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आरएसएस का बुनियादी संकट

Posted On: 19 Jan, 2011 Others में

संपादकीय ब्लॉगजन-जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे, राष्ट्र की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाले विचार, संवेदना की धरातल पर विमर्श की गुंजाइश को जनम देता ब्लॉग

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तात्कालिक लाभ के घटिया मानकों से संचालित राजनीति के दौर में यह समझ में आता है कि कांग्रेस स्वामी असीमानंद की गवाही को खूब प्रचारित रही है। असीमानंद कथित तौर पर उग्रवादी हिंदू कार्यकर्ता है। वह संदिग्ध आतंकी के रूप में हिरासत में हैं। विवादित इटालियन ओत्रेवियो क्वात्रोची के साथ कांग्रेस आलाकमान के संबंधों और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष के हमले झेल रही कांग्रेस बदले के मौके की ताक में थी। एक मजिस्ट्रेट के समक्ष असीमानंद की गवाही के मीडिया में उछलते ही पार्टी को इस संबंध में अधकचरी बातें फैलाने का मौका मिल गया। यद्यपि ऐसा नहीं लगता कि इससे भ्रष्टाचार और आर्थिक कुप्रबंधन से ध्यान हटाने में वह कामयाब हो जाएगी।


कांग्रेस ने इस बेहूदा आकलन पर ‘हिंदू आतंक’ को मुद्दा बनाने का फैसला लिया है कि इससे मुस्लिम समुदाय को भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से विमुख करने में सफल हो जाएगी। वह भूल रही है कि मुसलमान भी महंगाई का उतना ही दंश झेल रहे है जितना कि हिंदू। निश्चित तौर पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह मुसलमानों के भयादोहन का पुरजोर प्रयास कर रहे है। उदाहरण के लिए 26/11 पर प्रकाशित एक किताब का दिग्विजय सिंह प्रचार कर रहे है, जिसमें मुंबई आतंकी हमले के लिए यहूदी षड्यंत्र को जिम्मेदार ठहराने जैसे अविश्वसनीय और बेहूदे आरोप लगाए गए है। इस आग्रह को विश्वसनीय बताते हुए और अयोध्या फैसले पर ठंडी प्रतिक्रिया के आधार पर वह मान बैठे है कि हिंदू की पहचान के मुद्दे पर मतदाताओं की लामबंदी की कोई संभावना नहीं है।


हिंदू आतंक का हौव्वा खड़ा करने के गंभीर निहितार्थ है। शुरुआत के तौर पर असीमानंद की इस स्वीकारोक्ति को फर्जी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता कि हैदराबाद की मक्का मस्जिद में विस्फोट मामले में एक मुस्लिम लड़के को गलत तरीके से फंसाने से वह द्रवित हो गए थे। हिंसा के रास्ते पर चलने वाली बहुत सी पंथिक विभूतियों की तरह असीमानंद भी आंख के बदले आंख की नीति को नैतिक वैधानिकता प्रदान करने में यकीन रखते थे। वृहत्तर षड्यंत्र में भागीदारी की घोषणा करने के गंभीर कानूनी परिणामों से वह भलीभांति परिचित थे। फिर भी उन्होंने आंखों देखी सच्चाई बयान करने का फैसला लिया। यद्यपि असीमानंद की स्वीकारोक्ति को मीडिया में उछालने पर सवाल खड़े होते है, फिर भी उनके द्वारा बयान किए गए घटनाक्रम को फर्जी नहीं बताया जा सकता है। असीमानंद की गवाही उग्रवादी हिंदू राष्ट्रवादियों की सोच को उजागर करती है, जो यह मानते है कि मुसलमानों को कष्ट पहुंचाकर वे राष्ट्र की सेवा कर रहे है। यह प्रतीत होता है कि दो अलग-अलग षड्यंत्र रचे जा रहे थे। पहला अभिनव भारत गुट द्वारा, जिसकी शुरुआत तो खुफिया जानकारी इकट्ठा करने से हुई थी, लेकिन अंत एक कुत्सित अभियान से हुआ। दूसरा षड्यंत्र सुनील जोशी गुट रच रहा था, जिसमें कथित तौर पर आरएसएस से जुड़े लोग मौजूद थे। अभिनव भारत का मालेगांव धमाकों में हाथ था और मक्का मस्जिद व अजमेर शरीफ दरगाह धमाकों में जोशी का हाथ होने का अंदेशा है।


असीमानंद दोनों गुटों को जानते थे और वैचारिक प्रेरणा के समान बिंदु नजर आते है, किंतु इस संपर्क के अलावा दोनों समूहों में कटुता और शत्रुता थी। दोनों में आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार जरूर एक साझा सूत्र थे। लगता है पुरोहित और उनके सहयोगी इंद्रेश कुमार को आइएसआइ एजेंट मानते थे और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की हत्या के विचार से असहमत नहीं थे। असीमानंद की गवाही से संकेत मिलता है कि इंद्रेश कुमार का जोशी गिरोह के साथ गहरा नाता था और वह उनकी गतिविधियों को चलाने में सहयोग देते थे।


पिछले दिनों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सूरत में बयान दिया था कि उग्रवादी तत्वों ने या तो खुद ही आरएसएस से किनारा कर लिया या फिर वे संगठन से निकाल दिए गए। कट्टरपंथी तत्वों के लिए आरएसएस में कोई स्थान नहीं है। अभिनव भारत के रिकॉर्ड को देखते हुए भागवत का दावा विश्वसनीय लगता है। इस गिरोह के सदस्य अब भी आक्रामक हिंदू राष्ट्रीयता की वकालत कर रहे है। हालांकि इंद्रेश के मामले में आरएसएस में महत्वपूर्ण पद पर विराजमान होने के कारण राजनीतिक बदले की भागवत की बात गलत लगती है। विभिन्न गवाहियों से यह बात साबित हो जाती है कि इंद्रेश के उन लोगों के साथ गहरे ताल्लुकात है, जो आतंक को इस्तेमाल करने में संकोच नहीं करते।


समुचित साक्ष्यों के बिना यह मानना गलत होगा कि इंद्रेश किसी भी आतंकी समूह के मास्टरमाइंड थे या फिर वे इनके लिए सुविधाएं ही जुटा रहे थे। हालांकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह बेहद संदिग्ध लोगों के साथ घुले-मिले हुए थे। लगता है कि इंद्रेश लापरवाह थे। उनका साथ देने के आरएसएस के फैसले के पीछे वफादारी का आधार हो सकता है, किंतु जनता उन्हे उसी उदारता और अनुग्रह की निगाह से नहीं देखती। इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस को एक छड़ी मिल गई है, जिससे वह आरएसएस और भाजपा, दोनों की पिटाई कर सकती है। 2004 के आम चुनाव के बाद से भाजपा में आरएसएस से दूरी बनाने की आवाजें उठ रही है। दुर्भाग्य से, आरएसएस के दबाव में ये आवाजें मुखर नहीं हो पाई है। आरएसएस की इस भागीदारी से राजनीतिक विकृति पैदा हो गई है, जिसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है। खुद अपनी सलामती के लिए आरएसएस को सर्वप्रथम अपना घर ठीक करना पड़ेगा। तभी भाजपा को पिटने से बचाया जा सकता है।


[स्वप्न दासगुप्ता: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

Source: Jagran Nazariya

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