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साख के संकट में घिरी कांग्रेस

Posted On: 29 Dec, 2010 Others में

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कांग्रेस ने 2009 की धमाकेदार जीत के साथ 2010 की शुरुआत भी शाही अंदाज में की थी। राज्यसभा में दमदारी के साथ महिला आरक्षण विधेयक पारित करा और राष्ट्रीय सलाहकार समिति के गठन के साथ कांग्रेस आलकमान ने अपनी दूरगामी और महत्वाकांक्षी योजनाओं के संकेत भी दे दिए थे। न सिर्फ घरेलू, बल्कि विदेशी मोर्चे पर भी संप्रग सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की आस को खूब हवा दी। सब कुछ उसके हक में ही जा रहा था कि नाभिकीय क्षतिपूर्ति उत्तारदायित्व विधेयक और महंगाई के मुद्दे पर एकजुट हुए राजग और गैर-राजग दलों के समग्र विपक्ष ने सरकार की नाक में दम कर दिया। राजनीतिक कौशल से पहली छमाही तो किसी तरह संप्रग ने निकाल ली, लेकिन सरकार को भ्रष्टाचार के राहु ने ऐसा डसा है कि नए साल यानी 2011 की शुरुआत उसे विश्वसनीयता पर ग्रहण के साथ करनी पड़ रही है।



नैतिक मोर्चे पर भ्रष्टाचार से जूझती सरकार और सियासी मोर्चे पर बिहार में कांग्रेस की करारी हार के बाद सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ही नहीं राहुल गांधी के लिए भी नए साल की बेहद कठिन राह तय हो गई है। बड़े सपनों के साथ शुरू हुआ 2010 जब अपने अंजाम तक पहुंच रहा है तो सीडब्लूजी से लेकर 2 जी भ्रष्टाचार और राडिया प्रकरण का कुहासा प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर पूरी संप्रग सरकार पर छाया हुआ है। संप्रग के मिस्टर क्रेडिबल यानी डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक इस विवाद के छींटे पहुंचे हैं। हालांकि, ‘टेफलॉन कोटेड’ मनमोहन सिंह पर संप्रग तो क्या राजग भी उंगली उठाने में सावधानी बरतता रहा। फिर भी घोटालों के चक्रवात में पीएमओ की प्रतिष्ठा को खासा धक्का लगा है।


राष्ट्रमंडल खेल और आदर्श सोसाइटी घोटाले तक तो गनीमत रही, लेकिन पौने दो लाख करोड़ रुपये के 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने प्रधानमंत्री पद के इकबाल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। सीएजी की रिपोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों ने संप्रग सरकार के साढ़े छह साल के कार्यकाल में पीएमओ की साख को भी लहूलुहान किया। संयुक्त संसदीय दल गठन की मांग पर संसद का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। आजादी के बाद पहली बार संसद एक भी दिन न चलने का अनचाहा रिकार्ड भी संप्रग के खाते में गया। विश्वसनीयता के गहराते संकट का ही नतीजा है कि प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी लिखकर लोक लेखा समिति के सामने हाजिर होने जैसी अभूतपूर्व पेशकश तक करनी पड़ी है।



राजग के अलावा अन्य विपक्षी दल भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस तरह सान चढ़ा रहे हैं उससे कांग्रेस का ‘आम आदमी’ भी असमंजस में है। सरकार पर शक जितना गहरा रहा है, आम जनमानस का विश्वास भी अब उतना ही दरक रहा है। कांग्रेस व सरकार के प्रवक्ताओं के इन तर्को को मान भी लिया जाए कि राजग का कार्यकाल घोटालों से पटा हुआ है तो इससे संप्रग को ईमानदारी का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता। सुप्रीम कोर्ट ने 2 जी घोटाले की जांच 2001 से कराने के निर्देश भी दिए हैं। यह बिल्कुल ठीक भी है। राजग के राज में अगर घोटाले हुए हैं तो उसकी सच्चाई भी सामने आना जरूरी है। कर्नाटक में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा को कठघरे में खड़ा करना और 2 जी भ्रष्टाचार के केंद्र में रहीं नीरा राडिया के राजग सरकार से रिश्तों का खुलासा करना उसका सियासी पैंतरा तो हो सकता है, लेकिन अपने बचाव का तर्क नहीं। यूपीए सरकार को बहुमत का संकट भले न हो, लेकिन गठबंधन के पुराने सहयोगियों के बीच पनप रहा अविश्वास चिंता का विषय जरूर है। एक साल पीछे जाएं तो गठबंधन के साथी कतार बांधे कांग्रेस के पीछे समर्थन का कटोरा लिए खड़े थे। साल के खात्मे के साथ ही स्थिति यह हो गई है कि प्राय: सभी सहयोगी न केवल अपने समर्थन की पूरी कीमत वसूल चुके हैं, बल्कि कुछ सहयोगी तो कांग्रेस की आंख और साख की किरकिरी साबित हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी नीतिगत मसलों पर यूपीए सरकार को कई बार असहज स्थिति में डाल चुकी हैं। यहां तक कि कांग्रेस महसचिव राहुल गांधी का भूमि अधिग्रहण विधेयक इस साल लाने का वादा भी ममता की जिद की भेंट चढ़ गया।


संप्रग-दो में कमजोर होने के बावजूद एनसीपी सुप्रीमो और कृषि मंत्री शरद पवार महंगाई में आग लगाने वाले अपने बयानों से सरकार के लिए पूरे वर्ष संकट पैदा ही करते रहे। आम आदमी के रसोई से जुड़े प्याज के दाम यकायक बढ़ने को भी पीएमओ सहज नहीं मान रहा है। यूपीए के अंदर अघोषित रूप से गैर कांग्रेसी दलों के गुट की धुरी बने पवार की सियासी चालों से कांग्रेस खासी आशंकित है। द्रमुक की ए. राजा को दूरसंचार मंत्री बनाए रखने की जिद ने तो खैर प्रधानमंत्री की साख को ही चोट पहुंचाई है। जाहिर है कि सहयोगी दलों के साथ भी कांग्रेस के रिश्तों में विश्वास का संकट तारी हो रहा है। यह ठीक है कि कई नए सहयोगी समर्थन देने के लिए कतार में लगे हैं। इसके बावजूद संप्रग के स्वरूप में कोई भी रद्दोबदल सरकार की सेहत के लिए कितना ठीक होगा, यह खुद उसके संकटमोचक भी नहीं समझ पा रहे हैं।


बीते साल कई मौकों पर न सिर्फ सरकार और संगठन के मतभेद सतह पर आए, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी मनमुटाव के स्पष्ट संकेत मिले। वहीं, सरकार के मंत्रियों के बीच भी कई नीतिगत सवालों पर मतभेद सतह पर आए। यहां तक कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनएसी के सदस्यों और पीएमओ के अधिकारियों के बीच खाद्य सुरक्षा विधेयक पर खींचतान छिपी नहीं रही। बार-बार दोहराने के बावजूद प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल में नए चेहरों को जगह नहीं दे सके तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को महाधिवेशन बिना ‘नई टीम’ के करना पड़ा।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को नए मुकाम तक ले जाने का सेहरा अपने सिर बांधने की हसरत भी संप्रग पूरी न कर सका। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट के लिए अब तक सबसे आक्रामक अभियान छेड़ा गया। परिषद के स्थायी सदस्य पांचों देशों अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और इंग्लैंड के प्रमुखों ने इसी साल भारत का दौरा किया। चीन को छोड़कर चारों देशों ने यूएनएससी में स्थायी सीट पर भारत की दावेदारी पर मुहर भी लगाई। मगर साल के आखिर में विकिलीक्स के खुलासे में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की टिप्पणी ने पूरे अभियान को चोट पहुंचाई। अपनी स्थापना के 125वें साल में कांग्रेस और संप्रग सरकार विश्वसनीयता के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। साल के आखिर में कांग्रेस का महाधिवेशन हिंदू कट्टरपंथ और भ्रष्टाचार पर सफाई का मंच मात्र बनकर रह गया। नए साल की शुरुआत में कांग्रेस को पहली अग्निपरीक्षा आंध्र प्रदेश में देनी होगी। पृथक तेलंगाना और बागी जगनमोहन फैक्टर से कांग्रेस कैसे उबरेगी, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक बात तय है कि भ्रष्टाचार का बेताल कंधे से उतारना उसके लिए 2011 में भी आसान नहीं होगा।


[प्रशांत मिश्र: लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक है]

Source: Jagran Yahoo

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