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सत्ता का शर्मनाक आचरण

Posted On: 6 Jun, 2011 Others में

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बाबा रामदेव का अनशन आरंभ होने से पहले अन्ना हजारे ने कहा था कि सरकार ने उन्हे धोखा दिया है और वह बाबा रामदेव को भी धोखा देगी। अब रामदेव का बयान भी यही है कि सरकार ने उन्हे धोखा दिया है। वर्तमान समय में किसी सरकार का ऐसा दमनकारी आचरण अकल्पनीय है। हरिद्वार पहुंचने के बाद रामदेव को बिलखते देखने वाले यह कल्पना कर सकते हैं कि उनके साथ क्या हुआ होगा? विडंबना देखिए, 5 जून को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन संपूर्ण क्राति की वर्षगांठ मनाई जाती है। निश्चित तौर पर सरकार के मत्री, पुलिस और प्रशासन के व्यवहार ने आपातकाल की सिहरन भरी यादें ताजा कर दी हैं। तब पुलिस ने रातोंरात विपक्ष के नेताओं को बदी बना लिया था। उन पर ऐसी धाराएं लगाई गईं, मानो वे देशद्रोही हों। हम स्वामी रामदेव के सभी विचारों से सहमत हों या न हों, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने देश के लिए आवाज उठाई और जो रास्ता अपनाया था उसमें कानून का भी उल्लंघन नहीं था।


सच यह है कि इस समय देश में काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर आम जन में तीव्र आक्रोश है। रामदेव के अभियान से केवल उसका प्रकटीकरण हुआ है। लोकतात्रिक सरकार को उसका सम्मान करना चाहिए था। उन्होंने अगर सरकार के खिलाफ हिंसक सघर्ष का आह्वान किया होता तब राज्य के ऐसे आचरण के खिलाफ देशव्यापी तीव्र क्षोभ एव आक्रोश का वातावरण नहीं बनता। एक शत-प्रतिशत अहिंसक सत्याग्रह को हिंसा से कुचलने वाली सरकार को लोकतात्रिक नहीं कहा जा सकता है। सरकार का रवैया आतक पैदा करने वाला है। सविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा सरकार का प्राथमिक दायित्व है और यह स्वीकार करने में किसी सविधानविद् को आपत्ति नहीं है कि केवल रामदेव नहीं, उनका साथ देने वाले सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों को रौंदा गया है। आतक के राज्य का इससे ज्वलत नमूना कुछ नहीं हो सकता। बाबा की मागें क्या थीं? काले धन को राष्ट्रीय सपत्ति घोषित किया जाए, भ्रष्टाचारियों को फासी की सजा हो तथा उनके मुकदमे की निश्चित समयसीमा के अंदर सुनवाई पूरी हो, शिक्षालयों में अध्ययन राष्ट्रीय या स्थानीय भाषा में दिया जाए आदि। इनमें भ्रष्टाचारियों को फासी की सजा हो या न हो, उस पर तो मतभेद हो सकता है, लेकिन शेष मुद्दों पर देश में आम सहमति है। इस दृष्टि से सरकार का अनशन को जबरन बद करने और लोगों को पीटकर वहा से बाहर करने का आचरण आम जनता की सामूहिक चाहत के विरुद्ध है। आपने अपना दायित्व नहीं निभाया और जब दायित्व की याद दिलाने के लिए कोई कानून की सीमा में रहते हुए खड़ा हुआ तो उसे कुचल डाला!


लोग इस कारण भी हैरत में हैं कि कुछ घटे पहले तक समझौते के लिए बाबा से बातचीत करने वाली सरकार अचानक क्यों बौखला गई? क्या इसका अर्थ यह है कि सरकार के वरिष्ठ मत्री षड्यंत्रकारी रणनीति के तहत रामदेव से बातचीत कर रहे थे? बातचीत के बाद मत्रियों के बयान से यह सदेश निकल रहा था कि सरकार उनकी मागों से लगभग सहमत हैं। रामदेव ने भी अपने बयान में इसका सकेत दिया था कि बातचीत सही दिशा में चल रही है। अगर सहमति थी तो फिर इस प्रकार अर्धरात्रि के बाद पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस प्रश्न का उत्तर पूरा देश जानना चाहेगा। अगर असहमति भी थी तो भी इस प्रकार के व्यवहार का कोई आधार नहीं हो सकता। रामदेव के साथ हुई तथाकथित सहमति का पत्र जारी करने का एकमात्र कारण यह हो सकता है कि उनकी छवि धूमिल कर उनका जन समर्थन घटाया जाए एव समर्थको में फूट डालकर उन्हें कमजोर किया जाए। अगर यह सच है तो फिर इसे साजिश के सिवा और क्या कहा जा सकता है? रामदेव के साथ धरने पर बैठे लोगों के खिलाफ दंगा, सरकारी सपत्ति नष्ट करने, सरकारी कार्य में बाधा डालने का मुकदमा किया गया है। पुलिस ऐसा सामान्यत: करती है, लेकिन सवाल यह है कि दंगा आदोलनकारियों ने फैलाया या सरकारी मशीनरी ने? यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सोनिया गाधी की सहमति के बगैर ऐसी कार्रवाई हुई होगी। इस प्रकार इसे सरकार के साथ काग्रेस पार्टी की सम्मिलित कार्रवाई कह सकते हैं। आपातकाल के समय भी सरकार एव काग्रेस में भेद ढूंढना मुश्किल था। आश्चर्य इस बात का है कि काग्रेस एव सरकार में अनुभवी नेताओं के होने के बावजूद ऐसी कार्रवाई हुई है।


वस्तुत: यह अंदर से डरी हुई और अपने भविष्य को लेकर आशकित सत्ता का आचरण है। माना जाता है कि 1975 में इंदिरा गाधी ने भी भय मनोविज्ञान के तहत ही आपातकाल लागू किया था। भयग्रंथि की शिकार सरकार से मानवीय गरिमा की रक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती है। देश में काला धन एव भ्रष्टाचार ही नहीं, महंगाई को लेकर सरकार के खिलाफ जो खीझ है उसके कारण इसका भयग्रस्त होना स्वाभाविक भी है। ऐसी सरकार देश के लिए घातक साबित होगी। जाहिर है, सरकार के इस बर्बर रवैये की केवल निदा पर्याप्त नहीं है, इसका सक्रिय विरोध होना चाहिए। जो सरकार किसी के लोकतात्रिक अधिकारों के सम्मान के बजाय उसका दमन करती है, किसी नागरिक की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकती, न्यायसगत माग को स्वीकार करने की बजाय उसे हिंसक शक्ति से कुचलने का अपराध करती है, वह शासन का नैतिक अधिकार खो बैठती है। केवल यह कहकर चुप बैठना उचित नहीं कि सरकार ने अपनी कब्र खोदने की शुरुआत कर दी है। इसकी निदा तक सीमित रहना भी उचित नहीं। हमें, आपको यह तय करना है कि ऐसी सरकार के साथ एक सजग नागरिक के रूप मे हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए।


[अवधेश कुमार: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

साभार: जागरण नज़रिया

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