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विफल वामपंथ खिसकता जनाधार

Posted On: 3 Jun, 2010 Others में

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पश्चिम बंगाल की 81 पालिकाओं के लिए हुए चुनाव में भी जनादेश माकपा के विरुद्ध गया है. पालिका चुनावों के पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव, लोकसभा चुनाव और विधानसभा की दस सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे भी माकपा के खिलाफ गए थे. लगातार हार के बावजूद नैतिकता के आधार पर बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं देने जा रहे हैं. चूंकि ये सभी चुनाव नतीजे बुद्धदेव की दृष्टि में खंडित जनादेश हैं, समग्र जनादेश नहीं इसलिए मियाद पूरी होने के पहले वह इस्तीफा नहीं देंगे. इस पद लोलुपता को ढकने के लिए कहा जा रहा है कि अभी सरकार से हटने और समय से पहले चुनाव कराने की सिफारिश करने का अर्थ होगा लड़ाई का मैदान छोड़कर भागना. 1991 में ज्योति बसु ने जब चुनाव साल भर पहले कराया था या नब्बे के दशक के आखिर में केरल में ईके नयनार ने चुनाव पहले कराया था तो क्या वे लड़ाई का मैदान छोड़कर भागे थे? असल में तब जीत की गारंटी थी और अभी पराजय की भृकुटि तनी हुई है.

 

नैतिकता के आधार पर बुद्धदेव के इस्तीफा नहीं देने का मतलब यह भी नहीं है कि वह बचे हुए एक साल के समय का उपयोग पार्टी के खिसके जनाधार को वापस लाने में करने की सदिच्छा रखते हैं. यदि उनमें यह सदिच्छा सचमुच रहती तो दक्षिण बंगाल से लेकर उत्तर बंगाल तक में कानून और व्यवस्था की स्थिति क्यों नष्ट हो गई है? दार्जिलिंग में दिनदहाड़े गोरखा लीग के अध्यक्ष मदन तमाग की हत्या कर दी गई और वहा तैनात एक इंसपेक्टर समेत 35 पुलिस जवान मूकदर्शक बने रहे. क्या बुद्धदेव के राज में रक्तपात ही अनिवार्य नियति है? पुलिस को निष्क्रिय कर माकपा कैडर विपक्ष के जनाधार वाले स्थानों पर इलाका दखल अभियान क्यों चला रहे हैं? हुगली के आरामबाग व खानाकुल में हथियार के बल पर इलाका दखल कर रहे माकपा कैडरों को पुलिस ने क्यों नहीं रोका? पूर्वी मेदिनीपुर के खेजुरी में माकपा कार्यालय और माकपा कैडरों के घर से भारी संख्या में गोला-बारूद बरामद किए गए. उनके विरुद्ध बुद्धदेव सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? खेजुरी में हथियार जमा होते रहे और बुद्धदेव सरकार की पुलिस को कोई भनक तक क्यों नहीं मिली? क्या यह पुलिस-प्रशासन की विफलता नहीं है? दक्षिण बंगाल में राज्य पुलिस क्यों माकपा कैडरों की अनुगत बन गई है?

 

लालगढ़ में साल भर से चल रहे राज्य व केंद्र की सशस्त्र पुलिस वाहिनी के अभियान के बावजूद माओवादी वहां लगातार सक्रिय हैं और उनके हमलों में माकपा के कैडर और सुरक्षा जवान मारे जा रहे हैं. अपने ही दल के कार्यकर्ताओं और पुलिस वालों की सुरक्षा नहीं कर पाने की जिम्मेदारी किसकी है? नंदीग्राम नरसंहार के बाद माकपा ने वहा विरोधियों को हटाने का अभियान आरंभ किया तो उसे सूर्योदय की संज्ञा दी गई और उस सूर्योदय के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें उनकी भाषा में समझा दिया गया. गृहमंत्री होने के नाते बुद्धदेव की आरंभिक जिम्मेदारी आम आदमी को सुरक्षा देना है जिसमें वह पूरी तरह विफल साबित हुए हैं. दूसरी तरफ माकपा नेताओं का सुरक्षा कवच बढ़ता ही जा रहा है. आम आदमी की चिंता नहीं किए जाने के कारण ही लोग माकपा से मुंह फेरना जारी रखे हुए हैं. वैसे आम आदमी के मुंह फेरने की दूसरी बड़ी वजहें भी हैं.

 

पहली वजह तो बुद्धदेव की औद्योगिक लाइन ही है. टाटा के कार कारखाने के लिए सिंगुर के किसानों की बहुफसली जमीन का जबरन अधिग्रहण करने व नंदीग्राम में जमीन के अधिग्रहण की नोटिस चिपकाने से राज्यभर के किसान आशकित हो उठे. किसानों ने आदोलन शुरू किया तो माकपा ताकत के बल पर उसे कुचलने पर उतर आई. उधर एक के बाद एक हार के फलस्वरूप बुद्धदेव पार्टी में भी लगातार अलग-थलग पड़ते गए हैं. सिर्फ दल के भीतर ही नहीं, वाममोर्चा के भीतर और बाहर भी मुख्यमंत्री को लगातार चुनौतिया मिल रही हैं. बुद्धदेव की तरह ही उनकी पार्टी माकपा भी आज तीव्र सागठिक और वैचारिक संकट से जूझ रही है. वैचारिक संकट का आलम यह है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी के सवाल पर माकपा ने भाजपा के साथ संसद से वाकआउट किया था.

 

माकपा बराबर कहती रही है कि भाजपा सांप्रदायिक पार्टी है और इसीलिए वह उसे दुश्मन नंबर एक मानती है. सवाल है तब प्रणब मुखर्जी के बजट पेश किए जाने के बाद ही कम्युनिस्ट सांसदों ने भाजपा सांसदों के साथ एकजुट होकर वाकआउट क्यों किया? र्इंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी पहले भी होती रही है, तब साम्यवादी सासदों ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर प्रतिवाद क्यों नहीं किया? पिछली बार वामदलों ने साप्रदायिक भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए ही काग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की पंथनिरपेक्ष सरकार का समर्थन किया था. ईधन कीमतों के सवाल पर जिस भाजपा के साथ कम्युनिस्ट पार्टियों ने गलबहियां कीं उसे फिर बंगाल के पालिका चुनावों में उन्होंने सांप्रदायिक दल और दुश्मन नंबर एक कहा. वैचारिक अंतर्विरोध के कारण ही पहले प्राथमिक कक्षाओं से अंग्रेजी हटाई गई, बाद में गलती सुधारते हुए पुन: अंग्रेजी शुरू की गई. प्राथमिक कक्षाओं में पहले पासफेल प्रणाली बंद की गई, फिर उसे भी सुधारा गया. रही सागठनिक दुर्बलता की बात तो शुद्धीकरण अभियान चलाने से स्वत: सिद्ध है कि माकपा में भ्रष्टाचार और स्वजन पोषण की बात भी अब किसी से छिपी नहीं रह गई है.

Source: Jagran Yahoo

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