामलों में सभी दल एकजुट हैं, सिवाय नवजात आम आदमी पार्टी के। सबसे हैरत की बात यह है कि राजनीतिक शुचिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं की बात करने और खुद को केंद्र की सत्ता का प्रबल दावेदार बताने वाली भाजपा भी इस पक्ष में है कि आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों को चुनाव लड़ने का मौका मिलना चाहिए और राजनीतिक दलों को यह छिपाने की छूट मिलनी चाहिए कि वे कहां से कितना चंदा लेते हैं और उसे कैसे खर्च करते हैं?

अवसरवादी राजनीति


भाजपा और अन्य दलों में फर्क करने वाली विभाजन रेखा पहले ही धुंधली हो चुकी थी। अब उसे खुद भाजपा नेतृत्व ही मिटा रहा है। शायद खुद को औरों से अलग बताने वाली भाजपा अब बिलकुल औरों की तरह बनने के लिए तैयार है। विडंबना यह है कि इसके खिलाफ भाजपा के अंदर से कहीं कोई आवाज नहीं उठ रही है। क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा के छोटे-बड़े नेता सुप्रीम कोर्ट और सूचना आयोग के फैसले को उतना ही खराब समझ रहे हैं जितना उसका नेतृत्व? आखिर अब कांग्रेस और भाजपा में अंतर कैसे किया जा सकता है?

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दागदार नेताओं के समर्थन और जनता से सामान्य सूचनाएं साझा करने से इन्कार का सीधा मतलब है अनैतिकता और भ्रष्टाचार को संरक्षण देना। अगर भाजपा को यही काम करना है तो फिर उसे सत्ता में आने का मौका क्यों देना चाहिए? दागी नेताओं की तरफदारी और सूचना आयोग के फैसले को खराब बताने के मामले में कांग्रेस और भाजपा के तर्को में अद्भुत समानता दिख रही है। दोनों यह थोथा तर्क दे रही हैं कि सवाल संसद की सर्वोच्चता का है। क्या अब संसद की सर्वोच्चता तभी स्थापित हो पाएगी जब वह आपराधिक इतिहास और चरित्र वाले नेताओं को चुनाव लड़ने का मौका देगी? क्या इससे संसद की गरिमा बढ़ेगी कि वहां एक ऐसा कानून बने जो शेष देश और मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में भेद करता हो? क्या राजनीतिक दल किसी ईश्वरीय व्यवस्था की देन हैं? यदि नहीं तो वे अपने लिए वैसे ही नियम क्यों नहीं चाहते जैसे आम जनता के लिए चाहते हैं? संसद में जिस दिन भी सूचना आयोग के फैसले को निष्प्रभावी किया जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एकजुटता दिखाई जाएगी उस दिन वहां आम जनता के भरोसे का खून होगा। आम जनता के लिए यह स्वीकार करना अकल्पनीय होगा कि संसद में ऐसा भी हो सकता है।


राजनीतिक दल बिल्कुल सामंतों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। उनके व्यवहार से यही साबित होता है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें कितनी खोखली हैं और उनके समक्ष संसद कितनी असहाय-निरुपाय है। आखिर हमारे राजनेता इन दो फैसलों पर पानी फेर कर किस मुंह से संसद को महान और पवित्र बताएंगे? वे संसद का घोर दुरुपयोग कर अपने साथ-साथ उसकी मान-मर्यादा से भी खिलवाड़ करने जा रहे हैं। अब यह कहना मजाक का विषय होगा कि संसद जन आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वोच्च संस्था है, क्योंकि वहां तो ठीक इसके उलट काम होने जा रहा है। संसद राजनीतिक दलों के हाथों बंधक बनने वाली है। जो भी संसद की गरिमा बनाए रखना चाहते हैं उसे इस अनर्थ को रोकना होगा। इसलिए और भी, क्योंकि उसकी गरिमा पहले से खतरे में है। यह वायदा संसद का ही था कि लोकपाल विधेयक पारित किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस वायदा खिलाफी की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की हैं, न कि संसद की। राजनीतिक दलों के बगैर संसद ईंट-गारे से बनी भव्य इमारत के अलावा और कुछ नहीं। राजनीतिक दलों का सामूहिक विधायी आचरण ही संसद है। वे जैसा आचरण करेंगे, संसद की छवि वैसी ही बनेगी। भाजपा चाहे तो अपनी और साथ ही संसद की छवि बचा सकती है। अगर भाजपा नेता सुप्रीम कोर्ट और सूचना आयोग के फैसले पर अपना रवैया नहीं बदलते तो इसका मतलब है कि देश ने उससे जो उम्मीदें लगा रखी हैं वे व्यर्थ हैं।


ऐसे दल के सत्ता में आने का कोई मतलब नहीं जो अपराधियों को चुनाव लड़ने देने की पैरवी करे अथवा यह छिपाए कि वह किन तौर-तरीकों से संचालित होता है? किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि भ्रष्ट तत्वों को क्लीनचिट देने वाले मनमोहन सिंह और उन्हें ऐसा करते हुए देखने वालीं सोनिया संसद की मर्यादा का ख्याल करेंगी। ऐसी कोई उम्मीद वाम दलों और भाजपा से अवश्य थी, लेकिन अब वे भी कांग्रेस की भाषा बोल रहे हैं? कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा एवं अन्य दल जिस तरह सुप्रीम कोर्ट और सूचना आयोग के फैसले के खिलाफ लामबंद हुए उससे इस सवाल का जवाब मिल गया कि वे चुनाव सुधारों और काले धन को लेकर केवल बातें ही क्यों करते रहते हैं? नैतिकता की बातें करने वाले हमारे राजनीतिक दल अनैतिकता के पक्ष में खड़े होने में तनिक भी संकोच नहीं दिखा रहे हैं। उनके दिखाने के दांत अब और बड़े एवं खतरनाक नजर आने लगे हैं।

इस आलेख के लेखक राजीव सचान हैं

(दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर)


सत्ता का कमजोर केंद्र

साख के संकट से घिरी सत्ता


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