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साझा सामाजिक सच [बराक ओबामा की भारत यात्रा]

Posted On: 8 Nov, 2010 Others में

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प्रथम अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा दोनों देशों के बीच संबंधों के एक नए युग की शुरुआत है। इस कारण हमने अमेरिकी दूतावास से प्रार्थना की थी कि राष्ट्रपति थोड़ा समय दिल्ली के अलीपुर रोड पर भी बिताते, जहां डॉ. अंबेडकर का अंतिम समय बीता, लेकिन दुर्भाग्य से इसे अस्वीकार कर दिया गया। यदि ओबामा यहां जाते तो भारत के दलितों में अच्छा संदेश जाता और दलित खुद को दुनिया के अश्वेतों के करीब महसूस करते। यदि यह संभव नहीं था तो भी वह दलित प्रतिनिधियों से मिल सकते थे, लेकिन व्यस्तता का कारण बताते हुए इससे भी इनकार कर दिया गया। ओबामा अमेरिका के दलित ही हैं। वह उसी जमात से आते हैं जिनकी गोरे कभी खरीद-फरोख्त करते थे। इनकी बस्तिया अलग हुआ करती थीं। 1955 तक अमेरिका में बस में बैठने का प्रथम अधिकार गोरों का हुआ करता था। जब एक अश्वेत रोजा पार्क ने इस परंपरा को मानने से इनकार कर दिया तो वहा विद्रोह खड़ा हो गया। परिणामस्वरूप भीषण खूनी संघर्ष छिड़ गया। अश्वेतों की दासता की मुक्ति का नेतृत्व मार्टिन लूथर किंग ने किया। भले ही मार्टिन लूथर किंग अश्वेत थे, लेकिन यह आदोलन सफल न होता यदि श्वेतों ने साधन एवं नेतृत्व में मन से साथ न दिया होता।


ओबामा को राष्ट्रपति गोरे लोगो ने बनाया। गोरों की आबादी दो तिहाई से ज्यादा है तो जाहिर है कि इन्हीं का वोट निर्णायक है। गोरों ने ऐसा करके अपने माथे का कलंक मिटा दिया। दुनिया के बाकी देशों के लिए भी यह संदेश था कि यदि वे तरक्की करना चाहते हैं तो भले ही अतीत में जाति-भेद, रंग-भेद या सांप्रदायिक नफरत रखते रहे हों, लेकिन उसे खत्म करने में ही मानवता का भला है और इससे शासन-प्रशासन की मजबूत नींव रखी जा सकती है। जब ओबामा राष्ट्रपति हुए थे तो भारत में बहस छिड़ी थी कि यहा का ओबामा कौन होगा? विकल्प में कुछ नाम उछले थे। बहुजन समाज पार्टी के लोगों का मनोबल बढ़ा कि उनकी नेता मायावती 2009 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री बन जाएंगी। चाहे ओबामा की चुनावी जीत की बात हो या उनका भारत का दौरा, कहीं न कहीं महसूस होता रहा कि वे वहा के वंचित समाज से हैं। ओबामा की जीत के पहले नहीं तो उसके बाद ही सही भारत के अगड़ी जाति के लोगों को महसूस करना चाहिए था कि जिस तरह से गोरों ने अपने अतीत के गुनाह को मिटाने की कोशिश की, भारत में भी ऐसा होना चाहिए। हालांकि ऐसा कुछ दिख नहीं रहा। हाल में मध्य प्रदेश के मुरैना में कथित ऊंची जाति के एक व्यक्ति के कुत्ते को जब दलित ने रोटी खिलाई तो वह कुत्ता ही अछूत हो गया। उप्र में मिड डे मील तैयार करने वाले दलित रसोइयों के हाथ से बने खाने को स्कूल के बच्चों ने खाने से मना कर दिया। बच्चों में भी दलित रसोइयों के खिलाफ नफरत दिखी। यह उस प्रदेश की हालत है जहा दलित मुख्यमंत्री हो। अंत में दलित रसोइयों की नियुक्ति संबंधी आरक्षण को खत्म करना पड़ा। क्या ऐसा समाज विकसित देशों की श्रेणी में आ सकता है? ओबामा की जीत से पहले भी अमेरिकी समाज में परिवर्तन होता रहा है।


अमेरिका में कोई फिल्म बने और उसमें कुछ अश्वेत न दिखें, यह असंभव है। अश्वेत जरूर रहते हैं, चाहे वे नायक के रूप में हों या हास्य अभिनेता के रूप में। अमेरिका में खरबपतियों के समूह में तमाम अश्वेत हैं, जबकि भारत में ऐसे दलित उद्योगपति को ढूंढना मुश्किल है। अमेरिका में 1980 के दशक में जब यह पता लगा कि मीडिया की दुनिया में अश्वेतों का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है तो एक नीति निर्धारित करते हुए अश्वेत नौजवानों को प्रशिक्षित करके उन्हें नियुक्ति दी गई। एक दशक के बाद जब सर्वेक्षण कराया तो पता लगा कि उनकी भागीदारी पत्रकारिता की दुनिया में लगभग उनकी आबादी के अनुपात में हो गई है। वहां अश्वेतं की आबादी लगभग 10 प्रतिशत है। बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों के लगभग 100 कार्यकारी अध्यक्ष अश्वेत हैं। अपने देश में कई वर्षो से निजी क्षेत्र में आरक्षण देने की मांग हो रही है, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया।

Source: Jagran Yahoo


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