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गांधी तुम आज भी जिंदा हो

Posted On: 4 Oct, 2011 Others में

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जागरण मुद्दा

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Mahatma Gandhi विचार: युगद्रष्टा गांधीजी। राष्ट्रपिता बापू। एक विचार। ओबामा से लेकर नेल्सन मंडेला जैसी हस्तियों के प्रेरणास्नोत। अरब देशों की क्रांति में गांधी के आदर्शो एवं सिद्धांतों की खुशबू। वर्तमान दौर का बड़े से बड़ा आंदोलन सत्य, अहिंसा और सिविल नाफरमानी की बात करता है। समाज सुधार, पर्यावरण संरक्षण जैसे सामाजिक मसलों पर चलने वाले आंदोलनों और इससे जुड़े लोग बापू की नीतियों व रीतियों पर चलकर ही लक्ष्य प्राप्ति की मंशा रखते हैं। अन्ना हजारे द्वारा सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाले आंदोलन में गांधीजी के सविनय अवज्ञा की महक सहज ही देखी जा सकती है। इन घटनाओं से तो यही लगता है कि गांधीजी की प्रासंगिकता कालातीत हो चुकी है।


विडंबना: आज गांधीजी की प्रासंगिकता पर बहस छिड़ी हुई है। आंदोलित समूह का हर सदस्य इनके सिद्धांतों का पालन करता है लेकिन जब व्यक्तिगत तौर पर इन आदर्शो के पालन की बात की जाती है तो असहज स्थिति पैदा होती है। यही विरोधाभास कष्टकारी है। लगता है कि इसके लिए हमारे नीति-नियंता ही जिम्मेदार हैं। गांधीजी के सब्जबाग दिखाकर रामराज लाने के उनके वायदों ने जनमानस के विश्वास को चकनाचूर कर दिया है। आज जरूरत है, फिर से उस विश्वास को मजबूत करने की। वर्तमान देशकाल, एवं परिस्थितियों में गांधीजी की प्रासंगिकता संबंधी बहस सबसे बड़ा मुद्दा है।


कुछ अपवाद छोड़ दें तो समाज में कुछ लोगों के लिए गांधीजी अब ‘अतिथि’ नहीं रह गए हैं। उनकी याद तिथि विशेष पर की जाती है। जन्मदिन या फिर पुण्यतिथि पर। फूल चढ़ते हैं। अगले दिन उतर जाते हैं। गांधीजी का जन्म इसी मिट्टी में से हुआ था। उन्होंने अनगिनत काम इसी मिट्टंी में बिखेरे थे। उनके जाने के बाद भी मिट्टी में हर कहीं, बिना बताए उनके संस्कार, उनके काम बार-बार जन्म लेते हैं।

india-parliament (same)2जी के इस भयानक दौर में भी गांधीजी 1जी यानी एकमात्र गांधी, एक अद्वितीय गांधी की तरह जिंदा हैं। बहुत से लोग गांधीजी की इन दो तिथियों पर अक्सर इस तरह के सवाल पूछते हैं कि क्या गांधीजी आज प्रासंगिक हैं? और अक्सर इसका उत्तर देने वाले लोग भी बड़ी मेहनत से उनकी प्रासंगिकता के उदाहरण खोजने में लग जाते हैं।


इस बारे में कुछ सोचने से पहले हम यही क्यों नहीं मान लेते कि चलो अब उनकी प्रासंगिकता बची ही नहीं है। गांधी का बोझ कंधे से, सिर से उतार कर हल्के हो जाओ। काहे को उनका बोझ ढो रहे हो। तब क्या होगा? पहली बात तो यह कि फिर आज चारों तरफ जो चल रहा है, उसकी कोई शिकायत मन में मत रखना। चारों तरफ हिंसा, घृणा, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता, इन सबको फिर हमें अपने जीवन का अनिवार्य अंग मान लेना होगा। गनीमत है कि ऐसा नहीं है। समाज का एक बहुत बड़ा गुमनाम भाग इस आपाधापी से दूर चुपचाप अपना काम कर रहा है। वह तोड़फोड़ की इन सारी खबरों से अलग रह न जाने कितनी मेहनत से इस बड़े देश को जोड़े रख रहा है।


Anupam-Mishraहमारे यहां ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति से बड़ा उसका काम, उसका नाम होता है। वह अपने बड़े कामों से ही तो बड़ा व्यक्ति बनता है। इसलिए गांधीजी के अनन्य शिष्य विनोबा ने कहा था कि गांधी से बड़ा गांधी का नाम है। इससे भी आगे बढ़ें तो हम देख सकते हैं कि अच्छे विचारों में से बाद में नाम भी हट जाता है। आज हमारे समाज का एक बड़ा भाग गांधीजी का नाम लिए बिना ‘उन्हें’ याद रखे है। उनके विचारों को अपना विचार मानकर जिंदा रखे है।


अब अगर ऐसे लोगों इनके नाम-पते मांगने लगे तो? नहीं भाई, इसका खाता नहीं रखा जा सकता। ऐसा काम करने वाले, ऐसा जीवन जीने वाले अपना खाता खोलते ही नहीं। अच्छी वृत्ति, प्रवृत्ति तो बिना अपनी कोई छाया छोड़े अदृश्य ढंग से चलती रहती हैं। हां, अगर ऐसे कामों की झलक देखनी हो तो हमें वह सचमुच हर कहीं दिख जाएगी।


जब सब तरफ वनों पर संकट है, ऐसे में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में कुछ सैकड़ों महिलाएं, सुरीले गीत गाते हुए खांखर, यानी घुंघरू बंधी एक लाठी लेकर अपने जंगलों की रखवाली करती मिल जाएंगी। इन गुमनाम महिलाओं ने वहां न सिर्फ वन बचाए हैं, बल्कि नए वन भी लगाए हैं। जोर नाम जानने पर ही हो, तो यहां ‘दूधातोली लोक विकास संस्थान’ नामक एक संस्था काम कर रही है। आज से नहीं, तीस बरस से। बाहर के रुपयों पर नहीं, अपने पैसे से यह छोटी-सी संस्था देश में सबसे अच्छे वनों को खड़ा कर रही है। शुद्ध ग्राम भावना से। इस संस्था का कोई भी कार्यकर्ता इस सामाजिक काम के लिए संस्था से वेतन नहीं लेता। जीवन-जीने के लिए ये सब लोग कुछ और नौकरी करते हैं और उससे बचे समय में बिना स्वार्थ गांव का काम। उनके इस काम को दूर मध्यप्रदेश सरकार ने पहचाना है और महात्मा गांधी के नाम पर ही बनाए गए अपने एक विशिष्ट पुरस्कार से आज ही के दिन भोपाल में इसे सम्मानित भी कर रही है।


पानी को लेकर हर जगह तलवारें खिंच जाती हैं, वहीं देश के रेगिस्तानी हिस्से में, जहां सबसे कम बरसात होती है, सैकड़ों गांव, हजारों लोग एकदम स्वदेशी, स्वावलंबी और परस्पर सहयोग के आधार पर अपना पानी खुद एकत्र करते हैं। उसे समता के आधार पर बांट कर जीवन बहुत ही शानदार ढंग से चलाते हैं।


जहां एक तरफ हजारों करोड़ से ज्यादा के घोटाले हो रहे हों और दूसरी तरफ मात्र 26 और 32 रुपए में गरीबी की रेखा मिट जाती हो, वहां क्या हम आप कल्पना कर सकते हैं कि लोग बिना किसी नारेबाजी के, बिना किसी विशेष वाद, विचार, गांधी, मा‌र्क्स के सामूहिक खेती करते हों और सारी आमदनी पूरे गांव में बराबर बांट लेते हों। ऐसे खेतों को देखना हो तो जैसलमेर के खड़ीनों में जाना पड़ेगा। यहां भील, मुसलमान, सिंह ठाकुर, ब्राह्मण और मेघवाल एक साथ काम करते मिल जाएंगे। सामाजिक अन्याय के जितने भी रूप हम आप जानते हैं, उन्हें इन खेतों में खरपतवार की तरह, लोगों ने बड़े ही प्रेम से उखाड़ फेंका है।


गांधीजी बराबर जिंदा हैं। आज भी ऐसे खेतों में, ऐसे वनों में। इस अदृश्य गांधी को देखने के लिए हमें थोड़ी साधना करनी पड़ेगी। उसकी तैयारी चाहें तो इसी दो अक्टूबर यानी आज से ही करें हम!- [अनुपम मिश्र, गांधीवादी चिंतक]


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02 अक्टूबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “वैश्विक कार्यकर्ता”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

02 अक्टूबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “खुद के बारे में बापू की सोच”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

02 अक्टूबर को प्रकाशित मुद्दा से संबद्ध आलेख “महात्मा और मसले”  पढ़ने के लिए क्लिक करें.

साभार : दैनिक जागरण 02 अक्टूबर 2011 (रविवार)

नोट – मुद्दा से संबद्ध आलेख दैनिक जागरण के सभी संस्करणों में हर रविवार को प्रकाशित किए जाते हैं.

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