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दिखावे की राजनीति

Posted On: 8 Apr, 2014 Others में

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जागरण मुद्दा

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कायदा

संसद के निम्न सदन यानी लोकसभा के सदस्यों के लिए चुनावी महासमर में पूरा देश नहाया हुआ है। नौ चरणों वाले चुनावी यज्ञ में अपने मतों की आहुति से लोग इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरा करेंगे। सभी राजनीतिक दल ज्यादा से ज्यादा सीटें पाने के लिए हर तरह की रणनीति अपना रहे हैं। आगामी 16 मई को नतीजों के साथ यह तय हो जाएगा कि किस राजनीतिक दल में लोगों ने अपना भरोसा जताया है। चुनाव में जिस राजनीतिक दल को बहुमत हासिल होगा, उसके नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। इस तरह से देश को एक नया प्रधानमंत्री मिलेगा। लोकसभा के चुनाव में कुछ राजनीतिक दल अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा पहले ही कर देते हैं। कुछ विद्वान और ऐसा न करने वाले दल या ऐसा न करने का दिखावा करने वाले दल इसे विधि सम्मत नहीं मानते हैं। उनकी दलील है कि इससे चुने गए सांसदों के अधिकारों का उल्लंघन होता है। यानी चुने गए सांसद ही तय करते हैं कि उनका नेता या प्रधानमंत्री कौन हो सकता है। ऐसे में चुनाव पूर्व ही इस पद के उम्मीदवार की घोषणा कैसे की जा सकती है।


कवायद

संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था तो यही है कि लोकसभा में बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री बने, लेकिन अगर कोई दल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को घोषित करके चुनाव लड़ता है तो इससे तो लोकतंत्र को और मजबूती मिलती है। लोग अपने भावी प्रधानमंत्री की खूबियों और खामियों को अच्छी तरह से समझ सकेंगे। आखिरकार प्रधानमंत्री देश का कार्यकारी प्रमुख होता है। अंतरराष्ट्रीय जगत में वह देश का प्रतिनिधित्व करता है, लिहाजा उसकी विचारधारा, दृष्टिकोण, शख्सियत, नेतृत्व क्षमता जैसे तमाम गुणों का जनता आकलन भी कर सकेगी।


कोशिश

नफा-नुकसान दोनों की पर्याप्त संभावनाओं वाली इस रणनीति पर जो दल अंगुली उठाते हैं, शायद उनकी तार्किकता इस खुलेपन पर कुंद दिखती है। वह यह तो दिखावा करते हैं कि उनके यहां सब लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत चल रहा है, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि अंदरखाने सब कुछ तय होता है। किसको क्या बनना है और किसको क्या पद दिया जाना है। महज औपचारिकता निभाने जैसी कवायद है यह। चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा पर एतराज जताने वाले दल शायद अवसरवादिता का नायाब उदाहरण पेश करते दिखते हैं। सबसे बड़ा लोकतंत्र इसका गवाह रहा है। माहौल उनके पक्ष में बना हुआ है, बयार उनके समर्थन में बह रही है तो चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी। तब उन्हें इस परंपरा में खोई खोट नहीं नजर आता लेकिन जब हालात जुदा हैं, परिस्थितियां विपरीत हैं, जनमानस उनसे अकुलाया हुआ है तो सिद्धांत और नीति की बात करते हैं। ऐसे पाखंडी आचरण से तो यह खुलापन ही बेहतर है। ऐसे में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए इन दलों के पाखंडी आचरण को जनमानस के सामने लाना आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।


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