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काइरो की चिंता, कराची पर मौन

Posted On: 7 Feb, 2011 Others में

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भारत में काइरो के लोकतांत्रिक आंदोलन को समर्थन दिए जाने का सेक्युलर फैशन जोर पकड़ रहा है, यह समझे बिना कि संभवत: होस्नी मुबारक मिस्र के अंतिम सेक्युलर तथा उदार हृदय शासक होंगे तथा लोकतांत्रिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहा मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन मिस्र को तालिबानीकरण की ओर ले जा सकता है। दूसरी ओर हम अपने पड़ोस में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार हनन पर इसलिए खामोशी ओढ़े रहते हैं, क्योंकि वे हिंदू हैं। जब पिछले सप्ताह पाकिस्तान से सिंध विधानसभा के विधायक राम सिंह सोढो अपनी जान बचाने के लिए भारत में शरण लेने चले आए तो कहीं न तो अफसोस हुआ न ही किसी राजनीतिक पार्टी ने इस पर आवाज उठाई। राम सिंह सोढो पाकिस्तान मुस्लिम लीग पार्टी के सदस्य थे और पाकिस्तान में प्रचलित पृथक निर्वाचन क्षेत्र पद्धति के अंतर्गत हिंदू मतदाताओं द्वारा सिध विधानसभा के लिए कराची के पास दिलीप नगर मिठी से चुने गए थे। पाकिस्तान में हिंदू सामान्य सीटों से चुनाव नहीं लड़ सकते। वे केवल अपने हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में समेट लिए गए हैं जहा उन्हें मजबूरन मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों की शरण में जाकर अपने लिए राजनीतिक जगह ढूंढ़नी पड़ती है। मुख्यत: राजस्थान से लगे इन क्षेत्रों में सोढा राजपूत आज भी रहते हैं।


पाकिस्तान में हिंदू गुलाम से भी बदतर जिंदगी जीने पर मजबूर हैं। कराची, लरकाना, मिठी जैसे इलाकों में हिंदू स्त्रियां बाजार जाते हुए बिंदी नहीं लगातीं, घर तक में उन्हें मगलसूत्र पहनने में डर लगता है। कराची के शिव मंदिर के पुजारी को मैंने स्वय मुस्लिम अ‌र्द्धचंद्राकार टोपी पहने देखा। वह इस्लामी रंग-ढंग और पहनावे में ही स्वय को सुरक्षित समझते हैं। मंदिरों में लाउडस्पीकर पर जागरण या आरती करना मना है। हिंदुओं की बेटियों का अकसर अपहरण कर लिया जाता है और जबरन निकाह कर देते हैं। बलूचिस्तान में गिने-चुने हिंदू बचे हैं। कुछ दिन पहले वहा के 82 वर्षीय सर्वोच्च धार्मिक नेता महाराज लखमी चद गरजी का अपहरण कर लिया गया था। अभी तक पाकिस्तान पुलिस उन्हें ढूंढ़ नहीं पाई है। बलोच मुस्लिम परंपरा से हिंदुओं का साथ देते आए हैं, लेकिन जबसे जमाते इस्लामी जैसे सगठनों का प्रभाव बढ़ा है अन्य क्षेत्रों से आए तालिबान हिंदुओं के अपहरण और उनसे फिरौती मागने के अपराध अधिक करने लगे हैं। हिंदू नेता मुखी राधेश्याम तथा ताराचद डोंबकी ने कहा कि अगर महाराज लखमी चद को जल्दी ही सही सलामत नहीं लाया गया तो बलोच हिंदू पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि केवल दिसंबर, 2010 में ही 27 हिंदू परिवारों ने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग के पास शरण के आवेदन दिए हैं। सैकड़ों हिंदू परिवार राजस्थान सीमा से जान पर खेलकर भारत में प्रवेश कर गए हैं और वे भारत सरकार से यहां की नागरिकता देने की गुहार लगा रहे हैं।


भारत में यह सेक्युलर राजनीति तथा बौद्धिक अहंकार की जीत कही जानी चाहिए कि हिंदू होते हुए भी विभिन्न सगठनों तथा शासन के उच्च पदों पर बैठे हिंदू संपूर्ण दक्षिण एशिया में हिंदू-हनन की स्थिति पर खामोशी ओढ़े रहते हैं। राजनीतिक कारणों से हिंदू नेताओं के आह्वान अथवा आदोलन की अपील का वैसा असर नहीं होता जैसा पहले होता था। हिंदुओं का जो हाल पाकिस्तान में है उससे बदतर बांग्लादेश में है, जहां लगभग एक करोड़ हिंदुओं के होते हुए भी आज तक एक भी हिंदू को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया। हिंदुओं के अपहरण, उनकी जमीन और मकानों पर कब्जे, स्त्रियों से बलात्कार और हत्याएं बाग्लादेश के अखबारों में आम समाचार बन गए हैं। विडंबना तो यह है कि इस परिस्थिति के बारे में हिम्मत से लिखने वाली एक लेखिका तस्लीमा नसरीन भारत में ही तिरस्कृत तथा अपमानित की जाती हैं। नेपाल में हिंदू राष्ट्र की स्थिति खत्म करने के बाद माओवादी आतंकवादियों के निशाने पर हिंदू जनसंख्या, उनकी परंपराएं तथा धार्मिक रीति-रिवाज ही रहे, जबकि यहां विश्वव्यापी ईसाई संगठन बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का मतांतरण करने में लगे हैं।


जो भारत अपने ही देश में हिंदू सवेदनाओं एव आस्था की रक्षा करने में नाकाम सिद्ध हो रहा हो वह पड़ोसी देशों के हिंदुओं की रक्षा कैसे कर सकता है? इसके लिए हिंदुओं का आपसी विद्वेष, एक-दूसरे को गिराने में जीवन खपाने की परंपरा तथा असगठन दोषी है। कोई दो हिंदू नेता या विद्वान एक-दूसरे को सहन नहीं कर सकते। हिंदुओं में सुधारवादी आदोलन के बजाय जातिवाद, कालवाह्य रूढि़यां, धार्मिक पाखंड और राजनीतिक-सामाजिक अस्पृश्यता का बोलबाला है। हिंदू मंदिरों में गंदगी तथा रूढि़यां आज भी विद्यमान हैं। मिर्चपुर में वंचित हिंदुओं पर अत्याचार जैसी घटनाएं होती हैं। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की धार्मिक अनुष्ठानों एव मंदिरों में सहभागिता आज भी बहस का विषय बन जाती है तथा उच्च जाति का अहंकार रखने वाले हिंदू किसी न किसी बहाने से वंचितों को अलमारी में सजावटी वस्तु की तरह रखने के तरीके ढूंढ लेते हैं। हिंदू शब्द को आतकवाद से जोड़कर उसे अपमानित करने वाले मुसलमान नहीं, हिंदू नेता ही हैं। लोकतंत्र, सर्वपंथ समभाव तथा बहुलतावाद की रक्षा के लिए हिंदू विचारधारा एवं बहुसंख्या की रक्षा अनिवार्य है। तभी मानवीय आधार पर हर मजहब और संप्रदाय को मानने वाले व्यक्ति के मौलिक मानवाधिकार एव धार्मिक स्वतंत्रताएं सुरक्षित की जा सकती हैं।


[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं]

Source: Jagran Nazariya

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