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साख के संकट से घिरी सत्ता

Posted On: 17 May, 2013 Others में

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Sanjay guptसंप्रग सरकार के लिए पिछले कुछ दिन जितने शर्मनाक रहे उतने शायद ही किसी सरकार के लिए रहे हों। इस सरकार ने तो अपने लिए शर्म से डूब मरने वाली स्थिति पैदा कर ली। यह स्थिति पैदा हुई पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार के आचरण के कारण। जहां रेल मंत्री पवन बंसल रेलवे बोर्ड में एक प्रमोशन की खातिर रिश्वत लेने के आरोपों में घिरे वहीं अश्विनी कुमार कोयला घोटाले की सीबीआइ जांच रपट में छेड़छाड़ करते एक तरह से रंगे हाथ पकड़े गए। पहले कांग्रेस और सरकार की ओर से इन दोनों मंत्रियों का हर तरह से बचाव किया गया, लेकिन जब हालात बिगड़ गए तब उन्हें हटाकर नैतिकता की राजनीति करने का दावा किया गया। इससे संप्रग सरकार की बची-खुची साख भी रसातल में पहुंची। इन दोनों मंत्रियों के बेजा बचाव के कारण संसद के बजट सत्र का दूसरा भाग हंगामे की भेंट चढ़ गया। यह तब हुआ जब अनेक महत्वपूर्ण विधेयक संसद की मंजूरी की बाट जोह रहे थे। इनमें से कुछ विधेयक ऐसे हैं जो सीधे-सीधे देश की तरक्की से जुड़े हुए हैं। यह कुल मिलाकर सत्तापक्ष की जिद और अहंकारी रवैये का ही परिणाम रहा कि संसद में एक और सत्र बिना किसी ठोस कामकाज के समाप्त हो गया। संसद के इस तरह ठप रहने के लिए सत्तापक्ष की तरह विपक्ष भी कम जिम्मेदार नहीं। भाजपा ने इसके लिए कोई सक्रियता और प्रतिबद्धता नहीं प्रदर्शित की कि कम से कम संसद राजनीतिक जिद की बंधक न बनने पाए। ऐसा लगता है कि संसद ठप रहने से सत्तापक्ष की हो रही किरकिरी भाजपा को राजनीतिक रूप से रास आ रही थी। भाजपा को यह ध्यान रखना होगा कि देश की समस्याओं का निराकरण संसद में बहस करके ही संभव है, न कि मीडिया में वाहवाही लूटने या सरकार पर कीचड़ उछालने से।

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जब अन्ना हजारे और उनके साथियों ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सशक्त लोकपाल कानून को लेकर आंदोलन छेड़ा था तो लगभग सभी दलों ने उन्हें मिल रहे भारी जनसमर्थन से चिंतित होकर भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प व्यक्त किया। यह वह समय था जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आ चुका था और कई बड़े अफसर हवालात में बंद कर दिए गए थे। इस माहौल में नौकरशाही ने नियमित कामकाज से संबंधित फाइलों पर भी फूंक-फूंककर कदम रखना शुरू किया, जो आज दिन तक जारी है। ऐसे माहौल में कथित तौर पर साफ छवि और प्रधानमंत्री के निकट माने जाने वाले पवन बंसल के कार्यालय से उनके भांजे भ्रष्टाचार को लगातार अंजाम दे रहे थे। पवन बंसल भले ही यह दलील दें कि उनके भांजे ने जो कुछ किया उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन यह सफाई किसी के गले नहीं उतरने वाली। सीबीआइ की जांच में जैसे तथ्य सामने आए हैं उनसे यही पता चलता है कि रेल मंत्रलय का तो हाल ही बुरा है। पवन बंसल तो एक बानगी हैं। केंद्र अथवा राज्यों के स्तर पर शायद ही कोई मंत्री ऐसा हो जिसके परिजनों ने उसके पद अथवा पहुंच का अनुचित लाभ न उठाया हो। बेहतर होगा कि देश में कोई एक ऐसा कानून बने जिससे राजनेताओं की साल दर साल बढ़ती संपत्ति की जांच लगातार होती रहे और अनियमितता पाए जाने पर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो सके। यह जांच सिर्फ राजनेताओं की संपत्ति की ही नहीं, बल्कि उनके परिजनों की भी होनी चाहिए।


हमारे देश में समस्या यह है कि जब बड़े घपले-घोटालों की जांच की बात आती है तो मामला सीबीआइ पर आ जाता है और वह किस तरह काम करती है, यह कोयला घोटाले की जांच को लेकर उसके खिलाफ की गईं सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से स्पष्ट हो जाता है। कोयला घोटाले की जांच में हस्तक्षेप से नाराज शीर्ष अदालत ने सीबीआइ को सरकारी पिंजड़े में बंद तोता बताया है। इस टिप्पणी से सकते में आई सरकार ने सीबीआइ को सरकारी दखल से मुक्त करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन के लिए एक मंत्री समूह का गठन कर दिया है, लेकिन अभी यह कहना कठिन है कि यह समूह इस जांच एजेंसी को स्वायत्तता प्रदान करने का कोई सही रास्ता खोज सकेगा, क्योंकि पिछले कुछ वर्षो से यह जांच एजेंसी राजनीतिक हित साधने का माध्यम भी बनी हुई है।

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अश्विनी कुमार का मामला कुछ अलग तरह का है। उन्होंने एक केंद्रीय मंत्री और वह भी कानून मंत्री होते हुए कोयला घोटाले की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की। दुर्भाग्य से पवन बंसल के साथ-साथ अश्विनी कुमार का भी तब तक बचाव किया जाता रहा जब तक सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ और सरकार की बखिया नहीं उधेड़ दी। सबसे अधिक हास्यास्पद यह है कि अश्विनी कुमार का बचाव इस तर्क के साथ किया जाता रहा कि उनका मामला अदालत में है, जबकि सच्चाई यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने जांच रिपोर्ट में छेड़छाड़ को बहुत गंभीर माना। सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बावजूद वे लोग अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं हुए जो अश्विनी कुमार का बचाव करने में लगे हुए थे। आखिर केंद्र सरकार के प्रतिनिधि इतने नासमझ कैसे हो सकते हैं? उन्हें तब यह उम्मीद क्यों थी कि सुप्रीम कोर्ट अश्विनी कुमार की छेड़छाड़ को गंभीरता से नहीं लेगा जब पूरा देश यह महसूस कर रहा था कि कानून मंत्री ने जो किया है वह अक्षम्य अपराध है?


संप्रग सरकार के दोनों कार्यकाल में अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गांधी परिवार पर सीधे-सीधे अंगुली नहीं उठी थी, लेकिन पहले ए.राजा और फिर अश्विनी कुमार को जिस तरह क्लीन चिट दी गई और बाद में उनसे इस्तीफा लेना पड़ा उससे प्रधानमंत्री विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। दो मंत्रियों के त्यागपत्र से भाजपा उत्साहित है। वह इसे अपनी जीत के रूप में देख रही है और इसीलिए अब सीधे-सीधे प्रधानमंत्री से सवालों के जवाब मांग रही हैं। अश्विनी कुमार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का करीबी माना जाता है और इस लिहाज से यह आशंका आधारहीन नहीं कि सीबीआइ जांच रपट में जो छेड़छाड़ की गई वह कहीं न कहीं प्रधानमंत्री कार्यालय को बचाने के लिए ही की गई। ध्यान रहे कि एक समय कोयला मंत्रलय प्रधानमंत्री के अधीन था। इसके पहले 2जी घोटाले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा भी प्रधानमंत्री कार्यालय पर अंगुली उठा चुके हैं। राजा की मानें तो स्पेक्ट्रम की कीमतें तय करने के संदर्भ में सभी फैसलों की जानकारी प्रधानमंत्री को भी दी गई थी। वह 2जी मामले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष भी अपना पक्ष रखना चाहते थे, लेकिन समिति के अध्यक्ष पीसी चाको ने उन्हें इसका अवसर नहीं दिया। मनमोहन सिंह अभी तक अपनी छवि के आधार पर किसी भी तरह के आरोपों से बच निकलते रहे हैं, लेकिन अब हालात बदले हुए नजर आते हैं। उन्हें पहले 2जी स्पेक्ट्रम और फिर कोयला घोटाले में अपने कार्यालय की भूमिका पर उठ रहे सवालों के उत्तर देने होंगे।

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मर्ज का मर्म


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