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देश को चिढ़ाने वाला दर्शन

Posted On: 17 Apr, 2012 Others में

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Rajeev Sachanकिसी मुख्यमंत्री के लिए इससे अधिक अपमानजनक और कुछ नहीं हो सकता कि उसे अपने बारे में ऐसा कुछ अखबारों में पढ़ने को मिले कि यदि उसने ठीक से काम नहीं किया तो उसे हटाया जा सकता है। पता नहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने यह खबर पढ़ी या नहीं, लेकिन बीते शनिवार को तमाम अखबारों में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से यह छपा, मुख्यमंत्री का पद प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने के समान नहीं है, जहां फैसले लेने की जरूरत नहीं होती। इस खबर के अनुसार, नाम नहीं बताने की शर्त के साथ एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि चव्हाण के उत्तराधिकारी के लिए पहले ही तलाश शुरू हो चुकी है और नेतृत्व अगले दो-तीन महीने में मुख्यमंत्री के कामकाज पर विचार करेगा। सच्चाई जो भी हो, लेकिन आज के जमाने में इस तरह का बर्ताव कार्यालय सहायक कहे जाने वाले चपरासियों से भी नहीं किया जाता और जो ऐसा करते हैं वे किस्म-किस्म की उपाधियों से नवाजे जाने के कारण कुख्यात हो जाते हैं। चूंकि उक्त खबर में चव्हाण को आगाह करने वाले नेता का नाम नहीं दिया गया था कि इसलिए लोग यह अनुमान लगाने को मजबूर हुए कि यह कौन रहा होगा? ये महाशय कोई भी रहे हों, लेकिन यह तय है कि उन्हें सोनिया और राहुल गांधी का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होगा। इससे इंकार नहीं कि कांग्रेस की असली ताकत सोनिया और राहुल गांधी ही हैं और पार्टी एवं सरकार में उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं खड़क सकता, लेकिन इन दोनों नेताओं का नेतृत्व संगठन और सरकार को सही दिशा में ले जाने की गारंटी भी नहीं।


आज यह कहना कठिन है कि ये दोनों नेता सरकार के काम में कितना दखल देते हैं, लेकिन अब हर किसी के लिए यह कहना आसान हो गया है कि केंद्र सरकार किसी काम की नहीं रही। केंद्र सरकार देश पर बोझ बन गई है। वह केवल अनिर्णय से ही नहीं ग्रस्त है, बल्कि पूरी तौर पर अपंग हो गई है। वह काम करने और फैसले लेने का दिखावा करने तक सीमित है। केंद्र सरकार की अपंगता का ताजा प्रमाण औद्योगिक उत्पादन के गलत आंकड़े जारी होना है। इससे इस धारणा पर मुहर लग गई कि सरकार के दायें हाथ को ही नहीं पता कि उसका बायां हाथ क्या कर रहा है। इससे शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता कि गलत आंकड़े जारी हो जाएं और उन्हें जारी करने वाले गफलत से अनजान रहें। यह पहली बार नहीं है। इसके पहले आयात के और उसके पहले सकल घरेलू उत्पाद संबंधी गलत आंकड़े जारी हो चुके हैं। हालांकि मनमोहन सिंह आर्थिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्र यानी अर्थव्यवस्था को लेकर ही सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। देश से अधिक सवाल विदेश में उठ रहे हैं, खासकर तबसे जबसे सरकार ने कर संबंधी कानूनों में पिछली तिथि से संशोधन करने का फैसला किया है। वोडाफोन मामले में लिया गया यह फैसला दुनिया भर में भारत की बदनामी ही नहीं करा रहा, बल्कि निवेशकों को भयभीत करने का भी काम कर रहा है।


अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की साख रसातल में जा रही है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में धांधली और फिर इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उपजे हालात भी भारत की बदनामी करा रहे हैं। जिन विदेशी कंपनियों की पूंजी फंस गई है वे पूछ रही हैं कि हमारा क्या कसूर था? सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं, क्योंकि वह यह नहीं कह सकती कि उसके नाकारापन के चलते स्पेक्ट्रम आवंटन में धांधली हुई। करीब-करीब हर मोर्चे पर केंद्र सरकार की नाकामी के चलते कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि आर्थिक उत्थान की भारत की गौरव गाथा का सुनहरा अध्याय खत्म होने को है। यदि इस स्थिति के लिए मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं तो इसमें सोनिया और राहुल गांधी का भी योगदान है। हैरत यह है कि तमाम विपरीत स्थितियों के बावजूद प्रधानमंत्री समस्याओं का आनंद उठा रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक बार फिर यह कहा कि यदि समस्याएं न रहें तो जीवन का आनंद ही खत्म हो जाएगा। नि:संदेह जीवन समस्या विहीन नहीं हो सकता, लेकिन जब देश समस्याओं से घिरा हो और आम जनता की समस्याएं बढ़ती चली जा रही हों तब उनका आनंद उठाने का उपदेश देना एक तरह से उसे गर्म तवे पर बैठाना है।


प्रधानमंत्री का यह दर्शन देश को चिढ़ाने वाला है। ऐसा लगता है कि जो दर्शन मनमोहन सिंह का है वही सोनिया और राहुल गांधी का भी है। शायद इन्हें भी यह लगता है कि समस्याएं खत्म हो जाएंगी तो जीवन का आनंद जाता रहेगा। यदि ऐसा कुछ नहीं है तो फिर इसका कोई कारण नहीं बनता कि सरकार के साथ-साथ संगठन भी अनिर्णय से ग्रस्त नजर आए। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से उत्तर प्रदेश, पंजाब और गोवा में हार के कारणों की जिस तरह समीक्षा हुई उससे यह नहीं लगता कि कांग्रेस अपनी कमियों को दूर कर पाने में सक्षम होगी। कांग्रेस जिन राज्यों में मजबूत हैं वहां कमजोर होती जा रही है और जहां कमजोर हैं वहां उसकी हालत और पतली हो रही है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन एक कारण इसलिए सहज समझा जा सकता है, क्योंकि कई राज्यों में नेतृत्व का चयन अधर में लटका हुआ है। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पार्टी की कमान ऐसे नेताओं के हाथ है जो घोषित रूप से पार्टी अध्यक्ष नहीं है। फिलहाल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा में भी यही स्थिति है। जिन राज्यों में पार्टी की कमान घोषित अध्यक्षों के हाथ में है वहां जारी कलह थमने का नाम नहीं ले रही है। आखिर यह क्यों न माना जाए कि सोनिया और राहुल गांधी को सरकार के साथ-साथ संगठन की भी परवाह नहीं है या फिर उन्हें उसकी समस्याएं नजर ही नहीं आ रही हैं?


लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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