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हिंदी का बढ़ता प्रभुत्व

Posted On: 9 Jun, 2010 Others में

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हाल ही में जिस प्रकार से आईआईटी संयुक्त प्रदेश परीक्षा (जेईई)-2010 के घोषित परिणामों में देश के ग्रामीण व हिंदीभाषी क्षेत्रों के युवाओं ने सफलता प्राप्त की है उससे पूरा अंग्रेजी प्रेमी समाज हिल गया। निश्चित ही विषम परिस्थितियों में भारतीय प्रशासनिक सेवा, चिकित्सा व राष्ट्र के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में हिंदीभाषी युवाओं का चयन मूल संस्कृति की ओर वापसी का संकेत है। लार्ड मैकाले और उसके मानस पुत्रों ने जिस प्रकार भारत की मूल भाषा हिंदी पर आक्रमण करते हुए अंग्रेजी भाषा को प्रतिष्ठित किया था, आज हमारे युवा उस वैचारिकी को प्रत्युत्तर देने में सक्षम नजर आ रहे हैं। 15 आईआईटी में कुल 13,104 उम्मीदवारों का चयन हुआ। इन प्रतियोगी युवाओं में 554 सफल छात्र वे रहे जिन्होंने हिंदी माध्यम से परीक्षा दी थी।

 

हिंदी माध्यम वाले सफल प्रतियोगी युवाओं की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में तीन गुना हो गई है। बिहार में गरीब एवं प्रतिभाशाली बच्चों के भविष्य को सजाने व संवारने के लिए सुपर-30 के मूल में छिपी संस्कृति का लोकमन अनुकरणीय है। इस संस्था के निदेशक आनंद कुमार का कहना है कि हमने गरीब, मजदूर, किसान व ग्रामीण परिवेश से जुड़े मेधावी बच्चों के भविष्य को संवारने का एक स्वप्न देखा था। आज इन तीस बच्चों के आईआईटी के चयन के पश्चात हमारा स्वप्न साकार हो रहा है। 2002 में इस संस्थान की स्थापना के समय से विगत आठ वषरें में 212 युवाओं का आईआईटी में चयन हो चुका है।

 

कानपुर में मछरिया में रहने वाले अभिषेक भी ऐसे ही सफल प्रतियोगी हैं, जिनके पिता मोची हैं और मां कपड़े सिलकर परिवार का भरण-पोषण करती हैं। एक अन्य उदाहरण बिहार के गया जनपद के मोहम्मद शादाब आजम का है, जिनके पिता गांव में ही मजदूरी करते हैं। दरअसल, किसी भी देश की शिक्षा प्रणाली उस देश के सर्वांगीण विकास का साधन है। देश की आजादी से पूर्व स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग राष्ट्र की बुनियादी शिक्षा से पूर्ण परिचित थे। उन्हें यह भी अपेक्षा थी कि स्वतंत्र भारत में जो भी महत्वपूर्ण परिवर्तन होंगे, उनमें शैक्षिक परिवर्तन के आधार पर होने वाला सामाजिक परिवर्तन सर्वोत्कृष्ट होगा। इससे देश में भारतीय जड़ों से जुड़ी शिक्षा प्रणाली कार्यान्वित होगी तथा औपनिवेशिक मानसिकता से जुड़ी व विदेशी शासकों द्वारा लादी गई शिक्षा प्रणाली से मुक्ति मिलेगी।

 

देश की स्वतंत्रता के पश्चात भले ही ब्रिटिश शासक चले गए, परंतु गुलामी के शासन में पली-बढ़ी वह पीढ़ी देश की आजादी के बाद भी गुलाम मानसिकता से उबर नहीं सकी। कटु सत्य यह है कि जिस अंग्रेजी को अंग्रेजीदां लोगों ने यहां उस शासन-सत्ता के संचालन का महत्वपूर्ण अंग बनाया, देश की आजादी के बाद भी वही अंग्रेजियत प्रगति और विकास का महत्वपूर्ण अंग बनी रही। शासक वर्ग ने हिंदी को पिछड़ेपन और अंग्रेजी को आधुनिकता का प्रतीक बनाकर पेश किया। वास्तविकता यह है कि भाषा केवल संप्रेषण का ही माध्यम नहीं होती, बल्कि उसके गर्भ में उस देश का लोकमन और संस्कृति की परंपरा सुरक्षित रहती है।

 

भारत का शासक वर्ग इस सच्चाई से भली-भाति परिचित है कि यदि समाज के वंचित वर्ग को इसकी मूल जड़ों से जुड़ी शिक्षा से जोड़ दिया गया तो यही वर्ग उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा। इसलिए इस प्रभु वर्ग ने अंग्रेजी को केंद्र में रखकर उसे शासन-सत्ता के संचालन का मूलमंत्र बना दिया। तत्पश्चात समाज के आम लोगों में यह संदेश प्रसारित हुआ कि डाक्टर, इंजीनियर तथा भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य है। यही कारण रहा कि देश में अंग्रेजी भाषा से जुड़े स्कूल व शिक्षकों की बाढ़-सी आ गई।

 

जहां इतिहास में पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति होती है, वहीं संस्कृति का भी अपना एक लोकमन होता है, जो अपनी मूल जड़ों की ओर वापस होने के लिए सदैव उकसाता रहता है। आज हिंदी भाषी क्षेत्र के युवाओं ने जिस प्रकार इन प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी के दुर्ग में सेंध लगाई है उससे अंग्रेजी को पुष्पित व पल्लवित करने वाला वर्ग आश्चर्यचकित है। देश के हिंदीभाषी प्रांतों से जुड़े इन युवाओं ने जो संदेश दिया है उसका सारतत्व यह है कि संसाधनों का अभाव अब वंचनाओं की जननी न होकर उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने की रचनात्मकता है। भविष्य में कमजोर व गरीब वर्ग के युवाओं के बीच इस सोच को विस्तार देने की महती आवश्यकता है।

Source: Jagran Yahoo

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