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सैद्धांतिक साहस की परीक्षा

Posted On: 16 Jun, 2010 Others में

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राजनीति में सत्ता में आने के लिए गठबंधन-धर्म का प्रचलन बहुत पुराना नहीं है। यह भारत में पनपा, स्थाई भाव को प्राप्त हुआ तथा हमारे पुराने शासकों के देश पहुंच गया है। वहां गठबंधन सरकार बनी है। भारत की बात और है। यहां गठबंधन-धर्म के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता है सत्ता में बने रहने के लिए। पर जब बहस छिड़ती है तब जाति का सहारा लिया जाता है। सरकार खामोश बनी रहती है। गठबंधन के बाहर रहकर जाति आधारित दल बिना मांगे समर्थन देकर वह सब करा लेते हैं जो उनके अपने हित में होता है। जाति आधारित पार्टियां तेजी से पनपीं और सत्ता में आई। उन्हें राजनीति में बने रहने के लिए जनगणना में जाति विशेष की संख्याओं का सहारा संबल बनेगा। उन्होंने दबाव डाला और सरकार ने लगभग मान लिया कि इस बार जनगणना में जाति पूछी जाएगी। विश्लेषक तथा शोधकर्ताओं को अनायास ही सोने की खान मिल जाएगी। राजनीति में नए समीकरण निकलेंगे, लेकिन इस निर्णय के दूरगामी परिणामों पर बहस कम ही हो रही है।

 

इस समय देश में 65 का जो आयु वर्ग है उसने जाति प्रथा का जो भीषण रूप देखा है वह आज के 18-20 के आयु वर्ग के अधिकांश युवाओं को आश्चर्यचकित कर देगा। पिछले छह दशकों में बहुत कुछ बदला है, मगर उसके पहले के छह दशकों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट होगा कि महात्मा फुले, गांधी, अंबेडकर तथा अनेक अन्य मनीषियों ने क्या कुछ देखकर, अनुभव कर और परिणामों की कल्पना कर जाति प्रथा को जड़मूल से समाप्त करने के भागीरथी प्रयास आरंभ किए थे। स्वतंत्र भारत की उनकी संकल्पना में जाति-विहीन समाज तथा सबके लिए शिक्षा सबसे अग्रणी थे। राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व में चला था, उस समय जाति प्रथा समाप्त करना कठिन है, परंतु आवश्यक है, ऐसा सभी मानते थे। कितने ही निर्णयों तथा बहसों का संदर्भ इस स्वीकृति के समर्थन में दिया जा सकता है। संविधान सभा में आंखें खोल देने वाली बहस हुई।

 

यह कल्पना करना भी कठिन है कि गांधी, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना आजाद के सिद्धांतों पर चलने का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी अपने आंतरिक चिंतन से नहीं, वरन बाहरी दबाव में यह मानने को विवश हुई है कि जनगणना में जाति जानी जाएगी और आने वाली पीढि़यां उसके भयावह परिणाम भुगतने को बाध्य होंगी। सरहद पर जब सिपाही वीर गति को प्राप्त होता है तब अध्यापक अपने विद्यार्थियों को बतलाता है कि उन्होंने अपना जीवन इसलिए न्यौछावर कर दिया ताकि नई पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रहे। आज के अधिकांश राजनेता अपना आज सुरक्षित करने के लिए नई पीढ़ी का अर्थात देश का कल भविष्य दांव पर लगाने में पलक भी नहीं झपकाते हैं।

 

1950 में उत्तर प्रदेश के बिलग्राम कस्बे में जिस प्राइमरी स्कूल में मैं पढ़ने गया वहां एक सहपाठी सबसे अलग बैठता था, यानी बैठाया जाता था। मुझे सभी ने बता दिया था कि उससे दूर रहना है। जाति की बात जो थी। उसका चेहरा और उस पर के भाव आज भी मेरे जेहन में ताजे हैं-अपमान, तिरस्कार तथा प्रताड़ना का वह दौर बड़े पैमाने पर खत्म हो चुका है। ग्यारह वर्ष एक क्षेत्रीय संस्थान के प्राचार्य पद पर रहते हुए बचपन के उस त्रासद अनुभव एवं अवलोकन ने रास्ता दिखाया किसी विद्यार्थी के साथ रंचमात्र भी वैसा कुछ न हो। युवाओं की नई पीढ़ी पूर्ण सहयोग कर रही है। स्वार्थपरक राजनीति इस प्रवाह को विपरीत दिशा में मोड़ने में पहला कदम उठा रही है-जनगणना में जातीय विभेद की जानकारी लेकर।

 

यदि 1951 की जनगणना में जाति पूछी जाती तो अनेक लोग अपनी जाति को थोड़ा ऊपर उठाकर लिखाते। इसमें उनकी वह इच्छा स्वरूप ले लेती कि वह जिस वर्ग में डाल दिए गए हैं, जिसमें पीढि़यों से बंधे हैं, उससे मुक्त हो सकें। 2011 में इसका ठीक उल्टा होगा। लोग उस वर्ग में जाएंगे जहां आरक्षण मिल रहा है या मिलने की संभावना है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों तक पर गलत जातिगत प्रमाण देने के आरोप लग चुके हैं। 1960 के आसपास बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में चर्चाओं में सभी आश्वस्त दिखते थे कि जाति प्रथा समाप्ति की ओर अग्रसर है। उस समय यह सोच पाना भी कठिन था कि जाति आधारित राजनीतिक दल न केवल बनेंगे, वरन देश की राजनीति की दिशा बदल देंगे। कल्पना कीजिए कि भारत के सभी विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में छात्र संघों के चुनाव जातीय आधार पर होने लगें। सूचना के अधिकार के अंतर्गत कुलपतियों तथा प्राचार्यो को जातिगत आधार पर संख्याएं बतानी पड़ें और संभावित प्रत्याशी उन्हीं समीकरणों के आधार पर मैदान में उतारे जाएं। कितना अन्याय करेंगे हम इसी पीढ़ी के साथ, कैसा भविष्य देंगे उन्हें?

 

जनगणना संबंधी निर्णय का सबसे अधिक घातक प्रभाव तो नई पीढ़ी को झेलना पड़ेगा। सामाजिक सद्भाव घटेगा, हर स्थान, व्यवस्था में जाति हावी होगी। नेता यह मांग भी करेंगे कि पाठ्य पुस्तकों में जाति विशेष का उचित वर्णन नहीं है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी-कांग्रेस के पास सिद्धांत आधारित राजनीति को आगे बढ़ने का अभूतपूर्व अवसर है-जाति संबंधी निर्णय को बदलकर वह ऐतिहासिक साहस का उदाहरण प्रस्तुत कर सकती है। यदि ऐसा न हुआ तो राहुल गांधी के उभरने के समय वह उसी स्तर का निर्णय होगा जैसा राजीव गांधी के समय शाहबानो प्रकरण में हुआ था। सैद्धांतिक साहस के परखने का अवसर सामने है।

Source: Jagran Yahoo

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