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एक अधूरा अभियान

Posted On: 30 Jul, 2012 Others में

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भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना के आंदोलन की दिशा और प्रभाव पर निगाह डाल रहे हैं संजय गुप्त

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और उनकी टीम फिर से आंदोलनरत है। इस बार नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन की शुरुआत टीम अन्ना के सदस्यों ने की। रविवार से खुद अन्ना हजारे भी अनशन पर बैठने जा रहे हैं। देखना है कि उनके आगे आने पर अनशन स्थल पर आम लोगों की भीड़ बढ़ती है या नहीं? अभी तक आम लोगों की अपेक्षा से कम भागीदारी ने इस आंदोलन की प्रासंगिकता पर कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं। सिविल सोसाइटी के चुनिंदा लोगों को छोड़ दिया जाए तो अनशन स्थल पर इस बार अब तक वैसी भीड़ नहीं दिखी है जैसी पिछले आंदोलनों के दौरान नजर आती थी। वहां जुटने वाले लोगों में वैसा उत्साह भी नहीं नजर आता, जबकि अन्ना जब पहली बार जंतर-मंतर पर और फिर रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे तो आम जनता की भागीदारी देखने लायक थी। इस बार कम भीड़ के कारण यह सवाल उभर रहा है कि आखिर अन्ना हजारे और उनके साथियों द्वारा भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र सरकार को लगातार घेरते रहने के बावजूद इस बार वे अपने आंदोलन के प्रति आम जनता को आकर्षित क्यों नहीं कर सके? यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल के गठन को लेकर केंद्र सरकार का रुख अभी भी पहले के समान टालमटोल वाला है। टीम अन्ना और साथ ही पूरे देश से इस संदर्भ में वायदा करने के बावजूद केंद्र सरकार लोकपाल के मसले पर आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। कुछ ऐसा ही हाल अन्य राजनीतिक दलों का भी है।


लोकपाल के मसले पर संसद के विशेष सत्र में सभी दलों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़-चढ़कर बातें तो कीं, लेकिन वास्तव में किया कुछ भी नहीं। जो कोशिश की गई वह निरर्थक साबित हुई। लोकपाल के मसले पर देश से किए गए वायदे को लगभग एक वर्ष हो चुका है, लेकिन स्थिति जस की तस है। लोकपाल विधेयक लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में अटक गया। अब वह राज्यसभा की संसदीय समिति के पास है और कोई नहीं जानता कि उसका भविष्य क्या है? टीम अन्ना इस विधेयक को कमजोर और निष्प्रभावी मानती है। लोकपाल विधेयक को जिस तरह संसद की प्रवर समिति के हवाले किया गया और वह निष्कि्रय सी नजर आ रही है उससे यह साफ पता चलता है कि केंद्र सरकार उसे कानून का रूप दिलाने के लिए तत्पर नहीं है। इसके विपरीत वह टीम अन्ना को कमजोर करने और उस पर प्रहार करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रही है। यह आश्चर्यजनक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने के बजाय केंद्रीय मंत्री टीम अन्ना के सदस्यों को निशाना बनाने में लगे हैं। खुद टीम अन्ना की एकजुटता भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि उसके सदस्यों के बीच मतभेद के समाचार भी सामने आते रहते हैं। ताजा उदाहरण कथित भ्रष्ट मंत्रियों की सूची का है। इस सूची में राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हुए प्रणब मुखर्जी का भी नाम है।


हालांकि खुद अन्ना हजारे ने यह स्पष्ट किया है कि वह प्रणब मुखर्जी को इस सूची में रखने के पक्ष में नहीं हैं। वैसे तो टीम अन्ना ने अपने आंदोलन को राजनीति से परे रखने की पूरी कोशिश की है, लेकिन बीच-बीच में विपक्षी दलों के साथ उसके मेलजोल ने उसकी निष्पक्षता को प्रभावित करने का काम किया है। इस आंदोलन की साख पर कुछ असर बाबा रामदेव को अपने साथ जोड़ने के कारण भी लगा है, जो अपनी बयानबाजी के कारण अक्सर विवादों में घिर जाते हैं। लगता है कि केंद्र सरकार ने यह मान लिया है कि टीम अन्ना का आंदोलन अब तीखी बयानबाजी तक सीमित रह गया है और अपनी धार खो चुका है। जो भी हो, तीखे बयान सुर्खियां तो बटोर सकते हैं, लेकिन केंद्र सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं डाल सकते। केंद्र सरकार के इस भरोसे की एक बड़ी वजह विपक्षी दलों का कमजोर होना भी है। केंद्रीय सत्ता को यह भी पता है कि अन्ना हजारे और उनके साथी जिस भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं वह केवल उससे ही संबंधित नहीं है, बल्कि इस दलदल में लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल फंसा हुआ है। केंद्र सरकार और विपक्षी दल इसी का फायदा उठा रहे हैं और यही कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपायों को लेकर राजनीतिक सहमति कायम नहीं हो पा रही है। लोकपाल विधेयक का जैसा हश्र हुआ वह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इससे अधिक निराशाजनक और क्या होगा कि राजनीतिक वर्ग लोकपाल विधेयक के किसी भी प्रारूप पर सहमत नहीं हो पा रहा है। टीम अन्ना को भी यह अनुभूति होनी चाहिए कि उसका आंदोलन भ्रष्टाचार की गंभीर समस्या का एक सीमित स्तर पर ही उपचार कर सकता है। निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को एक लोकपाल के जरिये नहीं मिटाया जा सकता। जब तक इस भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगेगा तब तक आम जनता को राहत नहीं मिलने वाली।


जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने का काम तो राज्य सरकारों को करना होगा। आज यह किसी से छिपा नहीं कि भ्रष्टाचार केवल सार्वजनिक उपक्रमों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि निजी क्षेत्र में भी यह पैर फैलाता जा रहा है। राजनीति तो भ्रष्टाचार की पर्याय बन ही चुकी है। बावजूद इसके आम आदमी सबसे अधिक उस भ्रष्टाचार से त्रस्त है जो उसके निजी जीवन और रोजमर्रा के कामकाज में बाधा पहुंचा रहा है। राज्य सरकारों को ही यह देखना होगा कि इस भ्रष्टाचार से आम जनता को कैसे राहत मिले। इसके लिए न केवल साफ-सुथरे प्रशासन की आवश्यकता है, बल्कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता भी लानी होगी। कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य भी किए हैं। उन्होंने लोकायुक्त कानून भी बनाए हैं, लेकिन स्थितियों में कोई बहुत अंतर नहीं आया। यदि मुख्यमंत्री चाहें तो वे भ्रष्टाचार पर एक बड़ी हद तक काबू पाने वाली व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं? यह निराशाजनक है कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए लोकपाल को ही एकमात्र उपाय मान रही है। नि:संदेह लोकपाल से भ्रष्टाचार के नियंत्रण में मदद मिलेगी, लेकिन इससे यह समस्या जड़ से नहीं खत्म होने वाली। टीम अन्ना के इरादे नेक हैं, लेकिन देश के राजनेता यह जानते हैं कि अनशन-आंदोलन हमेशा प्रभावी सिद्ध नहीं होते। अन्ना हजारे के आंदोलन को मजबूती मिले, इसके लिए केवल अनशन स्थल पर भीड़ बढ़ाने से बात बनने वाली नहीं है। टीम अन्ना को पूरे देश में हजारों की तादाद में ऐसे आंदोलन खड़े करने होंगे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता की आवाज बनकर उभरें। जब तक आम जनता खुद भ्रष्टाचार के खिलाफ डटकर नहीं खड़ी होगी तब तक सिर्फ कानूनों के सहारे इस बुराई को मिटाया नहीं जा सकता। इसके लिए हो सकता है कि आम जनता को कुछ कष्ट भी उठाना पड़े, लेकिन जब तक उसके मन में देश के प्रति अपने दायित्व और कानूनों के पालन की भावना मजबूत नहीं होती और शार्ट-कट अपनाने की प्रवृत्ति का परित्याग नहीं किया जाता तब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचेगी।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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