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महिला आरक्षण की दशा और दिशा

Posted On: 23 Mar, 2010 Others में

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महिलाओं को आरक्षण द्वारा सशक्त बनाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कोशिशें जारी हैं. अधिकांश दल और राजनेता आंख बन्द कर इस मुद्दे पर एकमत होते दिखाई दे रहे हैं. इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास किस सीमा तक उचित सिद्ध होंगे इसके बारे में पूरी तरह महिला आरक्षण कानून बन जाने पर उसके क्रियांवयन के पश्चात पता चलेगा किंतु परिवार व्यवस्था और महिला की प्रमुख भूमिका पर प्रभावी हो रही बाज़ार व्यवस्था और पूंजीवादी तंत्र के उपभोक्तावादी सिद्धांत से होने वाली हानि की भरपाई कर पाना निश्चित तौर पर बेहद कठिन होगी. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डा.भरत झुनझुनवाला ने इस मुद्दे की गहराई को छूने का एक प्रशंसनीय प्रयास किया है.

 

जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ”किसी भी कानून से स्त्री अथवा पुरूष तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकते जब तक वे एक दूसरे के आर्थिक प्रभुत्व के नीचे दबे हुए हैं. आर्थिक परावलंबन ही भारतीय महिला की समस्याओं की जड़ है.” इसी सोच को राजनीतिक क्षेत्र में महिला आरक्षण द्वारा लागू किया जा रहा है. प्रतीत होता है कि देश में महिला आरक्षण कानून के पक्ष में जनमत बन चुका है और यह कानून आज नहीं तो कल पारित हो ही जाएगा. इस कानून से उन महिलाओं और परिवारों को निश्चित रूप से लाभ होगा जो इस आरक्षण से लाभान्वित होंगे. वर्तमान समाज में धन और सत्ता को सम्मान दिया जाता है. संसद बनने से इस सम्मान में महिलाओं की भागीदारी बनेगी पर आम महिला की परिस्थिति बिगड़ेगी. जिस प्रकार गरीब के नाम पर चलाई जा रही सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से सरकारी कर्मचारी अमीर हो रहे हैं उसी प्रकार आम महिला के नाम पर चुनिंदा बौद्धिक महिलाओं मात्र का सशक्तिकरण होगा.

 

महिला आरक्षण और जातीय आरक्षण में मौलिक अंतर है. जाति का भेद शारीरिक नहीं होता है. दलित और सवर्ण की शारीरिक और मानसिक बनावट एक जैसी होती है. केवल जन्म के आधार पर इनमें भेद किया जाता है, लेकिन स्त्री और पुरूष की शारीरिक एवं मानसिक बनावट में अंतर होता है. बिनोबा कहते हैं कि महिलाओं के लिए ध्यान योग एवं भक्ति योग सुलभ होता है जबकि पुरूषों के लिये कर्म योग और ज्ञान योग उपयुक्त होता है. स्त्री और पुरूष दोनों के मेरूदंड में सात चक्त्र होते हैं. हृदय के पीछे अनाहत चक्र हमारी भावुकता अथवा संवेदनशीलता का केंद्र होता है. स्त्रियों में यह चक्र ज्यादा प्रबल होता है. अत: स्त्रिया सहज ही बच्चे के मनोभावों को समझ लेती हैं.

 

स्त्री-पुरुष के सम्मान, अस्तित्व एवं नैतिक वजन में समानता होनी ही चाहिए. दोनों ही मनुष्य हैं. प्रश्न है कि इस समानता को भावुकता के मानदंड पर स्थापित किया जाए या बौद्धिकता के मानदंड पर? समानता किस क्षेत्र में हो? नमक और चीनी के बीच यदि मीठेपन के मानदंड पर समानता स्थापित की जाएगी तो चीनी ही विजयी होगी पर यदि खारेपन के मानदंड पर समानता स्थापित की जाएगी तो नमक जीतेगा. इसी प्रकार भावुकता के मानदंड पर हम स्त्री-पुरूष में समानता स्थापित करेंगे तो स्त्री विजयी होगी और यदि बौद्धिकता के आधार पर समानता स्थापित करेंगे तो पुरुष विजयी होगा. नेहरू समेत वर्तमान युग की सोच में कमी यह है कि बौद्धिकता के मानदंड पर समानता स्थापित की जा रही है और भावुकता को नकारा जा रहा है. चुनिंदा महिलाएं जैसे मार्गरेट थै्रचर अथवा इंदिरा गांधी बौद्धिकता के इस मानदंड पर अव्वल निकल सकती हैं पर आम महिलाएं इस मानदंड पर आज की तुलना में ज्यादा पिछड़ जाएंगी.

 

नेहरू ने निर्णय दिया कि वह व्यक्ति श्रेष्ठ है जो आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हो. अत: महिलाएं अपनी बौद्धिक क्षमता को विकसित करने में लगी हुई हैं. मेरे आकलन में सारे प्रयास के बावजूद वे इस खेल में पुरूष की बराबरी नहीं कर पाएंगी. प्रख्यात नृवैज्ञानिक मारगरेट मीड कहती हैं ”जब सब उपलब्धियों को घर के बाहर बताया जाता है तो सक्रिय महिलाएं घर की चहारदीवारी में नहीं रहना चाहती हैं. जब घर को नकारा जायेगा तो भी महिलाएं अपने स्त्रीयत्व का सम्मान नहीं करेंगी और पुरुष भी महिला का सम्मान नहीं करेंगे.” मेरे आकलन में स्त्री-सुलभ भावुकता को नकार कर आम स्त्री कभी भी सशक्त नहीं हो सकती है. महिला सशक्तिकरण का सही मंत्र भावुकता को सम्मान देना है न कि भावुक व्यक्ति को बौद्धिकता का पाठ पढ़ाना.

 

प्रश्न है कि हम आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में बराबरी क्यों चाह रहे हैं और भावात्मक क्षेत्र में बराबरी क्यों नहीं चाह रहे है? मेरा आकलन है कि अर्थतंत्र ने अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिये बौद्धिक क्षमता का मानदंड समाज में सर्वत्र स्थापित कर दिया है. समाज में उस स्त्री को सम्मान दिया जाता है जो बुद्धि में प्रखर है और धन कमाती है. जैसे नौकरी से 5000 रुपये प्रति माह कमाने वाली एवं बस में प्रतिदिन धक्के खाने वाली महिला को सम्मान दिया जाता है और 50 लाख की कोठी में एयरकंडीशन कमरे में अपने बच्चे को स्वयं पढ़ाने वाली महिला को नहीं. सम्मान की इस लालसा में अधिकाधिक महिलाएं घर के बाहर धन कमाने निकल पड़ी हैं. इससे बाजार में श्रम की पूर्ति बढ़ रही है और अर्थतंत्र को वेतन कम देने पड़ रहे हैं. महिला सशक्तिकरण की प्रखर प्रवक्ता वंदना शिवा लिखती हैं: आज माना जा रहा है कि महिलाएं एक संसाधन हैं जिनका उपयोग लाभ कमाने के लिये पर्याप्त स्तर पर नहीं किया जा रहा है. आर्थिक नीति का उद्देश्य महिला को सशक्त करना नहीं है, बल्कि महिलाओं को लाभ कमाने का एक अस्त्र बनाना है.

 

महिला यदि घर में बैठकर अपने परिवार के पालन से प्रसन्न हो तो वह खपत कम करेगी. यदि वह साधारण टीवी से प्रसन्न है तो फ्लैट स्क्रीन टीवी नहीं खरीदेगी. महिलाएं अधिक खपत करें इसलिए उन्हें प्रेरित करना जरूरी है. अतएव अर्थतंत्र महिला के सम्मुख उसके आर्थिक और राजनैतिक सशक्तिकरण की बात करता है. मैं महिलाओं द्वारा बाहर काम करने का विरोध नहीं कर रहा हूं. इंदिरा गाधी प्रधान मंत्री बनीं, यह खुशी की बात है. गलत बात यह है कि आम महिला से कहा जाए कि यदि वह इंदिरा गाधी की तरह राजनीति नहीं करेगी तो उसका कोई अस्तित्व नहीं है. महिला को कमाने और राजनीति में उतरने को प्रेरित करने का उद्देश्य उसका सुख नहीं बल्कि अर्थतंत्र को सस्ता श्रम और बढ़ता बाजार उपलब्ध कराना है.

 

महिला के इस बाहरीकरण का दीर्घकाल में गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. कई शोधों से यह बात सामने रही है कि पश्चिमी देशों में महिलाएं प्रजनन कम कर रही हैं. युवावस्था में कैरियर बनाने में वे इतना व्यस्त हो जाती हैं कि उस समय संतान पैदा करने का अवसर नहीं रहता है. बाद में इस कार्य में रुचि नहीं रह जाती है. परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों मैं फैली श्वेत जाति लुप्त होने की ओर अग्रसर है. रूस जैसे देशों को संतानोत्पत्तिके लिए विशेष प्रयास करने पड़ रहे हैं. पहले महिला को सशक्त बनाने के नाम पर घर और प्रजनन से विमुख किया गया. दुष्परिणाम सामने आए तो उन्हें पुन: प्रजनन के लिये प्रेरित करना पड़ रहा है. यह प्रयास सफल होगा, इसमें संदेह है, क्योंकि संतान उत्पत्ति से धन नहीं कमाया जा सकता, बल्कि धन का व्यय बढ़ता ही है.

 

वर्तमान में अर्थतंत्र का तूफान सभी सामाजिक मूल्यों को रौंदता और विजयी होता दिखाई दे रहा है, पर यह विजय अल्पकालीन होगी. शीघ्र ही आम महिला को समझ आ जाएगा कि राजनीतिक आरक्षण से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. समाज में समस्याएं बढ़ेगी. अंतत: समाज उन महिलाओं को सम्मानित करना शुरू करेगा जो काम करने से अपने को बचाए रखती हैं. सुखी महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा तो समाज पुन: अपने सही रास्ते पर आ सकता है.

Source: Jagran Yahoo

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