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नैतिक सत्ता की गिरती प्रतिष्ठा

Posted On: 7 Mar, 2011 Others में

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मनमोहन सिह ने जम्मू में अपने वक्तव्य में पीजे थॉमस को केंद्रीय सतर्कता आयोग में लाने की पूरी जिम्मेदारी ओढ़कर पन्ना धाय के चरित्र का निर्वाह किया। सत्ता के गलियारों की राजनीति पर नजर रखने वाले जानते हैं कि थॉमस की नियुक्ति 10 जनपथ के कहने पर हुई थी, लेकिन डॉ. मनमोहन सिह ने एक बार फिर पुन: सोनिया गांधी पर आने वाली आंच खुद झेल ली। ऐसा ही क्वात्रोची के मामले में किया गया, जिसे 41 करोड़ रुपये रिश्वत में देने का प्रमाण स्वय सरकार के आयकर प्राधिकरण ने दिया। संप्रग ने सत्ता में आते ही क्वात्रोची के लंदन स्थित खाते को विमुक्त कर 21 करोड़ रुपए उसे ले जाने दिए। जिस क्वात्रोची की सोनिया गांधी के निवास में निर्बाध पहुंच थी, प्रधानमंत्री निवास की आगमन पुस्तिका में 21 बार जिसके आने का रिकार्ड दर्ज हुआ, उसे बोफोर्स खरीद में रिश्वत देने की जरूरत क्यों थी, इस प्रश्न का भी किसी ने जवाब मागने का साहस नहीं दिखाया। यद्यपि इस समय जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं उनमें परोक्षत: 10 जनपथ का दखल महसूस किया जाता है, लेकिन ‘भले और निष्प्रभावी’ प्रधानमंत्री को छोड़कर कोई असली सत्ता-सूत्रधार से प्रश्न तक करते हुए घबराता है।


अब कर्नाटक के विवादास्पद राज्यपाल हंसराज भारद्वाज द्वारा अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक विवाद सुलझाने में एक गैर सरकारी सगठन की अध्यक्षता का लाभ उठाने का मामला सामने आया है। उनका पुत्र भी इसी सस्था का आजीवन सदस्य है। हंसराज भारद्वाज भी सीधे 10 जनपथ के वफादार हैं, पर उन्हें भी बचाने का दायित्व निभाना पड़ेगा प्रधानमंत्री को। गत 4 मार्च को जम्मू में एक राष्ट्रीय शोकांतिका को बड़े उत्सवी जलसे के रूप में मनाया गया। प्रधानमत्री ने कश्मीरी हिंदू शरणार्थियों के लिए एक बड़ी आवासीय कालोनी जगती का उद्घाटन किया। अपने ही देश में तिरंगे के प्रति वफादारी निभाने के ‘गुनाह’ में यदि राष्ट्रीय नागरिक अपने घरों से उजाड़ दिए जाएं तो उनको ससम्मान वापस घर भेजने के बजाय उन्हें शरणार्थी कालोनी में फ्लैट देने वाले प्रधानमंत्री की हिम्मत की प्रशसा करें क्या? जिस देश और समाज में अनाचार के विरुद्ध गुस्सा मर जाए वहां फिर किसी चाणक्य को नंद के कुशासन के विरुद्ध शिखा खोलनी पड़ती है। केवल क्वात्रोची के विरुद्ध मामला दफन करने का अकेला मुद्दा ही इस सरकार की अनैतिक प्रभुता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त था, लेकिन ऐसे पचास से अधिक मामले एक वर्ष से कम समय में ही सामने आए हैं। इन सभी मामलों में या तो सरकार ने गुनहगारों को छोड़ा है-जैसे क्वात्रोची के विरुद्ध सीबीआइ से मामले वापस करवाना अथवा सर्वोच्च न्यायालय के दबाब में उसने कार्रवाई की-जैसे थामस और हसन अली के मामले में।


यदि थॉमस की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय रद्द नहीं करता तो सोचिए यह सरकार अपनी जिद में उनको पद पर बनाए ही रखती। इस देश का सौभाग्य है कि यहां सुषमा स्वराज जैसी विपक्षी नेता हैं, जिन्होंने पहले दिन से ही थामस को सतर्कता आयुक्त के पद हेतु अपात्र माना था। जिस हसन अली का 60 हजार करोड़ से अधिक काला धन विदेशी बैंकों में जमा है उसे तब तक यह सरकार लाल कालीन पर दुलराती रही जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार पर तमाचा जड़ते हुए कहा-‘व्हाट द हेल इज गोइंग आन?’ आखिर यह क्या बखेड़ा आप कर रहे हैं? साधारण नागरिकों के प्रदर्शन पर गोली चलाने वाली सरकार देश का धन लूटने वालों के प्रति नरमी क्यों अपना रही है? देश के सबसे बड़े आर्थिक अपराधी हसन अली को तो सरकार ने हिरासती पूछताछ तक के लिए नहीं बुलाया। पिछले सप्ताह मैंने राज्यसभा में भारतीय नौसेना द्वारा अमेरिका के 35 से 40 वर्ष पुराने रद्दी हेलीकाप्टर खरीदने का मामला उठाया था, जो 182 करोड़ रुपये की लागत से खरीद कर नए नौसैनिकों के प्रशिक्षण हेतु इस्तेमाल किए जाने थे। इनमें खामिया पाईं गई और नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक ने इस खरीद पर गभीर सवाल खड़े किए। सरकार निर्लज्जता ओढ़े रही। सामान्य जनता में यह विश्वास उठता जा रहा है कि उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचारियों को कभी सजा मिलेगी। उन्हें चुनाव टिकट मिल सकते हैं, वे केंद्रीय मत्री या प्रांतीय मुख्यमत्री बन सकते हैं, मजबूरन जेल भेजे जाने पर भी उनकी शाही आवभगत होना लाजिमी होता है और कुछ दिन बाद वे वापस राजनीति में आ जाते हैं।


परिपक्व और उत्तरदायी लोकतात्रिक सरकारें किस प्रकार व्यवहार करती हैं, इसका एक ताजा उदाहरण जर्मनी के रक्षा मत्री कार्ल थियोडोर गुटेनबर्ग की बर्खास्तगी का है। वह जर्मनी के सबसे लोकप्रिय ‘स्टार’ मत्री थे, लेकिन 1 मार्च को उनसे इसलिए इस्तीफा लिया गया, क्योंकि गुटेनबर्ग की पीएचडी की थीसिस के कुछ हिस्से दूसरे लेखक से चुराए हुए पाए गए। अब देखिए गुटेनबर्ग ने राजनीति में प्रवेश से पहले पीएचडी की उपाधि ली थी, मामले में राज्य को कोई वित्तीय हानि नहीं हुई, मत्री के नाते उन पर कोई भी आरोप नहीं लगा, इसके बावजूद नैतिक व्यवहार के उल्लंघन का उन्हें दोषी पाकर रक्षा मत्री पद से मुक्त कर दिया गया।


क्या भारत में इस प्रकार के उदाहरण की कोई कल्पना भी कर सकता है? हमारी सभ्यता, संस्कृति की महानता का प्रमाण हमारे सामान्य जन के व्यवहार से अधिक श्रेष्ठ पदों पर बैठे लोगों के व्यवहार में दिखना चाहिए, लेकिन हो उल्टा रहा है। यह 9 प्रतिशत विकास दर, लोकतंत्र का बखान, आइटी प्रगति का दंभ-सब कुछ तब तक खोखला है जब तक भारत अपनी नैतिक सत्ता की खो चुकी प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त नहीं करता।


[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

साभार: जागरण नजरिया

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