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सौदेबाजों का किया जाए बहिष्कार

Posted On: 24 Mar, 2014 Others में

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जागरण मुद्दा

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अगर अपने जनतंत्र को बचाना है तो चुनाव के बाद ऐसे दल जो सौदेबाजी करके समर्थन की बैसाखी देने का भरोसा देते हैं, उनका बहिष्कार बहुत जरूरी है।


बहुत साल पहले प्रख्यात राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी ने इस मत की स्थापना की थी कि भारतीय जनतंत्र एक राजनीतिक दल (कांग्रेस) के प्रभुत्व पर आधारित प्रणाली या व्यवस्था है। तब से अब तक हमारे राजनीतिक जीवन में इतने उतार चढ़ाव आ चुके हैं कि यह ‘वेदवाक्य’ निरर्थक लगता है। आपातकाल के बाद केंद्र में पहली बार न केवल गैरकांग्र्रेसी सरकार का गठन हुआ बल्कि भानुमती के बेमेल कुनबे जैसे एक गठबंधन ने सत्ता ग्रहण की। यह प्रयोग सफल नहीं रहा और 1980 में इंदिरा गांधी की नाटकीय वापसी से यह लगने लगा कि देश स्थिर और शांत किसी एक पार्टी के स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के शासन में ही रह सकता है। इसके पहले सूबों में गैर कांग्रेसी संविद सरकारों ने भी मतदाता को निराश ही किया था। इंदिरा की हत्या के बाद राजीव प्रचंड बहुमत से कांग्रेसी सरकार बनाने में कामयाब हुए, पर 1989 में बोफोर्स के घोटाले के आरोपों के कारण हार के बाद फिर साझा सरकारें मंच पर प्रकट हुईं। अंतर्विरोधों से ग्रस्त ये सरकारें एक बार फिर टिक ना सकीं और 1991 में कांग्र्रेस लौटी लेकिन इस बार बहुमत में नहीं। कुर्सी बचाने के लिए नरसिंह राव ने जिन शर्मनाक हथकंडों का सहारा लिया उसकी याद दिलाने की जरूरत नहीं पर अब तक यह शनि संकेत मिलने लगे थे कि भविष्य में चुनावी अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए खरीद फरोख्त का नया युग आरंभ होने ही वाला है। नरसिंह राव ने बदनामी के साथ ही विदा ली पर उनके गैर कांग्रेसी उत्तराधिकारियों ने सरकार बनाने के लिए उन्हीं की तरह के सौदे समझौते करना ‘आपत्धर्म-राजधर्म’ मान लिया। अपना पांचसाला कार्यकाल पूरा करने वाली राजग हो या संप्रग इनका स्वरूप साझा सरकार का ही रहा है। इसे नकारना कठिन है कि निकट भविष्य में भी हमें खंडित-विभाजित जनादेश के ही दर्शन हो सकते हैं और त्रिशंकु संसद की संभावना प्रबल है। ऐसी स्थिति में चुनाव के पहले और चुनावी नतीजे आने के बाद संपन्न गठबंधनों के बारे में बहस छेड़ना अब टाला नहीं जा सकता।


दल बदल कानून पारित होने के बाद ‘आयाराम-गयाराम’ की अपसंस्कृति से छटकारा पा लिया गया है पर इससे कोई खास अंतर विधायकों सांसदों के नैतिक आचरण पर पड़ा हो, कहना गलत होगा। बिना दल बदले, वक्त जरूरत भयादोहन से या लालच में संकटग्रस्त सरकार को समर्थन देना-अंतरात्मा की आवाज सुन कर अथवा अपने माई बाप नेता के फरमान के अनुसार सदन में मतदान के समय अनुपस्थित रहकर या फिर बाहर से विचारधारा की दुहाई देते समर्थन देना उस मतदाता के साथ विश्वासघात से कम नहीं समझा जा सकता जिसने सत्तारूढ़ या उसके विपक्षी के रूप में पहचान कर किसी उम्मीदवार को अपना मत दिया हो। उत्तर प्रदेश का उदाहरण इस समय सबसे दयनीय और विचित्र है। कांग्र्रेस से खिन्न और गुस्साए जिन मतदाताओं ने बसपा या सपा के उम्मीदवारों को विजयी बनाया वह अपने को इस घड़ी ठगा सा पाते हैं जब उनके प्रतिनिधि निर्लज्जता के साथ कांग्रेसी सरकार को बचाने की साजिश में सहर्ष हाथ बंटा रहे हैं। और दिल्ली के उन कांग्रेसियों का दर्द कौन समझ सकता है जिन्होंने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा था कि भाजपा को हर कीमत पर बाहर रखने के लालच में उनकी पार्टी आप की सरकार बनवा देगी! साम्यवादी दलों की मजबूरी उस पाखंड से पैदा होती रही है जिसके कारण वह धर्मनिरपेक्षता के बहाने सांप्रदायिक -फासीवादी ताकतों को सरकार बनाने से रोकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं- भ्रष्टाचार की अनदेखी हो या कुनबापरस्ती। उनकी कमजोरी यह है कि ‘तरक्की पसंद’ फासीवादी-तानाशाही को वह निरापद मानते हैं और यह मानने को तैयार नहीं कि उनकी विचारधारा के साथ आज वंचितों तक की हमदर्दी नजर नहीं आती।


यह सिर्फ कुछ चुनिंदा मिसालें हैं। जहां न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर मतदान से पहले गठित संयुक्त मोर्चे से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती वहीं नतीजे आने के बाद सौदे पटाने वालों के सार्वजनिक बहिष्कार के बिना हमारा जनतंत्र निरापद नहीं रह सकता।


इस आलेख के लेखक प्रो पुष्पेश पंत हैं

(स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू)

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