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हितों का टकराव

Posted On: 24 Mar, 2014 Others में

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जागरण मुद्दा

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गठबंधन ‘शेयरधारकों’ का ऐसा समूह होता है जो इसलिए साथ आते हैं ताकि अपने लाभ के लिए सत्ता और संसाधनों का दोहन कर सकें।


अब यह माना जाने लगा है कि अपने दम पर एक पार्टी के जीतकर सरकार बनाने का युग समाप्त हो गया है और इस कारण कई समूह, धड़े या नेता एक साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाएंगे। अतीत में मोरारजी के नेतृत्व में जनता पार्टी (1977-79), वीपी सिंह एवं चंद्रशेखर की सरकार (1989-91), संयुक्त मोर्चा (1996-98), राजग (1998-2004) और संप्रग (2004-14) की सरकारें गठबंधन वाली ही थीं। यही कहानी 16 मई, 2014 को चुनावी नतीजों की घोषणा वाले दिन भी दोहराई जाएगी। गठबंधन सरकारें अगर ‘मानक’ बन गई हैं तो उसके पीछे कारण यह है कि जनता अपने ‘विकल्पों’ को खंडित तरीके से चुन रही है। ऐसे में गठबंधन निर्माण की प्रक्रिया का विश्लेषण करने के लिए अतीत पर गौर करना होगा क्योंकि चुनाव बाद भी कुछ वैसा ही माहौल बनेगा जिसके कि अतीत में हम गवाह रह चुके हैं।


इसके तहत सबसे पहले चुनाव अभियान शुरू होने से पहले गठबंधन बनना शुरू होते हैं। पिछले वर्षों की तरह कांग्रेस का शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से गठबंधन है तो भाजपा का शिवसेना और अकाली दल से गठबंधन है। एक गैर कांग्रेस और गैर भाजपाई दलों का गठबंधन भी हमेशा चुनाव से पहले बनाने का प्रयास किया जाता है। इस बार भी 11 दलों ने मिलकर ऐसा प्रयास किया है। यद्यपि इसको झटका भी लगा है क्योंकि चुनाव से पहले ही यह बिखर भी गया है। वास्तव में चुनाव पूर्व ‘गठबंधन’ साझा विरोधियों को चुनावों में हराने के लिए किया जाता है। इसलिए कांग्रेस-राकांपा, भाजपा-शिवसेना-अकाली दल समेत ऐसे सभी दल जो चुनाव से पूर्व गठबंधन कर रहे हैं, वे वास्तव में अस्थाई होते हैं। दरअसल इसके माध्यम से केवल चुनाव तक कुछ सीटों पर सहयोगी के साथ समझौता कर लिया जाता है। यह एक तरह का ‘गतिमान’ समझौता होता है। इसलिए चुनावी नतीजों के बाद गठबंधन बनने की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है। इसलिए चुनाव पूर्व गठबंधनों में कोई शुद्धता नहीं होती और इस कारण नतीजों के बाद उनका विभाजन हो जाता है। अब सवाल उठता है कि चुनाव बाद बनने वाले इन गठबंधनों का अतीत में अनुभव कैसा रहा है?


पहला, अतीत में केंद्र में बनने वाली ऐसी गठबंधन सरकारों में एक खास बात यह रही है कि यह शासन का गठबंधन था। गठबंधन के रूप में जनता पार्टी की सरकार बेहद अस्थिर रही और अगले दो सालों में मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह इसके प्रधानमंत्री बनने के साथ ही यह प्रयोग विफल होकर ताश के पत्तों की तरह इसलिए ढह गया क्योंकि उनमें कोई समानता नहीं थी। इसी तरह वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकारों का पतन इसलिए हो गया क्योंकि आतंरिक रूप से वे विभाजित थे। एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल ‘बाहरी’ समर्थन के दम पर कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री बन सके। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से साफ संदेश निकला कि सभी पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे थे। यहां यह कहना भी उचित होगा कि हिंदुत्ववादी संघ परिवार ने भी अपनी शक्ति को केंद्रित किया और जिस भाजपा को सांप्रदायिक मानते हुए ‘अछूत’ समझा जाता था, उसको खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ मानने वाले दलों ने समर्थन देकर राजनीति में ‘स्वीकार्य’ बना दिया। जॉर्ज फर्नांडीज, नीतीश कुमार, शरद यादव, चंद्रबाबू नायडू, द्रमुक और अन्नाद्रमुक सभी भाजपा के साथ सत्ता में एक साथ रहे। अब संप्रग की सरकार में भी ऐसे कई समूह या पार्टियां हैं जो अटल की सरकार में भी सरकार में मौजूद थी। इससे सबक यह निकलता है कि चुनाव बाद जो गठबंधन बनते हैं उनमें पार्टियां एकसूत्रीय ढंग से अधिकाधिक निजी लाभ लेकर मंत्री पद पाने की जुगत में रहती हैं।


गठबंधन सरकारों का भारतीय अनुभव कहता है कि यहां पार्टियां सिद्धांतों या विचारधारा के संघर्ष की वजह से साथ नहीं छोड़ती बल्कि गठबंधन में शामिल अन्य सहयोगियों से ‘उपजे हितों के संघर्ष’ के कारण छोड़ती है। कुल मिलाकर गठबंधन ‘शेयरधारकों’ का ऐसा समूह होता है जो इसलिए साथ आते हैं ताकि अपने लाभ के लिए सत्ता और संसाधनों का दोहन कर सकें। यदि किसी पार्टी या समूह को लगता है कि यदि कोई दूसरा ज्यादा बढ़िया ऑफर दे रहा है तो वे अपने मौजूदा खेमे को छोड़कर उसके साथ चले जाते हैं। इस प्रकार पिछले बीस वर्षों में एक से निकलकर दूसरे गठबंधन में जाने की वजह ‘वैचारिक संघर्ष’ नहीं होकर ‘लाभ’ लेने की प्रवृत्ति है। इसी के तहत कोई दल या समूह गठबंधन में शामिल होता है या ‘वैकल्पिक व्यवस्था’ खोजता है।


यदि सभी गठबंधन सरकारों में अवसरवाद का यही नंगा यथार्थ दिखता है तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस तरह की सरकारों में प्रत्येक दल या समूह का नेता ‘फायदे’ के लिए अपने ‘एजेंडे’ को तरजीह देता है। चाहे जिसकी सरकार हो सभी धड़े अपने लिए ‘फंड के संग्रह’ में व्यस्त रहे। इस कारण ऐसी सरकारों में भ्रष्टाचार बढ़ता है क्योंकि हर कोई शक्तियों के दुरुपयोग के जरिये केवल अपने लिए अधिकाधिक फंड जुटाने की जुगत में रहता है। इस प्रकार गठबंधन में जितने अधिक दल शामिल होंगे, भ्रष्टाचार का दायरा भी उतना बड़ा होगा क्योंकि हर एक को अपना हिस्सा चाहिए। इन सबका एक खामियाजा यह होता है कि सरकार की निर्णय प्रक्रिया प्रभावित या लंबित होती है क्योंकि जिस भी दल या नेता का हित या निर्वाचन क्षेत्र उससे प्रभावित होता है, वह उसके खिलाफ ‘वीटो’ कर देता है। इसके साथ ही गठबंधन में शामिल सभी समूहों का मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व होता है, उसके चलते 70 मंत्रियों की बड़ी कैबिनेट होती है। इससे भी अक्षमता, विलंब और भ्रष्टाचार बढ़ता है। इन सब कारणों के चलते गठबंधन सरकारों के दौर में केंद्र सरकारें निर्णायक रूप से कमजोर हुई हैं। कैबिनेट का प्रभाव कमजोर हुआ है क्योंकि हर नेता केवल अपने पृथक समूह का प्रतिनिधित्व करता है। सहयोगियों के बीच किसी भी मसले पर ‘सर्वसम्मति’ नहीं बन पाती। प्रधानमंत्री संपूर्ण कैबिनेट का नेता नहीं बन पाता क्योंकि विभिन्न नेता अपने धड़ों का अलग से प्रतिनिधित्व करते हैं। ममता बनर्जी ने अटल बिहारी और मनमोहन सिंह सरकारों को परेशानी में डाला क्योंकि वह अपने समूह के नेता के नाते अपने बारे में सोचती थीं। इससे केंद्रीय सत्ता कमजोर और विभाजित रही।


इस आलेख के लेखक प्रो सीपी भांबरी हैं.

(एमेरिशस फेलो, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)


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