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बच्चों पर अत्याचार का सिलसिला

Posted On: 22 Feb, 2012 Others में

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दिल्ली में बीते हफ्ते एक बच्चे को बेचने के प्रयास में स्वयं उसके पिता के अलावा तीन महिलाएं भी पकड़ी गई हैं। इसके पहले दो एनजीओ संचालिकाएं भी यहां इसी आरोप में पकड़ी जा चुकी हैं। अभी तक एम्स में इलाज के अधीन चल रही कोमल का मामला भी मुख्य रूप से खरीद-फरोख्त से ही जुड़ा हुआ है। यह बच्ची अभी भी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं। जाहिर है, देश की राजधानी अब बच्चों का व्यापार करने वाले गिरोह का अड्डा बनती जा रही है। बच्चे यहां किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं रह गए हैं। जब राष्ट्रीय राजधानी की यह स्थिति हो तो बाकी देश में हालत क्या होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारी सरकारें बचपन को संवारने के क्रम में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। आए दिन नए-नए कानून, नई-नई योजनाओं और परियोजनाओं की घोषणाएं होती रहती हैं। घोषणाओं पर गौर करें तो ऐसा लगता है जैसे देश की सभी सरकारों की केंद्रीय चिंता का विषय ही बच्चे हैं। यह अलग बात है कि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है।


आखिर ऐसा क्यों है? दिल्ली में यह स्थिति अकेले बच्चों की ही हो, ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि यहां जो भी कमजोर है उसकी स्थिति बेहद दयनीय है। चाहे वह स्त्री हो या बच्चा, या बुजुर्ग या फिर किसी अन्य तरह से कमजोर व्यक्ति। आए दिन होती दुष्कर्म की घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि दिल्ली में महिलाओं के साथ कैसा सलूक होता है। अकेले रहने वाले बुजुर्गो के घरों में लूट और बाद में हत्या की घटनाएं भी होती ही रहती हैं। ऐसा तब है, जबकि यहां पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां भी निरंतर सक्रिय रहती हैं। इसके बावजूद कमजोर लोगों पर अत्याचार की ये सभी घटनाएं हो रही हैं। क्या यह माना जाए कि यहां अराजक तत्वों के हौसले बहुत बढ़े हुए हैं? जिनके हाथ में ताकत है, वे जो चाहें कर सकते हैं? अगर पूरी तरह नहीं तो भी काफी हद यह बात तो सही लगती है। इसके उदाहरण इन घटनाओं में ही नहीं, अक्सर होने वाले रोडरेज में भी देखे जा सकते हैं। जो किसी भी तरह से मजबूत है, उसे मामूली बात पर भी सामने वाले पर हाथ छोड़ते देर नहीं लगती। जब निरंकुशता की यह स्थिति है तो फिर कानून के शासन की बात क्यों की जाती है? बच्चों के ही मामले को लें तो यह मान लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बच्चों की सुरक्षा के लिए कई तरह के कानून बने होने के बावजूद ऐसा कोई अत्याचार नहीं है जो उन पर न हो रहा हो।


सरकार के तमाम दावों के बावजूद पूरे शहर में बाल श्रम का शोषण होते देखा जा सकता है। यहां बच्चे सिर्फ कामकाज में लगे हों, ऐसा नहीं है। वे यहां खतरनाक कोटि के काम में भी लगे हुए हैं। हजारों की संख्या में बच्चे यहां कूडे़ बीनते देखे जा सकते हैं। कूड़ा बीनना अपने-आप में एक खतरनाक काम है। बच्चे क्या बड़े भी यह नहीं जानते कि कूड़े के ढेर से वे जो चीज उठा रहे हैं, वह वास्तव में क्या है। देश के विभिन्न हिस्सों में कबाड़ और कूड़े में विस्फोट के कई हादसे हो चुके हैं। दिल्ली भी ऐसी घटनाओं से अछूती नहीं है। भला मासूम बच्चे कूड़े के ढेर में किसी विस्फोटक पदार्थ पहचान कैसे कर सकेंगे? लेकिन आज तक उन बच्चों के लिए कुछ सार्थक किया गया हो, ऐसा सतह पर दिखाई नहीं देता। बच्चों से कानूनी और गैर कानूनी हर तरह के काम कराए जा रहे हैं। यह सब होते हुए पुलिस, प्रशासन और राजनेता सभी लगातार देख रहे हैं। विभिन्न धार्मिक स्थलों के आसपास की जगहों से लेकर बाजारों में, सड़कों पर और गली-मुहल्लों में कहीं भी बच्चों को भीख मांगते देखा जा सकता है। क्या हमारी सरकार भीख मांगने को एक समादृत काम मानती है? अगर नहीं तो इसे रोकने के इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? बच्चों का भीख मांगना कोई सामान्य बात नहीं है। इसके पीछे कई बड़े गिरोह हैं। ये गिरोह बच्चों से केवल भीख मंगवाने का ही काम नहीं करते हैं। ये बच्चों के अपहरण से लेकर उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रूप से अक्षम बनाने और फिर उन्हें विभिन्न अवैधानिक एवं गंदे कार्यो में लगाने तथा उनकी कमाई पर अपना हक जमाने तक के जघन्य अपराधों को अंजाम देते हैं। इन गिरोहों के खिलाफ कोई गंभीर प्रयास हुआ हो, ऐसा दिखाई नहीं देता है।


सिर्फ कानून बना देना और किसी अपराध के खिलाफ सजाएं निर्धारित कर देना ही किसी समस्या का समाधान नहीं है। अगर इतने से समस्याएं हल हो जातीं तो योजनाएं और परियोजनाएं बनाने तथा उन पर अमल करने की कोई जरूरत ही नहीं होती। किसी सामाजिक या आर्थिक समस्या का समाधान हो सके, इसके लिए पूरी व्यवस्था बनाए जाने की जरूरत है। बालश्रम, बच्चों के शोषण या उनके खरीदे-बेचे जाने जैसी बीभत्स स्थितियां सिर्फ सामाजिक समस्याएं नहीं हैं, इनके मूल में गहरे आर्थिक कारण भी हैं। अगर सरकार वास्तव में इन समस्याओं का समाधान करना चाहती है तो पहले उसे उन समस्याओं के समाधान ढूंढ़ने होंगे। सिर्फ दावे और नारेबाजी से देश का काम नहीं चलेगा। इसके लिए व्यवस्थाएं बनानी होंगी और वह भी केवल फाइलों तक सीमित नहीं, जमीनी स्तर तक। बालश्रम के खिलाफ कानून तो बना दिए गए, लेकिन उनका कहीं अनुपालन हो रहा है या नहीं, इसके लिए निगरानी तक का कोई प्रबंध नहीं किया गया। जहां उनका अनुपालन नहीं हो रहा है, उन जगहों की छानबीन और धरपकड़ की कोई व्यवस्था नहीं बनाई गई। अगर वास्तव में सरकार इसे एक गंभीर समस्या मानती है और इसका समाधान वह करना चाहती है तो इसके लिए उसे पूरी कार्ययोजना तैयार करनी होगी। यह कार्ययोजना केवल बालश्रम या किसी भी तरह से शोषण के शिकार हो रहे बच्चों को शोषण करने वालों के चंगुल से छुड़ाने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके दायरे में उनके पुनर्वास की व्यवस्था भी आनी चाहिए।


पूरे देश में जिस तरह बड़ी संख्या में बच्चे शोषण और अत्याचार के शिकार हो रहे हैं, उनके पुनर्वास का आसान नहीं है। एक साथ पूरे देश में यह काम किया भी नहीं जा सकता है। इसे चरणबद्ध रूप से करना होगा। इस बात का ध्यान भी रखना होगा कि जहां कहीं भी और जिस तरह से भी इनके पुनर्वास की व्यवस्था बनाई जाए वहां निरंतर आय के कुछ स्रोत बनाए जाएं। ऐसा न हो कि वे पूरी तरह केवल सरकारी अनुदान पर ही निर्भर रह जाएं। इतनी आमदनी की व्यवस्था उनके पास होनी चाहिए जिससे वे अपने यहां रहने वाले बच्चों को उचित शिक्षा देने, उनकी परवरिश और वयस्क हो जाने पर उन्हें रोजगार देने का इंतजाम कर सकें। अगर गंभीरता से सोचा जाए यह काम मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। एक कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस दिशा में सोचे और करे।


लेखक निशिकांत ठाकुर दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं


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