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मुंहतोड़ जवाब से बनेगी बात

Posted On: 22 May, 2012 Others में

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पिछले दिनों छत्तीसगढ़ और ओडिशा में कुछ महत्वपूर्ण लोगों के अपहरण और उसके बदले अपने कैद साथियों की रिहाई का जो खतरनाक खेल नक्सलियों ने खेला, उससे उनका मनोबल बेहिसाब बढ़ गया है। हाल ही में उन्होंने जो भारत बंद का ऐलान किया और किसी हद तक झारखंड में उसका प्रभाव भी देखा गया, असल में वह उनका मनोबल बढ़ने का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। भारत बंद के उनके ऐलान को दूसरी घटनाओं की तरह हलके ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए। इसके मूल में उनकी एक गहरी चाल हो सकती है, यह जताने की कि अब उनका असर राष्ट्रीय स्तर तक हो चुका है। यह अलग बात है कि उनकी उपस्थिति देश के एक-चौथाई हिस्से में भी नहीं है, लेकिन सरकार जिस तरह ढुलमुल नीति अपना रही है और सख्ती बरतने से बच रही है, वह उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। देश में आंतरिक सुरक्षा की कमजोर हालत और किसी भी तरह के आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार की ढुलमुल नीतियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि निकट भविष्य में हम उन्हें बढ़ने से पूरी तरह रोक सकेंगे। लूट, फिरौती और लेवी के साथ-साथ समानांतर अदालतें लगाने और निर्दोष लोगों को बंधक बनाने या उनकी हत्याएं करने जैसे कृत्यों को तो नक्सली अंजाम दे ही रहे हैं, उनका दुस्साहस भी बेहिसाब बढ़ चुका है। पिछले दिनों दैनिक जागरण ने झारखंड में चलाए जा रहे अपने विशेष अभियान और कितना वक्त चाहिए झारखंड को के तहत नक्सली संगठनों से कुछ सवाल किए थे। उनके दुस्साहस का आलम यह है कि भाकपा (माओवादी) ने बाकायदा पुस्तिका छाप कर उन सवालों के जवाब दिए हैं।


नक्सलियों के प्रति नजरिया बदलें


आश्चर्यजनक तरीके से इस पुस्तिका में उन्होंने अपने सभी कृत्यों को जायज ठहराया है। वे दावा करते हैं कि आम जनता के सर्वागीण विकास के लिए उनके संगठन का एक व्यवस्थित कार्यक्रम है। इसमें राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक सभी पहलू मौजूद हैं। हो सकता है कि अपवाद स्वरूप कुछ लोग उनके इस दावे के बहकावे में आ गए हों, लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी स्वेच्छा से उनके साथ नहीं है। जो आम नागरिक किसी भी तरह से नक्सलियों का साथ दे रहे हैं, वे अपने विवेक से नहीं, केवल दबाव में साथ दे रहे हैं। इनमें भी ज्यादातर अपने जान-माल के भय से उनकी हां में हां मिला रहे हैं। दबाव की अपनी इसी रणनीति के तहत कभी तो वे आम जनता से चुनाव के बहिष्कार की अपील जारी कर देते हैं और कभी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों पर उनके पद से इस्तीफा दे देने के लिए दबाव बनाते हैं। इसके एक ताजे उदाहरण ओडिशा के विधायक झिन्न हिकाका हैं। हिकाका ने माओवादियों की कैद में रहते हुए उनके दबाव में कह भी दिया था कि वे छूटते ही अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। बेशक रणनीतिक रूप से उन्होंने यह अच्छा ही किया और छूटने के बाद इस्तीफा न देने की घोषणा कर उन्होंने और भी अच्छा किया। बहुत हद तक संभव था कि अगर माओवादियों की कैद में रहते हुए हिकाका उनकी बात न मानने की जिद पर अड़े होते तो वे उन्हें छोड़ते ही नहीं या उनकी हत्या भी कर देते। क्योंकि जो लोग पहले ही संविधान और कानून के दायरे से बाहर हो चुके हों और अराजकता पर उतारू हों, उनकी नीयत पर भरोसा तो नहीं ही किया जा सकता। हालांकि लौटकर उन्होंने इस फैसले पर अमल भी किया होता तो यह खतरनाक होता। इससे यह संदेश जाता कि उनका आतंक हमारी संवैधानिक मर्यादाओं से भी ऊपर उठकर सरकार के सिर चढ़कर बोलने लगा है।


हिकाका के सामने रखी गई माओवादियों की इस शर्त को सामान्य अर्थो में नहीं लिया जाना चाहिए। ऐसी शर्ते वे दूसरी जगहों पर भी रख चुके हैं। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के कई निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने नक्सलियों के दबाव में इस्तीफा दे दिया। जिन लोगों ने इस्तीफा नहीं दिया, उनमें से कई को नक्सलियों की गोलियों का शिकार होना पड़ा। क्या इसे सिर्फ नक्सलियों द्वारा अपना प्रभाव स्वीकार करवाने की कवायद के अर्थ में ही लिया जाना चाहिए? नहीं, वास्तव में यह उनकी एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। वे हमसे ही यह स्वीकार करवाना चाहते हैं कि हमारी अपनी बनाई लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारी ही आस्था नहीं रह गई है। निश्चित रूप से अगर वे कुछ अन्य जगहों पर भी ऐसा करने में सफल हो गए तो यह हमारी बहुत बड़ी हार होगी। इनका फरमान न मानने वाले पंचायत जनप्रतिनिधियों की हत्या को भी सिर्फ हत्या के अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए। असल में यह भी जनतंत्र पर गन तंत्र का खौफ साबित करने की उनकी साजिश का ही हिस्सा है। नक्सलियों की ऐसी उत्पात बढ़ने की आशंका अब बहुत अधिक बढ़ गई है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इनके आदर्श चीन के माओत्से तुंग हैं। माओ का सिद्धांत खून-खराबा करके सत्ता पर काबिज होना रहा है। इनकी भी यही घोषित नीति है और लोकतंत्र में इनकी कोई आस्था नहीं है। वे यह भूल रहे हैं कि भारत अपने मूलभूत स्वरूप में एक लोकतांत्रिक देश है। शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली हजारों वर्षो से हमारे संस्कार में है। आम भारतीय को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के मामले में बरगला पाना उनके लिए कभी संभव नहीं होगा, दबाव की बात अलग है। लेकिन लोग किसी तरह के आतंकी दबाव में आकर अपनी आस्था न बदलें, इसके लिए सरकार को उन्हें सहयोग और संरक्षण देना होगा। न केवल केंद्र, बल्कि राज्य सरकारों को भी इस मामले में पूरी तरह और नए सिरे से सतर्क हो जाना चाहिए।


केंद्र और सभी राज्यों को मिलकर न केवल नक्सलवाद, बल्कि हर तरह के आतंकवाद से लड़ने के लिए एक साझा नीति बनानी चाहिए। सच तो यह है कि ऐसी नीति बनाने की कोशिशें कई बार हुई हैं, लेकिन हर ऐसी कोशिशें क्षुद्र स्वार्थो की बलि चढ़ गई हैं। इसीलिए हमें बार-बार अराजक तत्वों के सामने झुकना पड़ता है और यह खतरनाक है। ध्यान रहे, अगर यह एक रोग है तो इसका कुछ न कुछ इलाज भी जरूर होगा। बहुत हद तक संभव है कि वह इलाज कड़वा हो तो फिर हमें उसका कड़वापन बर्दाश्त करना ही होगा। इस मामले में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर रे से सबक लेना चाहिए। उनके समय में नक्सली बंगाल में सिर नहीं उठा सके थे। हाल ही में छत्तीसगढ़ में अपने जिलाधिकारी के बदले कोई कैदी न छोड़ने की जो रणनीति रमन सिंह ने अपनाई, वह भी अनुकरणीय है। केंद्रीय स्तर पर आतंकवाद से लोहा लेने के लिए इंदिरा गांधी के शासन को हमेशा याद किया जाएगा। हमें अपनी ही परंपरा में मौजूद दृढ़ व्यक्तित्व वाले राजनेताओं से सबक सीखना चाहिए और नक्सलियों एवं अन्य आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी करनी चाहिए। अमेरिका और इजराइल जैसे देशों से भी इस मामले में काफी कुछ सीखा जा सकता है। चाहे कैसी भी स्थिति आए, वे अराजक तत्वों की शर्तो के आगे झुकते नहीं देखे जाते हैं। यही रणनीति भारत को भी अपनानी होगी।


लेखक निशिकांत ठाकुर दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं


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